-11 अक्टूबर : अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस-
बेटी केवल घर की मुस्कान नहीं, वह समाज के भविष्य की आधारशिला है। जिस समाज में बेटियां सुरक्षित, शिक्षित, स्वस्थ और आत्मनिर्भर होती हैं, उस समाज की प्रगति अधिक मजबूत और स्थायी होती है। इसके बावजूद आज भी दुनिया के अनेक हिस्सों में बालिकाओं को जन्म से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा और अपने भविष्य का निर्णय लेने तक अनेक असमानताओं का सामना करना पड़ता है। यही कारण है कि 11 अक्टूबर का अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस महज एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि समाज के आत्ममंथन का अवसर है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 19 दिसंबर 2011 को प्रस्ताव 66/170 के माध्यम से 11 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस घोषित किया और 2012 से यह दिवस मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य बालिकाओं के सामने मौजूद चुनौतियों को सामने लाना, उनके अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयासों को गति देना है।

वर्ष 2026 में संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस की थीम रखी है—“End child marriage and invest in girls’ rights”, अर्थात “बाल विवाह समाप्त करें और बालिकाओं के अधिकारों में निवेश करें।” यह थीम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बाल विवाह केवल एक सामाजिक कुरीति नहीं, बल्कि बालिका के बचपन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और भविष्य के अधिकारों को प्रभावित करने वाली गंभीर समस्या है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया में हर वर्ष 1.2 करोड़ से अधिक लड़कियों का विवाह वयस्क होने से पहले हो जाता है। इसका अर्थ है कि लगभग हर तीन सेकंड में एक लड़की का बचपन विवाह की जिम्मेदारियों के नीचे दब जाता है। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं है। इसके पीछे उन बेटियों की अधूरी पढ़ाई, अधूरे सपने, स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के सीमित अवसर छिपे हैं।
अब हम बेटी बचाने और बेटी पढ़ाने की बातें करते हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या बेटी के जन्म को हमने वास्तव में उतनी सहजता से स्वीकार किया है जितना बेटे के जन्म को? लिंग आधारित भेदभाव, भ्रूण हत्या, पोषण में असमानता, शिक्षा में भेदभाव, बाल विवाह, बाल श्रम, घरेलू हिंसा और यौन हिंसा जैसी चुनौतियां आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। कई परिवारों में बेटे की शिक्षा को निवेश और बेटी की शिक्षा को खर्च मानने की मानसिकता अब भी दिखाई देती है। बेटी को यह अधिकार होना चाहिए कि वह क्या पढ़ेगी, किस क्षेत्र में आगे बढ़ेगी, अपने जीवन का क्या लक्ष्य चुनेगी और कब विवाह करेगी। उसकी जिंदगी का फैसला केवल इसलिए दूसरे लोग नहीं कर सकते कि वह लड़की है।
बालिका सशक्तिकरण का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा है। शिक्षित लड़की केवल अपना भविष्य नहीं बदलती, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी प्रभावित करती है। लेकिन स्कूल तक पहुंचना ही पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि बालिका की शिक्षा निरंतर बनी रहे। विद्यालय में सुरक्षित वातावरण, अलग एवं स्वच्छ शौचालय, मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता सुविधाएं, सुरक्षित परिवहन, डिजिटल संसाधन और जरूरतमंद परिवारों के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध हो। ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में इन सुविधाओं का महत्व और बढ़ जाता है। विशेष रूप से वंचित एवं कमजोर सामाजिक- आर्थिक पृष्ठभूमि की बालिकाओं के लिए छात्रवृत्ति, आवासीय शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना आवश्यक है।
बाल विवाह रोकने के लिए कानून आवश्यक हैं, लेकिन कानून तभी प्रभावी होंगे जब समाज की मानसिकता भी बदलेगी। गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक दबाव और सुरक्षा की चिंता जैसे कारण कई परिवारों को कम उम्र में बेटियों का विवाह करने की ओर धकेलते हैं। इसलिए समाधान केवल कार्रवाई तक सीमित नहीं होना चाहिए। परिवारों को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा, बालिकाओं को शिक्षा एवं कौशल, और समुदायों को जागरूकता प्रदान करनी होगी। संयुक्त राष्ट्र का 2026 का संदेश भी यही रेखांकित करता है कि बाल विवाह रोकने के लिए बालिकाओं को स्कूल में बनाए रखना, परिवारों के आर्थिक अवसर बढ़ाना, सामाजिक एवं कानूनी संरक्षण मजबूत करना तथा भेदभावपूर्ण सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देना जरूरी है।
बालिका के स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन के बिना सशक्तिकरण अधूरा है। किशोरावस्था में पोषण, एनीमिया की रोकथाम, मासिक धर्म स्वच्छता, मानसिक स्वास्थ्य, टीकाकरण और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी है। कई बार बेटियों की अपनी स्वास्थ्य समस्याओं को परिवार में प्राथमिकता नहीं मिलती। यह सोच बदलनी होगी। बेटी के स्वास्थ्य पर किया गया खर्च खर्च नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य में किया गया निवेश है।
आज की बालिका के सामने अवसरों के साथ नई चुनौतियां भी हैं। इंटरनेट और डिजिटल तकनीक शिक्षा और रोजगार के नए रास्ते खोल रहे हैं, लेकिन साइबर बुलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न, अश्लील सामग्री, डिजिटल धोखाधड़ी और सोशल मीडिया के मानसिक दबाव जैसी समस्याएं भी सामने हैं।इसलिए बालिकाओं को केवल डिजिटल उपकरण देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा और सुरक्षित इंटरनेट व्यवहार का प्रशिक्षण भी देना होगा। आज की बेटी को किताब के साथ कंप्यूटर, विज्ञान के साथ तकनीक और शिक्षा के साथ आत्मरक्षा एवं कानूनी अधिकारों की जानकारी भी चाहिए।
बालिकाओं को हमेशा पीड़ित या संरक्षण की जरूरत वाली इकाई के रूप में देखने की मानसिकता भी बदलनी होगी। दुनिया में लड़कियां विज्ञान, खेल, प्रशासन, सेना, कला, साहित्य, उद्यमिता और तकनीक सहित हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित कर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र भी इस बात पर जोर देता है कि लड़कियां केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि नेता, परिवर्तनकारी और निर्णय प्रक्रिया की सक्रिय भागीदार हैं। इसलिए बालिकाओं के लिए नीतियां बनाते समय उनकी आवाज सुनना भी उतना ही जरूरी है। जिस समस्या को लड़की स्वयं झेल रही है, उसके समाधान में उसकी राय सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है।
बालिका सशक्तिकरण की पहली पाठशाला परिवार है। यदि घर में बेटे और बेटी के लिए अलग-अलग नियम हैं, बेटे को स्वतंत्रता और बेटी को बंदिशें हैं, बेटे की सफलता पर उत्सव और बेटी की सफलता पर मौन है, तो समाज में समानता की बात अधूरी ही रहेगी। बेटियों को केवल यह न सिखाएं कि उन्हें अपनी रक्षा कैसे करनी है। बेटों को भी यह सिखाना होगा कि महिलाओं और लड़कियों का सम्मान कैसे किया जाता है। समानता का अर्थ बेटियों को बेटों जैसा बनाना नहीं, बल्कि दोनों को समान अधिकार, सम्मान, अवसर और स्वतंत्रता देना है।
“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियानों ने सामाजिक विमर्श को नई दिशा दी है। अनेक क्षेत्रों में बालिका शिक्षा और अवसरों में सुधार भी हुआ है। संयुक्त राष्ट्र और UNICEF के अनुसार पिछले 25 वर्षों में शिक्षा, कानूनी सुधार और सामाजिक सुरक्षा में निवेश के कारण अनुमानतः 6.8 करोड़ बाल विवाह टाले जा सके हैं। यह प्रमाण है कि सही दिशा में किए गए प्रयास परिणाम दे सकते हैं। लेकिन उपलब्धियां हमें संतुष्ट होकर बैठ जाने का कारण नहीं देतीं। अभी भी ऐसी बालिकाएं हैं जो स्कूल नहीं पहुंच पातीं, कम उम्र में विवाह के लिए मजबूर होती हैं, कुपोषण से जूझती हैं, हिंसा का शिकार होती हैं या डिजिटल दुनिया से बाहर रह जाती हैं। इसलिए अब लक्ष्य केवल ‘बेटी बचाना’ नहीं होना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए..बेटी को सुरक्षित बचपन देना, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना, स्वस्थ जीवन देना, अपने निर्णय का अधिकार देना और उसके सपनों को उड़ान देना।
किसी देश की वास्तविक प्रगति केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद, ऊंची इमारतों या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जा सकती। यह भी देखना होगा कि उस देश की बेटियां कितनी सुरक्षित हैं, कितनी शिक्षित हैं और उन्हें अपने जीवन के फैसले लेने की कितनी स्वतंत्रता है। यदि एक बेटी डॉक्टर बनना चाहती है तो उसे अवसर मिले। वैज्ञानिक बनना चाहती है तो प्रयोगशाला तक पहुंचे। खिलाड़ी बनना चाहती है तो मैदान मिले। पत्रकार, साहित्यकार, सैनिक, इंजीनियर, वकील, उद्यमी या जनप्रतिनिधि बनना चाहती है तो उसके रास्ते में केवल इसलिए दीवार न खड़ी की जाए कि वह लड़की है। बेटी पर दया नहीं, अधिकार चाहिए। बेटी को संरक्षण ही नहीं, अवसर चाहिए। बेटी को केवल सुरक्षा नहीं, स्वतंत्रता भी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर यही संकल्प होना चाहिए कि हम बेटियों के लिए केवल शुभकामनाएं नहीं देंगे, बल्कि उनके अधिकारों के लिए परिवार, समाज और व्यवस्था हर स्तर पर जिम्मेदारी निभाएंगे। क्योंकि जिस दिन किसी बेटी को अपने सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए अपने लिंग का प्रमाण नहीं देना पड़ेगा, उसी दिन वास्तविक समानता की शुरुआत होगी।
सच कहूं तो सृजन का आधार हैं बेटियां,
फिर भी न जाने क्यों लाचार हैं बेटियां।
किसी की मुस्कुराहट, किसी का प्यार हैं बेटियां,
मुसीबतों से लड़तीं, मजबूत दीवार हैं बेटियां।
जिस घर में पांव रखकर करतीं गृह-प्रवेश,
लक्ष्मी बनकर उस घर को संवारती हैं बेटियां।
फिर भी क्यों जन्म से पहले ही,
कोख में मार दी जाती हैं बेटियां?
बेटी को जन्म लेने दो, बेटी को पढ़ने दो,
बेटी को बढ़ने दो
क्योंकि बेटी का भविष्य ही राष्ट्र के भविष्य की पहली रोशनी है।।

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस