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 तोर कसम नोनी के दाई , दारू नई पिहौं 

समारु अपन घर में परिवार के साथ खाना खाए बर बइठे हे। दुनो लईका मन भी…

सिर्फ अपना ही क्यों ?

ज़िंदगी की भागदौड़ में हम सभी इतना भाग रहे हैं कि पीछे मुड़ने तक का वक्त…

टूटी हुई ज़िंदगी का साया

कनक ने मानो बचपन देखा ही नहीं था। घर की जिम्मेदारी के बोझ ने उसको उम्र…

शांति घोष और सुनीति चौधरी : क्रांति की प्रेरक एवं निर्भय मशाल

वह 14 दिसम्बर, 1931 की एक सामान्य सुबह थी। प्रकृति ने शीत ऋतु की चादर ओढ़…

रोमांचक घटना: जिंदगी मझधार में

बस पूरी रफ्तार से दौड़ी चली रही थी, बस के अंदर बैठे मेरे विचारों की रफ्तार…

स्नेहल रिश्तों की कहानी- बुलबुल

सन् 2025 के अप्रैल महीने की बात है, दिन के करीब बारह बज रहे थे। मैं…

मझधार में नाव

बस पूरी रफ्तार से दौड़ी चली रही थी, बस के अंदर बैठे मेरे विचारों की रफ्तार…

पहली कविता: सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

मैं जब सन् 1983 में कक्षा ग्यारहवीं स्कूल लाल बहादुर शास्त्री हायर सेकेंडरी बिलासपुर में पढ़…

सच्ची घटना पर आधारित: रॉकी

यह बात उन दिनों की है जब सन 1983- 84 में मैं हायर सेकेंडरी बोर्ड 11वीं…

अंधेरी स्याह भीगती सर्द रात की वो सुबह….? 

पूस की उस घनी अंधेरी स्याह और सर्द रात में मैं टीने के टपरी नुमा शेड…

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