NEW English Version

पत्रकारिता का आईना: क्या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अब भी उतना ही मज़बूत है?

“जब कलम सत्ता से प्रश्न पूछना छोड़ दे, तब लोकतंत्र के मौन होने की शुरुआत हो जाती है।”

       लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा गया है। इसका उद्देश्य किसी सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि सत्ता, समाज और जनता के बीच सत्य का सेतु बनना है। पत्रकारिता का धर्म केवल समाचार देना नहीं, बल्कि जनचेतना जगाना, सत्ता से जवाब मांगना और उन लोगों की आवाज़ बनना है जिनकी आवाज़ सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुँचती। लेकिन आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या पत्रकारिता अपने मूल धर्म पर अडिग है, या वह बाजार, सत्ता, तकनीक और वैचारिक ध्रुवीकरण के दबाव में अपनी दिशा खोती जा रही है?

      एक समय था जब किसी गाँव में पत्रकार के पहुँचते ही लोगों की आँखों में उम्मीद दिखाई देती थी। उन्हें विश्वास होता था कि अब उनकी पीड़ा शासन तक पहुँचेगी। आज स्थिति यह है कि खबर से पहले पत्रकार की विचारधारा, संस्थान और निष्ठा पर बहस शुरू हो जाती है। यह परिवर्तन केवल पत्रकारिता का नहीं, बल्कि समाज के विश्वास का संकट है।

      आज खबरों की प्रतिस्पर्धा सत्य की नहीं, बल्कि सबसे पहले दिखाने, सबसे अधिक क्लिक पाने और अधिकतम टीआरपी हासिल करने की हो गई है। अनेक मंचों पर सनसनी, शोर और बहस ने तथ्यों की जगह ले ली है। सूचना की गति बढ़ी है, लेकिन उसकी गहराई और विश्वसनीयता कई बार कम होती दिखाई देती है।

      डिजिटल युग ने हर नागरिक को सूचना देने का माध्यम बना दिया है, लेकिन सूचना और सत्य एक ही बात नहीं हैं। अपुष्ट सूचनाएँ, फेक न्यूज़, आधे-अधूरे वीडियो, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से तैयार भ्रामक सामग्री और सोशल मीडिया की अफवाहें आज पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियाँ बन चुकी हैं। ऐसे समय में तथ्य-जांच (फ़ैक्ट-चेकिंग) पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गई है।

       सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि जमीनी पत्रकारिता लगातार सिमट रही है। गाँव, किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी, सरकारी विद्यालय, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, आदिवासी क्षेत्र, महिलाओं और युवाओं की समस्याएँ अक्सर राष्ट्रीय विमर्श से बाहर रह जाती हैं। कई बार प्रेस विज्ञप्तियाँ ही समाचार बन जाती हैं, जबकि खोजी और जनपक्षधर पत्रकारिता कठिन होती जा रही है।

       देश के छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत हजारों संवाददाता सीमित संसाधनों के बीच दिन-रात कार्य करते हैं। वे अपने खर्च पर यात्रा करते हैं, जोखिम उठाते हैं, घटनास्थलों तक पहुँचते हैं और स्थानीय समस्याओं को उजागर करते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इन्हीं पत्रकारों को पर्याप्त आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सम्मान, प्रशिक्षण और संस्थागत संरक्षण अक्सर नहीं मिल पाता। पत्रकारिता की रीढ़ मजबूत तभी होगी जब उसकी नींव मजबूत होगी।

     पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा संकट केवल बाहरी दबाव नहीं, बल्कि आत्म-सेंसरशिप है। जब पत्रकार भय, विज्ञापन, राजनीतिक दबाव, संस्थागत हित या व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण प्रश्न पूछने से पहले ही स्वयं को रोकने लगे, तब लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण प्रहरी कमजोर होने लगता है। लोकतंत्र में पत्रकार का पहला दायित्व सत्ता से असहज प्रश्न पूछना है, न कि केवल सुविधाजनक प्रश्न।

       यह भी सच है कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता केवल सरकारों से नहीं, स्वयं मीडिया से भी जुड़ी है। यदि समाचार और विज्ञापन के बीच की रेखा धुंधली होगी, यदि तथ्य और राय का अंतर समाप्त होगा, यदि निष्पक्षता की जगह पक्षधरता हावी होगी, तो सबसे बड़ी क्षति जनता के विश्वास की होगी। और याद रखिए पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी न भवन है, न कैमरा, न तकनीक; उसकी सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास है।

      आज आवश्यकता किसी पक्ष की पत्रकारिता नहीं, बल्कि जनपक्षीय पत्रकारिता की है। ऐसी पत्रकारिता जो किसान की फसल, मजदूर की मजदूरी, युवा के रोजगार, छात्र की शिक्षा, मरीज के उपचार, महिला की सुरक्षा, पर्यावरण, स्थानीय प्रशासन और भ्रष्टाचार जैसे वास्तविक मुद्दों को प्राथमिकता दे। पत्रकार का दायित्व किसी दल, व्यक्ति या विचारधारा का प्रवक्ता बनना नहीं, बल्कि संविधान की मूल भावना, सत्य, न्याय, पारदर्शिता और जनहित का प्रहरी बनना है।

      अंततः पत्रकारिता की पहचान किसी प्रेस कार्ड, विशेषाधिकार, सरकारी सुविधा या वीआईपी प्रवेश से नहीं होती। उसकी पहचान उसके साहस, उसकी ईमानदारी, उसकी निष्पक्षता और उसके द्वारा पूछे गए उन कठिन प्रश्नों से होती है जिन्हें पूछने का साहस बहुत कम लोग करते हैं। इतिहास हमेशा उन पत्रकारों को याद रखता है जिन्होंने सत्ता के सामने सिर नहीं झुकाया, बल्कि सत्य के सामने सिर झुकाया।

      यदि लोकतंत्र को जीवित रखना है, तो पत्रकारिता को निर्भीक रखना होगा। यदि पत्रकारिता को जीवित रखना है, तो जनता का विश्वास बचाना होगा। और यदि जनता का विश्वास बचाना है, तो सत्य को किसी भी कीमत पर बिकने नहीं देना होगा।

” यही पत्रकारिता का धर्म है, यही उसका स्वाभिमान है, और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। “

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस

Book Showcase

Best Selling Books

Ikigai: The Japanese secret to a long and happy life

By Héctor García, Francesc Miralles

₹318

Book 2 Cover

Why I am an Atheist and Other Works

By Bhagat Singh

₹104

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

Until Love Sets Us Apart

By Aditya Nighhot

₹176

Translate »