द्वार पर खड़ा पेड़
दिखता है अकेला,
प्रकृति की साख संजोए,
पेड़ कभी अकेला नहीं होता
साथ होती है उसकी छाया,
जुड़ी होती हैं शाखाएं,
फूल-पत्ते और रसीले फल,
जो संजोते हैं सर्जना के बीज।
पेड़ कभी अकेला कहाँ होता है ?
पेड़ जैसे ही तो होते हैं पिता
जिनके साथ होती है मां,
छाया रूपी जीवनसंगिनी,
होते हैं बच्चे,
शाखाओं की तरह
करते खुद को पुष्ट, विकसित
जैसे फूल-पत्ते और रसीले फल।
रहते हैं अडिग पेड़ तूफ़ानों में भी
अपनी मजबूत जड़ों की बदौलत।
पाकर खाद-पानी और पोषण।
पिता झेल जाते है विपत्तियाँ
निशब्द, मुस्कुराते हुए
संभाले अपनी संस्कृति की विरासत,
बनते है छत्रछाया
दुख-संताप में
पिता भी कहाँ अकेले होते हैं
पिता का ही प्रतिरूप होते है पेड़।
पेड़ जैसे ही तो होते हैं पिता
पिता का ही प्रतिरूप होते हैं पेड़।
