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पालनहार और सारे जग के नाथ : भगवान जगन्नाथ

16 जुलाई मानवता जनमानस की रथ यात्रा पर विशेष

भारत की सनातन संस्कृति में भगवान जगन्नाथ केवल एक देवता नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के पालनहार, करुणा, समरसता और विश्व बंधुत्व के प्रतीक माने जाते हैं। “जगन्नाथ” शब्द का अर्थ ही है – जगत के नाथ अर्थात सम्पूर्ण विश्व के स्वामी। वे ऐसे आराध्य हैं जिनकी भक्ति में जाति, धर्म, वर्ग, भाषा और क्षेत्र की सभी सीमाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं। यही कारण है कि ओड़िशा के पुरी धाम में विराजमान भगवान जगन्नाथ को करोड़ों श्रद्धालु “लोकदेवता” के रूप में पूजते हैं।

पुराणों के अनुसार भगवान जगन्नाथ भगवान विष्णु एवं श्रीकृष्ण का ही दिव्य स्वरूप हैं। स्कन्द पुराण, ब्रह्म पुराण और पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार मालवा के राजा इन्द्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान विष्णु के दुर्लभ स्वरूप “नीलमाधव” के दर्शन हुए। उन्होंने उस दिव्य विग्रह की खोज के लिए अपने दूत भेजे। विद्यापति नामक ब्राह्मण ने शबर जाति के प्रमुख विश्ववसु के पास नीलमाधव की आराधना देखी। जब राजा स्वयं वहाँ पहुँचे, तब नीलमाधव अदृश्य हो चुके थे। तब आकाशवाणी हुई कि समुद्र तट पर बहकर आने वाले दिव्य दारु (काष्ठ) से भगवान की मूर्तियाँ निर्मित की जाएँ।

मान्यता है कि स्वयं विश्वकर्मा बढ़ई के रूप में मूर्तियाँ बनाने आए। उन्होंने शर्त रखी कि कार्य पूर्ण होने तक कोई द्वार नहीं खोलेगा। किंतु समय अधिक लगने पर राजा अधीर हो गए और द्वार खोल दिया। परिणामस्वरूप मूर्तियाँ अधूरी अवस्था में ही प्रकट हुईं। भगवान ने इसे ही अपना पूर्ण स्वरूप स्वीकार किया। यही कारण है कि जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएँ विशिष्ट एवं अद्वितीय स्वरूप में दिखाई देती हैं।

पुरी का श्रीजगन्नाथ मंदिर भारत के चार प्रमुख धामों में से एक है। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार धामों में बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम् और जगन्नाथ पुरी शामिल हैं। माना जाता है कि इन धामों की यात्रा से मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुरी धाम की विशेषता यह है कि यहाँ भगवान अपने भक्तों के बीच राजा के रूप में नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य के रूप में निवास करते हैं। उनके दैनिक जीवन से जुड़े अनेक अनुष्ठान आज भी बड़े विधि-विधान से संपन्न किए जाते हैं।

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा विश्व की सबसे विशाल धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों में आरूढ़ होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक यात्रा करते हैं।

भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष, बलभद्र का तलध्वज तथा सुभद्रा का दर्पदलन कहलाता है। लाखों श्रद्धालु इन रथों की रस्सियाँ खींचकर स्वयं को धन्य मानते हैं। मान्यता है कि रथ की रस्सी को स्पर्श मात्र करने से भी अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और ईश्वर की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का अद्भुत संदेश भी देती है। यहाँ राजा और रंक, अमीर और गरीब, सभी एक समान होकर प्रभु के रथ को खींचते हैं।

जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद अपनी विशिष्टता के लिए विश्वविख्यात है। यहाँ बनने वाला प्रसाद केवल भोजन नहीं, बल्कि भगवान की कृपा का प्रतीक माना जाता है। हजारों श्रद्धालुओं के लिए प्रतिदिन भोजन तैयार होता है, किंतु आश्चर्यजनक रूप से कभी कम नहीं पड़ता और न ही व्यर्थ जाता है। मंदिर की रसोई विश्व की सबसे बड़ी पारंपरिक रसोइयों में गिनी जाती है, जहाँ मिट्टी के पात्रों में लकड़ी की आँच पर भोजन तैयार किया जाता है। श्रद्धालु इसे “अन्न ब्रह्म” मानकर ग्रहण करते हैं।

भगवान जगन्नाथ का स्वरूप हमें अनेक जीवनोपयोगी संदेश देता है। उनकी बड़ी-बड़ी आँखें बताती हैं कि ईश्वर हर जीव पर समान दृष्टि रखते हैं। उनके अधूरे हाथ-पाँव यह संकेत देते हैं कि ईश्वर किसी बाहरी पूर्णता के मोहताज नहीं हैं, बल्कि वे भाव और भक्ति के भूखे हैं।जगन्नाथ संस्कृति समावेश, सहिष्णुता, प्रेम, सेवा और मानवता की संस्कृति है। यह हमें सिखाती है कि मनुष्य का वास्तविक धर्म परोपकार, करुणा और सद्भाव है। आज जब संसार जाति, वर्ग, भाषा और विचारधाराओं के विभाजन से जूझ रहा है, तब भगवान जगन्नाथ का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। वे समस्त मानवता को एक सूत्र में बाँधने वाले विश्वनायक हैं, जो हमें प्रेम, भाईचारे और सहअस्तित्व का मार्ग दिखाते हैं।

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानवता, समरसता और विश्वकल्याण का विराट उत्सव है। यह हमें स्मरण कराती है कि ईश्वर अपने भक्तों तक पहुँचने के लिए स्वयं रथ पर सवार होकर निकलते हैं। जो प्रभु स्वयं भक्तों के द्वार आते हों, उनकी करुणा और प्रेम की सीमा का अनुमान लगाना भी कठिन है। आइए, हम सब भगवान जगन्नाथ के सार्वभौमिक संदेश को आत्मसात करें और प्रेम, सेवा, सद्भाव तथा मानव कल्याण के पथ पर अग्रसर हों।

हे जग के नाथ जगन्नाथ, 

करुणा की धारा बहाइए,

भटके मन के अंधेरे में, 

आशा का दीप जलाइए।

दुखियों के जीवन में भर दें,

सुखांति का मधुर प्रकाश दें 

सब पर  कृपा बरसाकर

मानवता का मान बढ़ाइए।।

।।जय जगन्नाथ।।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

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