बेंगलुरु: भारतीय शोधकर्ताओं ने पहली बार ऐसे क्वांटम मापन का प्रायोगिक प्रदर्शन किया है, जिसका मान सामान्य शास्त्रीय प्रायिकता की एक की सीमा से अधिक है। इस प्रयोग से क्वांटम मापन सिद्धांत (Quantum Measure Theory—QMT) को प्रयोगशाला में परीक्षण योग्य रूप में लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। भविष्य में इसका उपयोग क्वांटम मापन और क्वांटम कंप्यूटिंग से जुड़ी तकनीकों में किया जा सकता है।

यह प्रयोग विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान रमन अनुसंधान संस्थान (RRI), बेंगलुरु के शोधकर्ताओं ने किया। शोध का नेतृत्व आरआरआई की पीएचडी छात्रा संचारी चक्रबर्ती ने वरिष्ठ प्रोफेसर और शोधपत्र की सह-लेखिका उर्बसी सिन्हा के मार्गदर्शन में किया।
संभावित क्वांटम इतिहासों को मापने का प्रयास
क्वांटम यांत्रिकी में आमतौर पर किसी प्रणाली की किसी निश्चित समय पर अवस्था और उस पर किए गए मापन के परिणामों के आधार पर उसकी व्याख्या की जाती है। इसके अलावा क्वांटम प्रणाली को उसके संभावित इतिहासों के माध्यम से भी समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए, किसी प्रयोग में लेजर स्रोत से निकलने वाले फोटॉन के डिटेक्टर तक पहुंचने के कई संभावित रास्ते हो सकते हैं।
क्वांटम मापन सिद्धांत ऐसे संभावित इतिहासों के समूहों को एक विशेष प्रकार का माप प्रदान करता है। इसमें अलग-अलग इतिहासों के बीच होने वाले क्वांटम व्यतिकरण को भी शामिल किया जाता है। यही वह बिंदु है जहां क्वांटम माप सामान्य शास्त्रीय प्रायिकता से अलग व्यवहार कर सकता है।
शास्त्रीय प्रायिकता का मान एक से अधिक नहीं हो सकता। इसके विपरीत, क्वांटम माप किसी चुने हुए इतिहासों के समूह के लिए एक से अधिक हो सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि शोधकर्ताओं ने किसी डिटेक्टर पर एक से अधिक प्रायिकता दर्ज की। वास्तविक फोटॉन-पहचान प्रायिकता हमेशा शून्य और एक के बीच ही रहती है।
आरआरआई ने तैयार किया ‘इवेंट-फ़िल्टर’
इस अवधारणा को प्रयोगात्मक रूप से जांचने के लिए आरआरआई के शोधकर्ताओं ने एक ऑप्टिकल ‘इवेंट-फ़िल्टर’ विकसित किया। इसका उद्देश्य फोटॉन के संभावित मार्गों के एक चयनित समूह को अलग करना और उन मार्गों के बीच मौजूद क्वांटम व्यतिकरण को संरक्षित रखना था।
प्रयोग में लेजर बीम के फोटॉनों को ऑप्टिकल व्यवस्था के भीतर अलग-अलग संभावित रास्तों से गुजारा गया। इसके बाद प्रकाश के ध्रुवीकरण का उपयोग करके इन रास्तों की पहचान की गई और वांछित रास्तों का चयन किया गया। ध्रुवीकरण से संबंधित वह जानकारी बाद में हटा दी गई, ताकि अलग-अलग रास्तों के बीच क्वांटम व्यतिकरण दोबारा प्रभावी हो सके।
शोधकर्ताओं ने प्रयोग के दौरान इनपुट और आउटपुट लेजर शक्तियों को मापा। इन मापों से फोटॉन के डिटेक्टर तक पहुंचने की प्रायिकता का अनुमान लगाया गया। इसके बाद इवेंट-फ़िल्टर के कैलिब्रेशन के आधार पर संबंधित क्वांटम माप निर्धारित किया गया।
1.17 का क्वांटम माप
प्रयोग में चुने गए फोटॉन इतिहासों के समूह के लिए लगभग 1.17 का क्वांटम माप प्राप्त हुआ। उपकरण की खामियों को ध्यान में रखते हुए सैद्धांतिक अनुमान लगभग 1.18 था। प्रयोगात्मक अनिश्चितता की सीमा के भीतर दोनों परिणामों में सामंजस्य पाया गया।
यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 1.17 का मान शास्त्रीय प्रायिकता की एक की सीमा से अधिक है। हालांकि, यहां ‘एक से अधिक’ का संबंध प्रायिकता से नहीं, बल्कि क्वांटम माप से है।
अलग-अलग संभावित फोटॉन मार्गों से आने वाले क्वांटम योगदान तरंगों की तरह एक-दूसरे के साथ व्यतिकरण कर सकते हैं। जब ये योगदान रचनात्मक रूप से जुड़ते हैं, तो उनका संयुक्त प्रभाव सामान्य शास्त्रीय प्रायिकता से अलग दिखाई दे सकता है। इसी क्वांटम व्यतिकरण के कारण संबंधित क्वांटम माप का मान एक से अधिक हो सकता है।
क्वांटम कंप्यूटिंग में संभावित उपयोग
शोधकर्ताओं के अनुसार, भविष्य में इस तरह की व्यवस्था को एक ऐसे फ़िल्टर के रूप में विकसित किया जा सकता है जो फोटॉन के चुने हुए संभावित रास्तों या ‘इवेंट्स’ को चयनित करे, जबकि अन्य फोटॉनों को आगे की क्वांटम प्रक्रियाओं के लिए उपलब्ध रहने दे।
इस तरह की व्यवस्था क्वांटम सूचना प्रसंस्करण में नए प्रकार के प्रयोगों के लिए उपयोगी हो सकती है। विशेष रूप से, यह क्वांटम मापन और क्वांटम कंप्यूटिंग में ऐसे प्रयोगात्मक तरीकों का आधार बन सकती है, जिनमें संभावित क्वांटम इतिहासों के समूहों के साथ काम किया जाता है।
यह अध्ययन इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि क्वांटम मापन सिद्धांत में चर्चा की जाने वाली एक मात्रा को पहली बार प्रयोगशाला में सीधे प्रायोगिक व्यवस्था के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि क्वांटम मापन सिद्धांत की कुछ अवधारणाएं केवल सैद्धांतिक गणना तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नियंत्रित ऑप्टिकल प्रयोगों के माध्यम से उनकी जांच की जा सकती है।
उर्बसी सिन्हा: प्रयोग ने नए प्रश्नों के लिए रास्ता खोला
शोधपत्र की सह-लेखिका और आरआरआई की वरिष्ठ प्रोफेसर उर्बसी सिन्हा ने कहा कि क्वांटम यांत्रिकी के मूलभूत प्रश्नों से उत्पन्न एक विचार को प्रयोगशाला में ऑप्टिकल प्रयोग के रूप में प्रदर्शित करना विशेष रूप से संतोषजनक है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह प्रयोग क्वांटम मापन की समस्या का समाधान प्रस्तुत करने का दावा नहीं करता। हालांकि, इससे उन क्वांटम प्रक्रियाओं से जुड़े प्रश्नों का दायरा बढ़ता है जिन्हें प्रयोगात्मक मापन के साथ जोड़ा जा सकता है।
क्वांटम गुरुत्वाकर्षण से जुड़ी सैद्धांतिक पृष्ठभूमि
क्वांटम मापन सिद्धांत का संबंध क्वांटम गुरुत्वाकर्षण से जुड़े सैद्धांतिक कार्यों से भी रहा है। इसके सह-लेखक राफेल सोर्किन ने क्वांटम गुरुत्वाकर्षण की खोज के दौरान इस दृष्टिकोण को विकसित किया था। सिद्धांत में संपूर्ण इतिहासों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, जिसके कारण इसे अंतरिक्ष-समय में होने वाली क्वांटम प्रक्रियाओं के अध्ययन के लिए एक संभावित ढांचे के रूप में देखा जाता है।
हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान प्रयोग क्वांटम गुरुत्वाकर्षण के किसी सिद्धांत का परीक्षण नहीं करता। इसका मुख्य उद्देश्य क्वांटम मापन सिद्धांत में वर्णित एक विशेष प्रकार के मापन को प्रयोगात्मक रूप से सुलभ बनाना था।
राफेल सोर्किन, जो कनाडा के पेरिमीटर इंस्टीट्यूट फॉर थियोरेटिकल फिजिक्स से जुड़े रहे और आरआरआई में विशिष्ट अतिथि संकाय सदस्य भी थे, का 12 सितंबर 2026 को निधन हो गया। उनका निधन शोधपत्र स्वीकार किए जाने के कुछ ही समय बाद हुआ। उर्बसी सिन्हा ने कहा कि यह शोधपत्र उनके लिए व्यक्तिगत और वैज्ञानिक, दोनों दृष्टियों से विशेष महत्व रखता है।