छत्तीसगढ़ के विलुप्त होते लोक खेल एवं संस्कृति-मिटती खेल-संस्कृति और लौटती स्मृतियाँ
छत्तीसगढ़ की पहचान केवल उसकी लोकभाषा, लोकगीत, लोकनृत्य, तीज-त्योहार और खान-पान से नहीं है। यहां की मिट्टी ने ऐसी समृद्ध लोक-खेल संस्कृति भी विकसित की थी, जिसमें मनोरंजन के साथ शरीर का व्यायाम, मानसिक चपलता, सामूहिकता, प्रतिस्पर्धा, साहस और सामाजिक मेल-जोल सब कुछ समाहित था। गांव का चौक, गौठान, खेत-खलिहान, नदी का किनारा, स्कूल का मैदान और बरगद की छांव ..कभी यही हमारे खेल मैदान हुआ करते थे। आज परिस्थितियां बदल गई हैं। मोबाइल फोन, वीडियो गेम, इंटरनेट, टेलीविजन और सीमित होते खुले मैदानों ने बच्चों के खेल की दुनिया ही बदल दी है। परिणाम यह है कि गिल्ली-डंडा, डंडा-पचरंगा, बांटी, भौंरा, बिल्लस, फुगड़ी, खुडुवा, पिट्ठुल, गेड़ी दौड़, अट्ठा-पंजा, लंगड़ी दौड़, सांखली, चूड़ी-बिनउल, अटकन-बटकन जैसे अनेक खेल हमारी सामूहिक स्मृति में तो बचे हैं, लेकिन व्यवहार में तेजी से पीछे छूटते जा रहे हैं।
खेल नहीं, जीवन-पद्धति थी
छत्तीसगढ़ के पारंपरिक खेलों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इनके लिए महंगे उपकरणों की जरूरत नहीं होती थी। लकड़ी की छोटी डंडी गिल्ली बन जाती थी, मिट्टी या पत्थर खेल की सामग्री बन जाता था और खेत का किनारा मैदान। कई खेल तो बिना किसी सामग्री के ही खेले जाते थे। लोक-खेलों के शोधकर्ता चंद्रशेखर चकोर ने 1988 से 2001 के बीच छत्तीसगढ़ में प्रचलित 100 से अधिक लोक खेलों का संग्रह किया और उनके नियमों एवं स्वरूपों को दर्ज किया। यही बात इन खेलों की आत्मनिर्भरता को सामने लाती है। खेल खरीदने नहीं पड़ते थे, खेल जीवन के आसपास ही उपलब्ध थे।
गिल्ली-डंडा : गांव के मैदान का सबसे लोकप्रिय खेल
गिल्ली-डंडा को छत्तीसगढ़ के प्रमुख पारंपरिक खेलों में गिना जाता है। राज्य में इसके सात से अधिक स्थानीय स्वरूप दर्ज किए गए हैं। ये सामूहिक, एकल और दलीय – तीनों रूपों में खेले जाते रहे हैं। इस खेल की खूबी यह थी कि खिलाड़ी अपनी जरूरत के अनुसार बेर, बबूल, तेंदू आदि की लकड़ी से गिल्ली और डंडा तैयार कर लेते थे। बबूल की लकड़ी को मजबूत और हल्का होने के कारण उपयुक्त माना जाता था। खुले मैदान, खेत अथवा खलिहान इसके स्वाभाविक खेल-स्थल थे। सोचिए, जिस गांव में दोपहर के समय बच्चों और युवाओं की टोलियां गिल्ली-डंडा खेलते हुए घंटों बिता देती थीं, वहां आज वही मैदान अक्सर वाहन खड़े करने, निर्माण सामग्री रखने या दूसरे उपयोगों में आ गए हैं। खेल का मैदान गया तो खेल भी धीरे-धीरे चला गया।
डंडा-पचरंगा : खेल में साहस और कौशल
डंडा-पचरंगा केवल मनोरंजन का खेल नहीं था। इसके साथ साहस, संतुलन और शारीरिक क्षमता जुड़ी थी। लोक परंपरा में इसे वृक्ष पर चढ़कर खेले जाने वाले जोखिमपूर्ण खेलों में गिना गया है। बरगद जैसे पेड़ इसकी गतिविधियों के लिए उपयुक्त माने जाते थे, क्योंकि उनकी शाखाएं और जटाएं बच्चों को ऊपर चढ़ने-उतरने का सहारा देती थीं। इस खेल की स्मृति केवल ग्रामीण खेल तक सीमित नहीं है। छत्तीसगढ़ की पंडवानी परंपरा में भी डंडा-पचरंगा का उल्लेख मिलता है। लोक-साहित्य में खेल का यह प्रवेश बताता है कि वह समाज के सांस्कृतिक जीवन में कितना गहरा पैठा हुआ था।
गेड़ी : हरेली की उमंग और संतुलन का खेल
छत्तीसगढ़ के पारंपरिक खेलों की चर्चा गेड़ी के बिना अधूरी है। हरेली पर्व आते ही गांवों में बांस की गेड़ियां तैयार होती थीं। बांस में उपयुक्त ऊंचाई पर पैर रखने के लिए खब्चियां लगाई जातीं और बच्चे तथा युवा उन पर चढ़कर चलने, दौड़ने और कभी-कभी प्रतियोगिता करने का आनंद लेते। गेड़ी केवल एक खेल नहीं थी, वह हरेली की सामूहिक पहचान बन गई थी। पारंपरिक वर्गीकरण में गेड़ी को वर्षा ऋतु का खेल माना गया है और हरेली से इसका विशेष संबंध दर्ज है। आज गेड़ी कुछ स्थानों पर हरेली के सांकेतिक आयोजनों में दिखाई अवश्य देती है, लेकिन वह रोजमर्रा के ग्रामीण जीवन का सहज खेल नहीं रही। कभी बच्चे स्वयं गेड़ी तैयार करते थे, संतुलन सीखते थे और गिरते-संभलते हुए चलना सीखते थे। उस प्रक्रिया में खेल के साथ आत्मविश्वास और शारीरिक संतुलन भी विकसित होता था। छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित हरेली के पारंपरिक कार्यक्रमों में भी गेड़ी तथा गिल्ली-डंडा जैसे लोक खेलों का प्रदर्शन किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ये खेल राज्य की सांस्कृतिक विरासत के रूप में आज भी पहचाने जाते हैं।
बांटी, भौंरा और बिल्लस : छोटी सामग्री, बड़ी दुनिया
बांटी अर्थात कंचों का खेल बच्चों की एकाग्रता, निशानेबाजी और
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