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दुनिया जब बुरे दौर में है तब भारत के आर्थिक उजाले

दुनिया आज जिस दौर से गुजर रही है, वह आर्थिक और सामरिक दोनों दृष्टियों से असाधारण चुनौतियों का दौर है। रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभाव, पश्चिम एशिया में तनाव, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा, वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने दुनिया की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के सामने कठिन प्रश्न खड़े कर दिए हैं। ऐसे समय में भारत की अर्थव्यवस्था ने जिस मजबूती का परिचय दिया है, वह केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि बदलते भारत की सामर्थ्य का प्रमाण है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की 7.8 प्रतिशत वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि ने वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत को ऐसी उम्मीद के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसकी ओर दुनिया आश्चर्य और विश्वास दोनों के साथ देख रही है। इस विकास दर ने वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में भारत की आर्थिक शक्ति और आत्मविश्वास को नई ऊंचाई दी है एवं एक उजाला बिखेरा है। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वृद्धि ऐसे समय दर्ज हुई है, जब परिस्थितियां सामान्य नहीं थीं। महंगाई, ऊर्जा संकट, भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास पथ मजबूत बना रहा। पिछले वर्ष इसी तिमाही में विकास दर 6.9 प्रतिशत थी। यानी एक वर्ष में आर्थिक वृद्धि की गति में उल्लेखनीय सुधार दिखाई दिया है। घरेलू मांग की मजबूती, सरकारी पूंजीगत व्यय, विनिर्माण, निर्माण और निर्यात जैसे क्षेत्रों का योगदान इस प्रदर्शन के पीछे महत्वपूर्ण रहा है।

आर्थिक विकास का वास्तविक अर्थ तभी समझ में आता है, जब उसे उसके वैश्विक संदर्भ में देखा जाए। आज दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं केवल आर्थिक नीतियों से प्रभावित नहीं हो रहीं, बल्कि युद्ध, कूटनीतिक तनाव, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक संबंध भी उनकी दिशा तय कर रहे हैं। अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक एवं रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। पश्चिम एशिया का तनाव ऊर्जा बाजार और वैश्विक आपूर्ति तंत्र के लिए चिंता पैदा करता है। इन परिस्थितियों में भारत का अपेक्षाकृत तेज आर्थिक विकास यह संकेत देता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपने लिए ऐसे मजबूत घरेलू आधार तैयार किए हैं, जो बाहरी झटकों को सहने की क्षमता रखते हैं। यही वह परिवर्तन है जो भारत को केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में आगे ले जा रहा है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार है। करोड़ों उपभोक्ताओं की मांग, बढ़ता मध्यम वर्ग, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार, बुनियादी ढांचे पर निवेश और बदलती उपभोग संस्कृति ने अर्थव्यवस्था को आंतरिक गति प्रदान की है। जब वैश्विक बाजार अनिश्चित हों, तब घरेलू मांग अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षा-कवच का काम करती है। इसीलिए वर्तमान विकास दर में घरेलू मांग की मजबूती को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए।

इस आर्थिक प्रदर्शन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि वृद्धि केवल एक क्षेत्र के सहारे नहीं टिकी है। विनिर्माण क्षेत्र में 9.2 प्रतिशत की वृद्धि इस बात का संकेत है कि भारत धीरे-धीरे उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। लंबे समय तक भारत की अर्थव्यवस्था को मुख्यतः सेवा क्षेत्र की शक्ति के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन अब देश में उत्पादन बढ़ाने, घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन देने और बुनियादी ढांचे के विस्तार की दिशा में किए गए प्रयासों से औद्योगिक क्षेत्र के लिए नई संभावनाएं पैदा हुई हैं। निर्माण क्षेत्र भी रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सड़कें, रेल, बंदरगाह, हवाई अड्डे, आवास, औद्योगिक गलियारे और डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश का प्रभाव केवल आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों में नहीं दिखाई देता, बल्कि उससे भविष्य की आर्थिक क्षमता भी निर्मित होती है।

भारत की वर्तमान आर्थिक यात्रा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनाई गई नीतियों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पिछले वर्षों में सरकार ने बुनियादी ढांचे, डिजिटल भुगतान, वित्तीय समावेशन, विनिर्माण, नए उद्यम, आत्मनिर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा और औपचारिक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने पर लगातार जोर दिया है। जनधन खातों से लेकर डिजिटल भुगतान तक और राजमार्गों से लेकर रेलवे के आधुनिकीकरण तक, आर्थिक गतिविधियों का एक व्यापक तंत्र तैयार हुआ है। वस्तु एवं सेवा कर ने देश के बड़े बाजार को अधिक एकीकृत करने में भूमिका निभाई है। दिवाला एवं दिवालियापन संहिता जैसी व्यवस्थाओं ने कारोबारी वातावरण को अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं ने अनेक क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन और निवेश को बढ़ावा दिया है। इन नीतियों का वास्तविक मूल्यांकन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनके परिणामों से होना चाहिए। सकल घरेलू उत्पाद के ताजा आंकड़े इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत अवश्य देते हैं।
आम नागरिक के लिए आर्थिक विकास का अर्थ तभी सार्थक है, जब उसके जीवन में रोजगार के अवसर बढ़ें, आय में वृद्धि हो, महंगाई नियंत्रित रहे, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हों तथा जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार आए। सकल घरेलू उत्पाद हमें अर्थव्यवस्था की गति बताता है, लेकिन यह नहीं बताता कि उस विकास का लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक किस प्रकार पहुंच रहा है। इसलिए भारत की अगली चुनौती तेज विकास से आगे बढ़कर गुणवत्तापूर्ण और समावेशी विकास सुनिश्चित करना है। आर्थिक विकास की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी रोजगार है। विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र का विस्तार इसलिए आशाजनक है क्योंकि ये बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने की क्षमता रखते हैं। लेकिन भविष्य में भारत को ऐसे उद्योगों की आवश्यकता होगी, जो बड़ी संख्या में युवाओं को सम्मानजनक और स्थायी रोजगार दे सकें। भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। यदि उसे कौशल, शिक्षा, तकनीक और रोजगार के पर्याप्त अवसर मिलते हैं तो यही युवा शक्ति भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की सबसे बड़ी ऊर्जा बन सकती है।

भारत का लक्ष्य केवल आत्मनिर्भर बनना नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में नेतृत्वकारी भूमिका निभाना होना चाहिए। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होना नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं को इतना मजबूत करना है कि भारत वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सके। आज दुनिया चीन के विकल्प के रूप में विभिन्न उत्पादन केंद्रों की तलाश कर रही है। भारत के पास विशाल बाजार, युवा मानव संसाधन, तकनीकी क्षमता और लोकतांत्रिक व्यवस्था जैसी विशिष्ट ताकतें हैं। यदि भारत विनिर्माण, अर्धचालक, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष तकनीक और उच्च गुणवत्ता वाली सेवाओं में अपनी क्षमता बढ़ाता है, तो वह वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में कहीं अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है। 2047 का विकसित भारत केवल सरकार का संकल्प नहीं, बल्कि देशवासियों की सामूहिक आकांक्षा है। 7.8 प्रतिशत की विकास दर इस यात्रा में एक उत्साहजनक पड़ाव है, मंजिल नहीं। भारत को लगातार उच्च विकास दर, मजबूत वित्तीय व्यवस्था और स्थिर आर्थिक वातावरण के साथ-साथ बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि उत्पादकता, कौशल विकास, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर भी समान ध्यान देना होगा।

भारत की आर्थिक कहानी अब केवल आंकड़ों की कहानी नहीं रह गई है। यह आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की कहानी बन रही है। दुनिया जब युद्ध और आर्थिक अस्थिरता की छाया में अपनी दिशा तलाश रही है, तब भारत का मजबूत आर्थिक प्रदर्शन उसे एक भरोसेमंद और संभावनाशील शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है। 7.8 प्रतिशत की विकास दर निश्चित रूप से भारत के लिए गर्व का विषय है। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि भारत ने यह संदेश दिया है कि वैश्विक संकटों के बीच भी उसकी आर्थिक बुनियाद मजबूत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही आर्थिक नीतियों और योजनाओं को अब अगले चरण में अधिक रोजगार, अधिक निवेश, अधिक उत्पादन और अधिक समान अवसरों से जोड़ना होगा। भारत के आर्थिक आकाश पर उगता यह उजाला तभी स्थायी प्रकाश बनेगा, जब विकास की रोशनी देश के अंतिम व्यक्ति के जीवन तक पहुंचे। यही 2047 के विकसित भारत की वास्तविक कसौटी होगी और यही आर्थिक शक्ति को जनशक्ति में बदलने का मार्ग भी।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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