स्मार्ट सामग्रियों (Smart Materials) के क्षेत्र में भारत के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) पटना के शोधकर्ताओं ने एक अभिनव हाइब्रिड मैग्नेटो-रियोमीटर विकसित किया है, जो मैग्नेटोरियोलॉजिकल (एमआर) द्रवों के व्यवहार का पहले की तुलना में अधिक सटीक और व्यापक विश्लेषण करने में सक्षम है। यह तकनीक चिकित्सा, एयरोस्पेस, रक्षा, औद्योगिक स्वचालन तथा ऊर्जा-कुशल प्रणालियों के विकास में नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
यह शोध विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सहयोग से किया गया है और इसके निष्कर्ष प्रतिष्ठित शोध पत्रिका Rheologica Acta में प्रकाशित हुए हैं।

क्या हैं मैग्नेटोरियोलॉजिकल (एमआर) द्रव?
मैग्नेटोरियोलॉजिकल (Magnetorheological) द्रव ऐसे “स्मार्ट फ्लूइड” हैं, जिनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे चुंबकीय क्षेत्र के संपर्क में आते ही अपने यांत्रिक गुणों में तीव्र परिवर्तन कर लेते हैं। सामान्य अवस्था में ये तरल पदार्थ की तरह व्यवहार करते हैं, लेकिन चुंबकीय क्षेत्र लागू होने पर इनकी श्यानता (Viscosity) तेजी से बढ़ जाती है और ये श्यानता-लोचदार (Viscoelastic) ठोस जैसी अवस्था ग्रहण कर लेते हैं।
इस परिवर्तन को विद्युतचुंबकीय प्रणाली के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे विभिन्न यांत्रिक प्रणालियों में बल और गति का सटीक नियंत्रण संभव हो जाता है।
अनेक क्षेत्रों में व्यापक उपयोग की संभावना
एमआर द्रवों की नियंत्रित प्रतिक्रिया उन्हें कई उन्नत तकनीकों के लिए उपयुक्त बनाती है। इनका उपयोग विशेष रूप से—
- स्मार्ट ब्रेक एवं क्लच प्रणाली
- शॉक एब्जॉर्बर
- कंपन नियंत्रण प्रणाली
- डैम्पर एवं एक्चुएटर
- चिकित्सा उपकरण
- रक्षा एवं एयरोस्पेस प्रणालियों
जैसे क्षेत्रों में किया जा रहा है। हालांकि वास्तविक परिचालन परिस्थितियों में इन द्रवों का व्यवहार पूरी तरह समझना अब तक एक चुनौती बना हुआ था, विशेषकर संपीड़न (Compression) और कतरनी (Shear) जैसी स्थितियों में।
आईआईटी पटना ने विकसित किया अत्याधुनिक परीक्षण उपकरण
इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आईआईटी पटना के वैज्ञानिकों ने नैनो आयरन पाउडर आधारित मैग्नेटोरियोलॉजिकल द्रव तैयार किए और उनके परीक्षण के लिए एक नया हाइब्रिड मैग्नेटो-रियोमीटर विकसित किया।
यह उपकरण चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति और अनुपस्थिति—दोनों परिस्थितियों में एमआर द्रवों के रियोलॉजिकल (प्रवाह एवं विरूपण) तथा ट्राइबोलॉजिकल (घर्षण एवं घिसाव) गुणों का अध्ययन करने में सक्षम है। इसके माध्यम से संपीड़न और कतरनी दोनों प्रकार के परीक्षण अधिक सटीकता के साथ किए जा सकते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रगति
प्रोफेसर चिरंजीत सरकार के नेतृत्व में विकसित इस प्रणाली में वैज्ञानिकों ने नियंत्रित चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न कर लौह-आधारित एमआर द्रवों पर विभिन्न परिस्थितियों में प्रयोग किए।
हाइब्रिड रियोमीटर की विशेषता यह है कि यह अलग-अलग सामान्य भार (Normal Load) और चुंबकीय परिस्थितियों में एमआर द्रवों के व्यवहार का तुलनात्मक अध्ययन कर सकता है। इससे उन परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है, जिनमें ये द्रव वास्तविक मशीनों और उपकरणों में कार्य करते हैं।
पारंपरिक तकनीकों की तुलना में अधिक प्रभावी
शोधकर्ताओं के अनुसार विकसित प्रोटोटाइप ने पारंपरिक परीक्षण तकनीकों की तुलना में एमआर द्रवों के व्यवहार की अधिक स्पष्ट और व्यापक जानकारी उपलब्ध कराई है। इससे स्मार्ट द्रवों के डिजाइन, गुणवत्ता परीक्षण और औद्योगिक उपयोग को अधिक विश्वसनीय बनाया जा सकेगा।
यह तकनीक शोधकर्ताओं को विभिन्न परिचालन परिस्थितियों में एमआर द्रवों की कार्यक्षमता का विस्तृत विश्लेषण करने का अवसर देती है, जिससे भविष्य की उच्च-प्रदर्शन वाली स्मार्ट सामग्रियों के विकास में सहायता मिलेगी।
अन्य उद्योगों को भी मिलेगा लाभ
हाइब्रिड मैग्नेटो-रियोमीटर का उपयोग केवल मैग्नेटोरियोलॉजिकल द्रवों तक सीमित नहीं है। यह उपकरण विभिन्न सामग्रियों के विस्कोइलास्टिक गुणों का अध्ययन करने में भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार इसका उपयोग निम्न क्षेत्रों में भी किया जा सकता है—
- पॉलिमर उद्योग
- औषधि निर्माण
- खाद्य प्रसंस्करण
- सौंदर्य प्रसाधन उद्योग
- पेट्रोकेमिकल क्षेत्र
- उन्नत सामग्री अनुसंधान
इन क्षेत्रों में उत्पादों की गुणवत्ता, स्थिरता और प्रदर्शन का मूल्यांकन करने के लिए ऐसे उपकरण अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
भविष्य की स्मार्ट प्रौद्योगिकियों की आधारशिला
शोधकर्ताओं का मानना है कि परीक्षण प्रौद्योगिकी में यह प्रगति स्मार्ट सामग्रियों के विकास को नई गति देगी। इससे उद्योग और अनुसंधान संस्थानों को ऐसे उच्च-प्रदर्शन वाले मैग्नेटोरियोलॉजिकल द्रव विकसित करने में सहायता मिलेगी, जिनका उपयोग भविष्य की अनुकूली (Adaptive) तथा ऊर्जा-कुशल तकनीकों में किया जा सकेगा।