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“संस्कृत”  हमारी सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान परंपरा की अमर भाषा

28 अगस्त संस्कृत दिवस

भारत की पहचान केवल उसकी प्राचीन सभ्यता, विविध संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा से ही नहीं, बल्कि उसकी उस भाषा से भी है जिसने हजारों वर्षों तक ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और साहित्य की धारा को प्रवाहित किया। वह भाषा है—संस्कृत। प्रतिवर्ष संस्कृत दिवस हमें अपनी इस अमूल्य भाषाई धरोहर का स्मरण कराता है और यह प्रेरणा देता है कि हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें।

संस्कृत को विश्व की सबसे प्राचीन और व्यवस्थित भाषाओं में गिना जाता है। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, पुराण, आयुर्वेद, योग, ज्योतिष, गणित, नाट्यशास्त्र और दर्शन के असंख्य ग्रंथ इसी भाषा में रचे गए। भारतीय ज्ञान परंपरा का विशाल भंडार संस्कृत में सुरक्षित है। इसलिए संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति और बौद्धिक विरासत की वाहक है।

महर्षि पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी आज भी विश्व के महानतम व्याकरण ग्रंथों में मानी जाती है। भाषा विज्ञान के विशेषज्ञ मानते हैं कि संस्कृत का व्याकरण अत्यंत वैज्ञानिक, तार्किक और सुव्यवस्थित है। यही कारण है कि आधुनिक भाषाविज्ञान और कंप्यूटर विज्ञान के क्षेत्र में भी संस्कृत की संरचना पर समय-समय पर अध्ययन किए जाते रहे हैं।

भारत की अनेक आधुनिक भाषाओं जैसे हिंदी, मराठी, बंगाली, नेपाली, कन्नड़, ओड़िया, गुजराती, असमिया, कोंकणी और अन्य भाषाओं- ‌पर संस्कृत का गहरा प्रभाव है। हमारी दैनिक बोलचाल में प्रयुक्त अनेक शब्द संस्कृत से ही आए हैं। इस प्रकार संस्कृत भारत की भाषाई एकता का भी महत्वपूर्ण आधार है।

अब यह धारणा बन गई है कि संस्कृत केवल पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठानों की भाषा है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं व्यापक है। चिकित्सा, गणित, खगोल विज्ञान, कृषि, पर्यावरण, वास्तुकला, संगीत, नाटक, राजनीति और अर्थशास्त्र जैसे अनेक विषयों पर संस्कृत में उच्चकोटि का साहित्य उपलब्ध है। आचार्य चरक और सुश्रुत के चिकित्सा ग्रंथ, आर्यभट्ट और भास्कराचार्य की गणितीय परंपरा, कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा भरतमुनि का नाट्यशास्त्र इसकी बहुआयामी समृद्धि के प्रमाण हैं।

        नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा पर विशेष बल दिया गया है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में संस्कृत अध्ययन के प्रति बढ़ती रुचि यह संकेत देती है कि युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझना चाहती है। डिजिटल माध्यमों, ऑनलाइन पाठ्यक्रमों और आधुनिक तकनीक के कारण संस्कृत सीखना पहले की तुलना में कहीं अधिक सरल हो गया है।

संस्कृत का संरक्षण केवल सरकार या शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार और समाज भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि घरों में संस्कृत के सरल श्लोक, सूक्तियाँ और नैतिक कथाएँ बच्चों को सिखाई जाएँ, तो उनमें भारतीय संस्कृति के प्रति स्वाभाविक सम्मान विकसित होगा। विद्यालयों में संस्कृत संभाषण, श्लोक प्रतियोगिताएँ और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी इस दिशा में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

वैश्वीकरण के इस दौर में जब अनेक भाषाएँ विलुप्त होने के कगार पर हैं, तब अपनी प्राचीन भाषा और ज्ञान परंपरा का संरक्षण और संवर्धन हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। अपनी जड़ों से जुड़े बिना कोई भी समाज भविष्य का सशक्त निर्माण नहीं कर सकता। संस्कृत हमें केवल अतीत से नहीं जोड़ती, बल्कि वर्तमान को समृद्ध और भविष्य को दिशा भी देती है।

संस्कृत दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम इस महान भाषा को केवल स्मृतियों तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अध्ययन, शोध, संवाद और जनजीवन से जोड़ने का प्रयास करें। जब हमारी युवा पीढ़ी संस्कृत की समृद्ध परंपरा से परिचित होगी, तब वह भारतीय संस्कृति की उस विराट धरोहर को भी समझ सकेगी जिसने विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “तमसो मा ज्योतिर्गमय” जैसे सार्वभौमिक संदेश दिए।

संस्कृत का संरक्षण किसी एक भाषा का संरक्षण नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा, ज्ञान-विज्ञान की परंपरा और राष्ट्रीय अस्मिता के संरक्षण का अभियान है। यही संस्कृत दिवस का वास्तविक संदेश है।

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