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सर्प : भारतीय संस्कृति, पौराणिक मान्यताएँ और वैज्ञानिक सत्य

16 जुलाई : विश्व सर्प दिवस पर विशेष

पृथ्वी पर जीवन की विविधता जितनी अद्भुत है, उतनी ही रहस्यमयी भी। इस जैव विविधता में सर्प एक ऐसा जीव है जिसने हजारों वर्षों से मानव मन को भय, श्रद्धा, जिज्ञासा और आकर्षण से भर रखा है। एक ओर लोग इसके नाम मात्र से भयभीत हो जाते हैं, तो दूसरी ओर भारतीय संस्कृति में इसे देवत्व प्रदान कर पूजा जाता है। यही कारण है कि सर्प केवल एक जीव नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था, लोककथाओं और विज्ञान का अनूठा संगम है। विश्व सर्प दिवस प्रत्येक वर्ष 16 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिवस हमें सर्पों के महत्व, उनके संरक्षण तथा उनके प्रति फैली भ्रांतियों को दूर करने की प्रेरणा देता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सर्पों को केवल भय की दृष्टि से न देखकर वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी समझें।

भारत विश्व की उन प्राचीन सभ्यताओं में से एक है जहाँ सर्पों को विशेष सम्मान प्राप्त है। हमारे धर्मग्रंथों, पुराणों और लोक परंपराओं में सर्पों का उल्लेख बार-बार मिलता है।

भगवान शिव के गले में विराजमान नाग वैराग्य, शक्ति और निर्भयता का प्रतीक माना जाता है। भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर विराजमान बताए गए हैं। समुद्र मंथन में नागराज वासुकि ने रस्सी का कार्य किया था। भारतीय लोकमानस में नागों को धरती, जल और उर्वरता के रक्षक के रूप में भी देखा जाता है।भारत में मनाया जाने वाला नागपंचमी सर्पों के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। इस दिन लोग नाग देवता की पूजा कर प्रकृति और जीव-जगत के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं।

सर्पों के बारे में अनेक मिथक प्रचलित हैं। कुछ लोग मानते हैं कि सांप बदला लेते हैं, मनुष्य की तस्वीर आँखों में कैद कर लेते हैं या दूध पीना उनका प्रिय भोजन है। वैज्ञानिक दृष्टि से ये धारणाएँ असत्य हैं। सांपों की स्मरण शक्ति इतनी विकसित नहीं होती कि वे किसी व्यक्ति को पहचानकर बदला लें। उनकी आँखों में किसी व्यक्ति की तस्वीर सुरक्षित नहीं रहती। इसी प्रकार अधिकांश सर्प दूध नहीं पीते, क्योंकि वे स्तनधारी नहीं हैं और उनका प्राकृतिक आहार भी दूध नहीं है। कई बार प्यास के कारण वे दूध जैसा तरल पदार्थ ग्रहण कर लेते हैं, जिससे यह भ्रम पैदा हुआ।

सर्प सरीसृप वर्ग के जीव हैं और पृथ्वी पर करोड़ों वर्षों से अस्तित्व में हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार विश्व में 4,000 से अधिक सर्प प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जबकि भारत में लगभग 300 से अधिक प्रजातियाँ मौजूद हैं। इनमें से अधिकांश विषहीन हैं। सर्पों के पास बाहरी कान नहीं होते। वे भूमि में उत्पन्न होने वाले कंपन को महसूस करके आसपास की गतिविधियों का अनुमान लगाते हैं। उनकी जीभ बार-बार बाहर निकालने की क्रिया वातावरण की गंध और रासायनिक संकेतों को पहचानने में सहायता करती है। उनका शरीर अत्यंत लचीला होता है, जिससे वे संकरे स्थानों में भी आसानी से प्रवेश कर सकते हैं। यही कारण है कि वे प्रकृति के सबसे अनुकूलनशील जीवों में गिने जाते हैं।

        सर्पों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखना है। वे चूहों और अन्य छोटे जीवों का शिकार करते हैं। यदि सर्प न हों तो खेतों में चूहों की संख्या इतनी बढ़ सकती है कि फसलों को भारी नुकसान पहुँचे।

एक अनुमान के अनुसार एक वयस्क सर्प वर्ष भर में सैकड़ों चूहों का शिकार कर सकता है। इस प्रकार वह किसानों का मौन सहयोगी बनकर खाद्यान्न सुरक्षा में योगदान देता है। सर्प खाद्य श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। वे स्वयं भी अनेक पक्षियों और वन्यजीवों का भोजन बनते हैं। इसलिए उनका संरक्षण जैव विविधता की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।

विषैले सर्पों का विष केवल भय का कारण नहीं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान के लिए एक अमूल्य संसाधन भी है। सर्प विष से एंटी-वेनम तैयार किया जाता है, जो सर्पदंश से पीड़ित लोगों के जीवन की रक्षा करता है। इसके अतिरिक्त हृदय रोग, रक्तचाप, तंत्रिका तंत्र तथा अन्य कई रोगों की दवाओं के विकास में भी सर्प विष के घटकों का उपयोग किया जा रहा है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान सर्प विष के औषधीय गुणों पर निरंतर शोध कर रहा है।

आज सर्पों का अस्तित्व अनेक खतरों से घिरा हुआ है। वनों की कटाई, बढ़ता शहरीकरण, प्रदूषण, सड़क दुर्घटनाएँ और अंधविश्वास इनके लिए सबसे बड़े संकट बन चुके हैं। मानव बस्तियों के विस्तार के कारण सर्पों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। भोजन और आश्रय की तलाश में वे आबादी वाले क्षेत्रों में पहुँच जाते हैं, जहाँ अक्सर भयवश उन्हें मार दिया जाता है।

हमें सर्पों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त करना चाहिए और अंधविश्वासों और अफवाहों पर विश्वास न करें।‌सर्प दिखने पर उसे मारने के बजाय वन विभाग या प्रशिक्षित रेस्क्यू दल को सूचना दें। बच्चों को वन्यजीव संरक्षण का महत्व समझाएँ। जंगलों और प्राकृतिक आवासों की रक्षा करें।

विश्व सर्प दिवस केवल एक जीव की रक्षा का अभियान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का स्मरण है। सर्प हमारे शत्रु नहीं हैं। वे प्रकृति के संतुलन, कृषि की सुरक्षा और जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। महान वैज्ञानिक दृष्टिकोण यही सिखाता है कि किसी जीव को उसके स्वरूप से नहीं, बल्कि उसके महत्व से पहचानना चाहिए। सर्प भी इस पृथ्वी के उतने ही अधिकारयुक्त निवासी हैं जितने हम।

सर्प नहीं है केवल डर,

प्रकृति का वह सुंदर स्वर।

खेतों का रखवाला बनकर,

चूहों को खाता पल-पल कर।

जंगल, पर्वत, नदी किनारा,

हर जीवन का है सहारा।

अंधविश्वास मिटाना होगा,

ज्ञान का दीप जलाना होगा।

हर प्राणी का मान करें हम,

धरती का सम्मान करें हम।

सर्प बचेंगे, वन बचेंगे,

तभी सुरक्षित जन बचेंगे।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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