भोपाल। भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत भोपाल में आयोजित 11वीं ब्रिक्स संस्कृति मंत्रियों की बैठक महत्वपूर्ण सहमति और व्यापक सांस्कृतिक सहयोग के संकल्प के साथ संपन्न हुई। बैठक के दौरान सदस्य और साझेदार देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को अधिक मजबूत, संस्थागत और व्यावहारिक बनाने के उद्देश्य से ‘भोपाल घोषणापत्र’ को अपनाया गया। घोषणापत्र में सांस्कृतिक एवं रचनात्मक उद्योगों, रचनात्मक अर्थव्यवस्था, सांस्कृतिक विरासत संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान, डिजिटलीकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कॉपीराइट और कलाकारों के लिए अवसरों जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने का व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है।
भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता में संस्कृति ट्रैक के अंतर्गत आयोजित यह बैठक केवल मंत्रिस्तरीय स्तर की औपचारिक चर्चा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसके माध्यम से सांस्कृतिक सहयोग को ठोस कार्यक्रमों और दीर्घकालिक साझेदारी से जोड़ने का प्रयास किया गया। भारत की अध्यक्षता का व्यापक विषय ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’ रहा, जिसका प्रभाव संस्कृति क्षेत्र में आयोजित चर्चाओं और पहलों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
ब्रिक्स संस्कृति ट्रैक के अंतर्गत तीन संस्कृति कार्य समूह बैठकों का आयोजन किया गया। पहली बैठक 29 और 30 अप्रैल 2026 को वर्चुअल माध्यम से हुई। इसके बाद दूसरी बैठक 4 और 5 जून को वाराणसी में तथा तीसरी बैठक 5 और 6 अगस्त को भोपाल में आयोजित की गई। इन बैठकों में संस्कृति के क्षेत्र में सहयोग के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई और मंत्रिस्तरीय बैठक के लिए साझा प्राथमिकताओं तथा प्रस्तावों को आगे बढ़ाया गया।
भोपाल में आयोजित मंत्रिस्तरीय बैठक में भारत सहित कुल 14 देशों ने भाग लिया। इनमें 10 ब्रिक्स सदस्य देश और चार साझेदार देश शामिल रहे। ब्रिक्स सदस्य देशों में ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात शामिल थे। मिस्र ने मंत्रिस्तरीय बैठक में ऑनलाइन भागीदारी की। साझेदार देशों के रूप में बेलारूस, क्यूबा, कजाकिस्तान और थाईलैंड ने भाग लिया। इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात के संस्कृति मंत्रियों की उपस्थिति ने बैठक के उच्चस्तरीय महत्व को रेखांकित किया। विभिन्न बैठकों में कुल 55 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
बैठक में अपनाया गया ‘भोपाल घोषणापत्र’ सांस्कृतिक क्षेत्र में भविष्य के सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में सामने आया है। घोषणापत्र में सांस्कृतिक और रचनात्मक उद्योगों को बढ़ावा देने तथा रचनात्मक अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया है। बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में रचनात्मक उद्योगों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। कला, संगीत, सिनेमा, डिजाइन, हस्तशिल्प, साहित्य, डिजिटल सामग्री और अन्य रचनात्मक क्षेत्रों से जुड़े पेशेवरों के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग नए बाजार और नए अवसर उपलब्ध करा सकता है।
घोषणापत्र में सदस्य और साझेदार देशों के बीच कार्यप्रणालियों, अनुभवों और सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इसके साथ ही रचनाकारों को सहयोग, पेशेवर नेटवर्किंग और डिजिटल उपकरणों के माध्यम से बाजार तक बेहतर पहुंच उपलब्ध कराने की दिशा में भी काम करने की बात कही गई है। इससे कलाकारों और रचनात्मक पेशेवरों को राष्ट्रीय सीमाओं से आगे अपने काम को प्रस्तुत करने तथा नए सहयोग विकसित करने के अवसर मिल सकते हैं।

डिजिटल तकनीक के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए संस्कृति क्षेत्र में प्रौद्योगिकी की भूमिका भी बैठक के प्रमुख विषयों में रही। डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने कला और संस्कृति के प्रसार के तरीकों को तेजी से बदला है। ऐसे में डिजिटल उपकरणों का उपयोग केवल सांस्कृतिक सामग्री के प्रचार तक सीमित न रहकर कलाकारों को बाजार, दर्शकों और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जोड़ने का माध्यम बन सकता है। ब्रिक्स देशों के बीच इस क्षेत्र में अनुभवों और तकनीकी समाधानों का आदान-प्रदान भविष्य की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।
‘भोपाल घोषणापत्र’ में सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और उससे जुड़े अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसमें यूनेस्को बहुराष्ट्रीय नामांकन के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है। बहुराष्ट्रीय नामांकन उन सांस्कृतिक विरासतों के संरक्षण और वैश्विक पहचान में उपयोगी हो सकता है, जिनका संबंध एक से अधिक देशों की साझा परंपराओं, इतिहास या सांस्कृतिक संपर्कों से है।
सांस्कृतिक संपदा की उत्पत्ति के अनुसंधान तथा उसकी वापसी और बहाली के संबंध में बेहतर सहयोग की आवश्यकता पर भी घोषणापत्र में जोर दिया गया है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व की वस्तुओं की उत्पत्ति, उनके संरक्षण और उनके स्वामित्व से जुड़े प्रश्न लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं। ऐसे में सदस्य देशों के बीच अनुसंधान, सूचना साझा करने और तकनीकी सहयोग की व्यवस्था सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित ट्रेसिंग उपकरणों की संभावनाओं पर विचार करने का उल्लेख घोषणापत्र में किया गया है। एआई तकनीक का उपयोग सांस्कृतिक संपदा की पहचान, उसके स्रोत और उसके ऐतिहासिक रिकॉर्ड से संबंधित अनुसंधान में नए अवसर पैदा कर सकता है। यदि इन तकनीकों का जिम्मेदारी और पारदर्शिता के साथ उपयोग किया जाए तो सांस्कृतिक विरासत के दस्तावेजीकरण और संरक्षण की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है।
बैठक में पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण विषय के रूप में स्वीकार किया गया। ब्रिक्स देशों में सदियों पुरानी लोक परंपराएं, हस्तशिल्प, संगीत, नृत्य, चिकित्सा पद्धतियां, कृषि ज्ञान, मौखिक परंपराएं और विभिन्न सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां मौजूद हैं। इनका संरक्षण केवल अतीत को सुरक्षित रखना नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान के स्रोतों को सुरक्षित रखना भी है।
दस्तावेजी विरासत के संरक्षण के क्षेत्र में संग्रहालयों, पुस्तकालयों और अभिलेखागारों के बीच सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर भी सहमति बनी। पुराने दस्तावेज, पांडुलिपियां, अभिलेख, कलाकृतियां और अन्य सांस्कृतिक सामग्री किसी भी देश की ऐतिहासिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। डिजिटल तकनीक के माध्यम से इनके संरक्षण, डिजिटलीकरण और व्यापक पहुंच को संभव बनाया जा सकता है। ब्रिक्स देशों के संस्थानों के बीच इस प्रकार का सहयोग शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते इस्तेमाल के बीच रचनाकारों के अधिकारों की सुरक्षा भी बैठक में चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा रही। एआई प्रणालियों में कॉपीराइट से संरक्षित रचनाओं के उपयोग के संबंध में रचनाकारों के अधिकार, पारदर्शिता और उचित एवं न्यायसंगत पारिश्रमिक की आवश्यकता को रेखांकित किया गया। यह विषय वर्तमान डिजिटल अर्थव्यवस्था में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि तकनीकी विकास के साथ रचनात्मक सामग्री के उपयोग और उसके अधिकारों से जुड़े नए प्रश्न सामने आ रहे हैं।
भारत की ओर से सांस्कृतिक सहयोग को अधिक व्यावहारिक रूप देने के लिए एक स्वैच्छिक कलाकार रजिस्ट्री विकसित करने की प्रायोगिक पहल की घोषणा भी की गई। इस पहल का उद्देश्य ब्रिक्स देशों के कलाकारों और रचनात्मक पेशेवरों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को सुगम बनाना, पेशेवर नेटवर्क को मजबूत करना और नए अवसर पैदा करना है। यदि कलाकारों की जानकारी, उनकी विशेषज्ञता और उनके कार्यक्षेत्र से संबंधित एक व्यवस्थित नेटवर्क विकसित होता है तो विभिन्न देशों के बीच सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सहयोगी परियोजनाओं के लिए उपयुक्त प्रतिभाओं की पहचान आसान हो सकती है।
भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रम भोपाल में आयोजित दो दिवसीय ब्रिक्स संस्कृति महोत्सव भी रहा। 6 और 7 अगस्त को आयोजित इस महोत्सव में ब्रिक्स सदस्य और साझेदार देशों ने भाग लिया। बेलारूस, ब्राजील, इंडोनेशिया, रूस और संयुक्त अरब अमीरात सहित विभिन्न देशों के कलाकारों और सांस्कृतिक प्रतिनिधियों ने अपनी कलात्मक परंपराओं को प्रस्तुत किया।
महोत्सव का केंद्रीय भाव भारतीय सांस्कृतिक आदर्श ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ पर आधारित रहा। विभिन्न देशों की कला, संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने दर्शाया कि भाषा, भौगोलिक स्थिति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अलग होने के बावजूद संस्कृति लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने की क्षमता रखती है। महोत्सव ने सांस्कृतिक संवाद के साथ-साथ जन-संपर्क और कलात्मक आदान-प्रदान के लिए भी एक व्यापक मंच उपलब्ध कराया।
महोत्सव के दूसरे दिन ब्रिक्स देशों की विभिन्न भाषाओं में सामूहिक प्रस्तुति विशेष आकर्षण का केंद्र रही। विभिन्न भाषाओं में एक साथ प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रम ने विविधता के बीच एकता की भावना को सामने रखा। यह प्रस्तुति ब्रिक्स सहयोग की उस व्यापक भावना का प्रतीक बनी जिसमें अलग-अलग सांस्कृतिक पहचान रखने वाले देश साझा मंच पर संवाद और सहयोग की संभावनाओं को तलाश रहे हैं।
भोपाल बैठक ने सदस्य देशों के बीच द्विपक्षीय सांस्कृतिक सहयोग को आगे बढ़ाने के अवसर भी उपलब्ध कराए। संस्कृति मंत्रियों और संस्कृति मंत्रालयों के सचिव स्तर पर विभिन्न सहभागी देशों के साथ द्विपक्षीय बैठकें आयोजित की गईं। इन बैठकों में मौजूदा सांस्कृतिक सहयोग को मजबूत करने और पारस्परिक हित वाले नए क्षेत्रों की पहचान करने पर विचार-विमर्श हुआ। इस प्रकार ब्रिक्स संस्कृति ट्रैक बहुपक्षीय सहयोग के साथ-साथ द्विपक्षीय संबंधों को भी आगे बढ़ाने का माध्यम बना।
बैठक में शामिल विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के लिए भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत को प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर भी सुनिश्चित किया गया। 5 अगस्त को प्रतिनिधिमंडलों ने भोपाल स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय का दौरा किया। यह संग्रहालय भारत की विविध जनजातीय और लोक संस्कृतियों को समझने का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां की यात्रा ने प्रतिनिधियों को भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता से परिचित होने का अवसर प्रदान किया।
मंत्रिस्तरीय बैठक के बाद प्रतिनिधिमंडलों को सांची ले जाने का कार्यक्रम भी रखा गया, जहां उन्हें भारत की महत्वपूर्ण बौद्ध विरासत को समझने और देखने का अवसर मिला। सांची भारत की प्राचीन बौद्ध स्थापत्य और सांस्कृतिक परंपरा का प्रमुख केंद्र है। इसके बाद 9 अगस्त की सुबह भीमबेटका की यात्रा निर्धारित की गई, जहां प्रतिनिधिमंडलों को भारत की प्रागैतिहासिक शैलचित्र परंपरा और प्राचीन सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराया जाना है।
सांची और भीमबेटका जैसे स्थलों को कार्यक्रम से जोड़ना भारत की उस सांस्कृतिक दृष्टि को सामने लाता है जिसमें विरासत को केवल स्मारकों के रूप में नहीं, बल्कि सभ्यता, ज्ञान और मानवीय अनुभव की निरंतर यात्रा के रूप में देखा जाता है। विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के लिए ऐसे स्थलों का अनुभव भारत की सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक गहराई को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
भोपाल में आयोजित संस्कृति मंत्रियों की बैठक का व्यापक महत्व इस बात में है कि इसने संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय सहयोग के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया है। आर्थिक और राजनीतिक सहयोग के साथ सांस्कृतिक संबंध देशों के बीच दीर्घकालिक समझ और विश्वास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संस्कृति लोगों के स्तर पर संवाद स्थापित करती है और विभिन्न समाजों के बीच साझा अनुभवों की पहचान करने में सहायता करती है।
ब्रिक्स देशों के बीच सांस्कृतिक सहयोग का दायरा आने वाले समय में और विस्तृत हो सकता है। डिजिटल संस्कृति, रचनात्मक अर्थव्यवस्था, संग्रहालय प्रबंधन, सांस्कृतिक पर्यटन, पारंपरिक ज्ञान, अभिलेख संरक्षण, कलाकारों की गतिशीलता, फिल्म, संगीत, साहित्य और हस्तशिल्प जैसे अनेक क्षेत्र सहयोग के नए अवसर उपलब्ध करा सकते हैं। ‘भोपाल घोषणापत्र’ इन क्षेत्रों में साझा प्रयासों के लिए एक आधार तैयार करता है।
भारत की अध्यक्षता के दौरान संस्कृति ट्रैक में जिस तरह कार्य समूहों, महोत्सव, मंत्रिस्तरीय बैठक और द्विपक्षीय संवाद को एक-दूसरे से जोड़ा गया, उससे यह संकेत मिलता है कि सांस्कृतिक सहयोग को केवल घोषणाओं तक सीमित रखने के बजाय व्यावहारिक गतिविधियों के माध्यम से आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है। कलाकार रजिस्ट्री जैसी पहल इस दिशा में एक ठोस कदम है।
विशेष रूप से रचनात्मक अर्थव्यवस्था का विषय भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है। दुनिया में रचनात्मक क्षेत्रों का आर्थिक महत्व लगातार बढ़ रहा है और डिजिटल माध्यमों ने छोटे कलाकारों तथा स्वतंत्र रचनाकारों के लिए भी वैश्विक दर्शकों तक पहुंच के रास्ते खोले हैं। ब्रिक्स देशों के बीच यदि रचनात्मक पेशेवरों के नेटवर्क, बाजार और संस्थागत सहयोग को मजबूत किया जाता है तो इससे सांस्कृतिक क्षेत्र के साथ-साथ रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल सकता है।
सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के क्षेत्र में तकनीक का इस्तेमाल भी भविष्य की प्राथमिकताओं में शामिल होता जा रहा है। डिजिटल अभिलेख, 3डी दस्तावेजीकरण, एआई आधारित पहचान और ट्रेसिंग, डिजिटल संग्रहालय तथा ऑनलाइन सांस्कृतिक संसाधन ऐसी व्यवस्थाएं हैं, जिनके माध्यम से विरासत को अधिक सुरक्षित और व्यापक रूप से उपलब्ध कराया जा सकता है। हालांकि तकनीक के इस्तेमाल के साथ बौद्धिक संपदा, कॉपीराइट, डेटा और सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े प्रश्नों पर भी स्पष्ट और संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक होगा।
भोपाल घोषणापत्र में पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की सुरक्षा का उल्लेख इस व्यापक चुनौती को भी सामने लाता है कि आधुनिक तकनीकी और आर्थिक विकास के बीच स्थानीय तथा पारंपरिक संस्कृतियों की मौलिकता को कैसे सुरक्षित रखा जाए। इस क्षेत्र में ब्रिक्स देशों के अनुभवों का आदान-प्रदान विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है, क्योंकि अनेक सदस्य और साझेदार देशों में समृद्ध पारंपरिक ज्ञान और विविध सांस्कृतिक समुदाय मौजूद हैं।
भारत ने ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान रचनात्मक सहयोग और सक्रिय भागीदारी के लिए सभी सदस्य देशों और साझेदार देशों के प्रति आभार व्यक्त किया है। साथ ही अधिक जुड़े हुए, समावेशी और भविष्य के लिए तैयार सांस्कृतिक साझेदारी की दिशा में निरंतर सहयोग की प्रतिबद्धता भी दोहराई गई है।
भोपाल में संपन्न 11वीं ब्रिक्स संस्कृति मंत्रियों की बैठक को इस दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा सकता है कि इसने संस्कृति को केवल विरासत संरक्षण के विषय के रूप में नहीं, बल्कि रचनात्मक अर्थव्यवस्था, डिजिटल परिवर्तन, कलाकारों के अधिकार, रोजगार, अंतरराष्ट्रीय संवाद और सामाजिक जुड़ाव से जुड़े व्यापक क्षेत्र के रूप में सामने रखा है।
‘भोपाल घोषणापत्र’ के माध्यम से सदस्य और साझेदार देशों ने सांस्कृतिक सहयोग को अधिक व्यवस्थित और व्यावहारिक दिशा देने का प्रयास किया है। कलाकारों के लिए नए नेटवर्क, रचनात्मक उद्योगों के लिए बाजार, विरासत संरक्षण के लिए तकनीक, पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा और संग्रहालयों, पुस्तकालयों तथा अभिलेखागारों के बीच सहयोग जैसी पहलें आने वाले समय में इस सहयोग को नई गति दे सकती हैं।
भारत की अध्यक्षता में भोपाल में हुआ यह सांस्कृतिक संवाद इस बात का भी संकेत है कि तेजी से बदलती दुनिया में संस्कृति देशों के बीच संवाद और सहयोग का एक प्रभावी माध्यम बनी हुई है। अलग-अलग सभ्यताओं और परंपराओं से आने वाले देशों के बीच सांस्कृतिक संबंध न केवल अतीत को समझने में सहायता करते हैं, बल्कि भविष्य के लिए साझा दृष्टिकोण विकसित करने का अवसर भी देते हैं। भोपाल घोषणापत्र इसी व्यापक सोच को संस्थागत आधार देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आया है।