महाकवि कालिदास जयंती पर विशेष
भारतीय साहित्य के विशाल आकाश में यदि किसी कवि का तेज आज भी सहस्रों वर्षों बाद अक्षुण्ण रूप से प्रकाशित हो रहा है, तो वह महाकवि कालिदास हैं। उनकी प्रतिभा, कल्पनाशक्ति, प्रकृति-प्रेम, मानवीय संवेदनाएँ तथा काव्य-सौंदर्य उन्हें विश्व के महानतम कवियों और नाटककारों की श्रेणी में स्थापित करते हैं।
लोककथाओं के अनुसार कालिदास के प्रारंभिक जीवन की कथा अत्यंत रोचक है। कहा जाता है कि वे एक बार जिस वृक्ष की डाल पर बैठे थे, उसी को काट रहे थे। उनकी इस मूर्खतापूर्ण हरकत को देखकर किसी ने भी कल्पना नहीं की होगी कि यही व्यक्ति आगे चलकर संस्कृत साहित्य का अमर सूर्य बनेगा। यद्यपि यह कथा ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है, किंतु यह इस सत्य का प्रतीक अवश्य है कि ज्ञान और साधना मनुष्य को शिखर तक पहुँचा सकते हैं।
कालिदास के जन्मकाल और जन्मस्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ उन्हें ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी का मानते हैं तो कुछ गुप्तकालीन कवि स्वीकार करते हैं। इसी प्रकार उनके जन्मस्थान के संबंध में कश्मीर, बंगाल, बिहार, उड़ीसा तथा दक्षिण भारत तक विभिन्न मत प्रस्तुत किए गए हैं। तथापि अधिकांश विद्वान उन्हें उज्जयिनी (उज्जैन) से संबंधित मानते हैं तथा राजा विक्रमादित्य का समकालीन स्वीकार करते हैं।

महाकवि कालिदास ने संस्कृत साहित्य को अप्रतिम ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। उनकी प्रमुख रचनाओं में कुमारसंभवम्, रघुवंशम्, मेघदूतम्, ऋतुसंहार, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम् तथा विक्रमोर्वशीयम् सम्मिलित हैं। इन कृतियों ने भारतीय साहित्य को अमूल्य धरोहर प्रदान की है। रामायण और महाभारत के बाद यदि किसी साहित्यकार की रचनाओं ने भारतीय मानस को सबसे अधिक प्रभावित किया है, तो उनमें कालिदास का स्थान अग्रणी है।
उनकी अनुपम कृति मेघदूतम् को संस्कृत साहित्य का अद्वितीय खंडकाव्य माना जाता है। इसमें शब्द, ध्वनि, कल्पना, प्रकृति और भावनाओं का ऐसा समन्वय है जो विश्व साहित्य में दुर्लभ है। विरही यक्ष द्वारा मेघ को संदेशवाहक बनाकर प्रिया तक संदेश पहुँचाने की कल्पना कालिदास की अद्भुत काव्य प्रतिभा का परिचायक है।
छत्तीसगढ़ के लिए यह विशेष गौरव का विषय है कि जनश्रुतियों और कुछ शोधों के अनुसार मेघदूतम् की रचना सरगुजा जिले के रामगढ़ पर्वत क्षेत्र में हुई थी। अम्बिकापुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित रामगढ़ की गुफाएँ आज भी इस सांस्कृतिक स्मृति को संजोए हुए हैं। यहाँ प्रतिवर्ष सावन मास में कालिदास की स्मृति में साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजन भी होते हैं।

