2 सितंबर 2026
भारतीय लोकजीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां पर्व और त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते, बल्कि उनके भीतर सामाजिक सरोकार, पारिवारिक भावनाएं, लोकविश्वास और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की भावना भी समाहित रहती है। इन्हीं लोकपर्वों में हरछठ अथवा हलषष्ठी का विशेष स्थान है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व विशेष रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और मंगलकामना के लिए श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।
छत्तीसगढ़ सहित उत्तर और मध्य भारत के ग्रामीण अंचलों में हरछठ की अपनी विशिष्ट लोकपरंपरा है। गांवों में इस दिन महिलाएं प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लेती हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं। लोकमान्यता के अनुसार यह व्रत संतान की रक्षा और उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए किया जाता है। इसीलिए इसे मातृत्व की आस्था और त्याग से जुड़ा पर्व कहा जाता है।
हलषष्ठी का संबंध भगवान बलराम से माना जाता है। भगवान बलराम को कृषि, हल और धरती से जुड़े जीवन का प्रतीक माना गया है। उनके हाथ में धारण किया गया हल केवल एक अस्त्र नहीं, बल्कि भारतीय कृषि संस्कृति में श्रम, अन्न उत्पादन और धरती से मनुष्य के संबंध का प्रतीक है। यही कारण है कि इस पर्व में कृषि संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। भारतीय समाज में जब कृषि जीवन का मुख्य आधार था, तब खेत, बैल, हल और अन्न के प्रति सम्मान केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का हिस्सा था।

हरछठ का सबसे भावनात्मक पक्ष मां और संतान के बीच का वह अटूट संबंध है, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है। मां अपनी संतान के सुख, स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए कठिन व्रत और उपवास करती है। लोकजीवन में मां के इस त्याग को संतान के प्रति उसके निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक माना जाता है। आधुनिक जीवन में भले ही परिवार और जीवनशैली बदल गई हो, लेकिन मां की ममता और संतान के प्रति उसकी चिंता आज भी उतनी ही गहरी है।
हरछठ की पूजा में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक एवं कृषि उत्पादों का प्रयोग किया जाता है। यह परंपरा इस बात की ओर संकेत करती है कि हमारे पूर्वजों ने धर्म और प्रकृति को कभी एक-दूसरे से अलग नहीं माना। हमारे अनेक लोकपर्व मौसम, कृषि चक्र, पशुधन और प्रकृति से सीधे जुड़े हुए हैं। हरछठ भी इसी लोकज्ञान की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
छत्तीसगढ़ को यदि लोकपरंपराओं और ग्रामीण संस्कृति की धरती कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहां के पर्व-त्योहार खेत-खलिहान, पशुधन, लोकगीत और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़े हैं।हरछठ के अवसर पर गांवों में महिलाओं का सामूहिक रूप से पूजा करना, लोककथाओं और लोकगीतों का गायन तथा पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन आज भी हमारी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए है। इन परंपराओं में केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता और परस्पर सहयोग की भावना भी दिखाई देती है।
आज तेजी से बदलती जीवनशैली में हमारी अनेक लोकपरंपराएं धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं। संयुक्त परिवारों के स्थान पर एकल परिवार बढ़ रहे हैं और ग्रामीण जीवन भी आधुनिकता के प्रभाव से बदल रहा है। ऐसे समय में हरछठ जैसे लोकपर्वों का महत्व और बढ़ जाता है। ये पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और नई पीढ़ी को बताते हैं कि हमारी संस्कृति केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि हमारे घरों, खेतों, लोकगीतों और पारिवारिक परंपराओं में जीवित है। हालांकि परंपराओं को जीवित रखते समय उनके मूल मानवीय संदेश को समझना भी आवश्यक है। पर्वों की सार्थकता तभी है जब वे परिवार में प्रेम, समाज में सहयोग और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना बढ़ाएं।
हरछठ अंततः मां के उस प्रेम को नमन करने का पर्व है, जिसमें वह अपनी संतान के लिए स्वयं कष्ट सहने को तैयार रहती है। मां के व्रत में केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि ममता, त्याग, चिंता और संतान के उज्ज्वल भविष्य की कामना समाहित होती है। हम इस पर्व को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में न देखें, बल्कि इसके भीतर छिपे मातृत्व के सम्मान, कृषि संस्कृति के संरक्षण, पशुधन के प्रति संवेदना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता के संदेश को भी समझें। हरछठ हमें यह याद दिलाता है कि जिस धरती से हमें अन्न मिलता है, जिस किसान के श्रम से हमारा जीवन चलता है और जिस मां की ममता हमें जीवन देती है ,इन तीनों के प्रति कृतज्ञ होना हमारी संस्कृति का मूल स्वभाव है। हरछठ-हलषष्ठी के पावन पर्व पर सभी माताओं, परिवारों और समाज के लिए सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य एवं मंगल की कामनाओं सहित।
