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स्नेहल रिश्तों की कहानी- बुलबुल

 सन् 2025 के अप्रैल महीने की बात है, दिन के करीब बारह बज रहे थे। मैं घर के ड्राइंग रूम में बैठा हुआ खाना खा रहा था, की तभी अचानक खाना रोककर मैंने बाहर से आती हुई आवाजों पर ध्यान दिया तो  लगा जैसे बुलबुल की आवाज़ आ रही हो। लगा जैसे दो बुलबुल आपस में बात कर रहे हों। इस तरह उनकी चहचहाने की आवाज़ें आ रही थी। इतना सुनकर और कुछ समझ कर मेरे चेहरे पर अकस्मात चमक आ गई। बुलबुल की आवाज़ सुनकर मेरे मन में एक खुशी की लहर दौड़ गई थी।

दरअसल हमारे घर में इस बुलबुल के जोड़े के आने का इंतजार, जो कई दिनों से चल रहा था, अब उसके खत्म होने के संकेत मिल चुके थे। बस यही कारण था कि मैं बहुत खुश हो गया। बुलबुल और मेरे बीच महीनों नहीं पिछले अनेक वर्षों से  एक अनजाना सा और अटूट प्रेमल रिश्ता बना हुआ है। पिछले तीस पैंतीस सालों से बने इस रिश्ते को आज भी बुलबुल का परिवार और हमारा परिवार निभाता चला आ रहा है। और आज अभी बुलबुल की आती हुई आवाज ने फिर से इस रिश्ते को और पुख्ता और अटूट बने रहने की मुहर लगा दी थी। बस यही हमारी एक अनजानी सी और अनोखे से रिश्ते की अनवरता पर खुशियों से मन भर गया था। इस बुलबुल का हमारे घर और हमारे साथ बना हुआ या रिश्ता बीते कई वर्षों से युं ही बना हुआ है। यह कहानी तो लंबी है लेकिन आज मैं इस अनोखे रिश्ते की कहानी आप सभी के समक्ष जरूर बयां करूंगा। 

यह कहानी करीब पैंतीस वर्षों पूर्व शुरू हुई थी उस समय हमारा घर आज की तुलना में छोटा हुआ करता था। जो कि हमारे परिवार के लिए पर्याप्त था, हां यह जरूर था कि उस जमाने में घर का आंगन बहुत बड़ा होता था, और आंगन में समझो एक बगीचा भी बना हुआ था। जिसमें तरह-तरह के फूल और फलों के पौधे लगे हुए थे जैसे अशोक, सीताफल, आम, पपीता, अमरूद ,कनेर, मगरमस्त, मूंगा सहित और भी बहुत से पेड़ थे। जाहिर है बाग होने के कारण कई प्रकार के पंछियों का डेरा भी इन पेड़ों पर लगा रहता था। इन पर उनका बसेरा भी था। सुबह से शाम तक कौवों की कांव-कांव गौरैयों की चहचहाटों सहित मिट्ठू कबूतर और बुलबुल की आवाज़ें आती रहती थीं। 

हमारा घर इन पंछियो की आवाजों से दिनभर गूंजायमान बना रहता था। पंछियों की इन आवाजों और कलरव के हम सभी इतने आदी हो चुके थे कि थोड़ी भी निरवता या खामोशी में ही हमें आभास हो जाता था कि आज पेड़ों पर कोई पंछी नहीं है । उसे जमाने में अगल-बगल के घरों में भी आंगन और पेड़ हुआ करते थे। जिससे  चारों तरफ हरियाली की बहुतायत थी, यही वजह था कि पंछियों का डेरा हमेशा ही बना हुआ था। धीरे-धीरे समय बीतता गया। समय के साथ लोगों के घर भी बड़े होते गए। इंट कंक्रीट का जला बिछता चला गया। और ठीक इसके उल्टे आंगन बगीचे भी छोटे और कम होते चले गए। इस बदलाव में हमारा घर हमारा घर भी अछूता नहीं था। हमारा घर भी कुछ बड़ा हुआ। नए निर्माण हुए फलतः आंगन छोटा होता चला गया। इस होने वाले बदलाव के कारण आसपास के घरों सहित मेरे भी घर के पेड़ धीरे-धीरे कटते चले गए। और बस….उसी रफ्तार से ईन पंछियों का डेरा भी छुटता चला गया, अब तो धीरे-धीरे खत्म भी हो चुका है।अब तो ऐसा हाल है कि गौरैया, कौवा, मैना, कोयल तो बिल्कुल भी दिखाई नहीं देते हैं। इनके ना होने से और पंछियों के चले जाने से एक अजीब सा खालीपन और खामोशी छाई रहती है। तब यह देखकर मेरे मन में न जाने क्यों एक मुजरिम होने सा एहसास उठने लगता है की क्या….? कुछ हमसे गलत हो गया? क्या हमने पंछियों के साथ कुछ नाइंसाफ़ी कर दी। ना जाने कैसे कैसे ऐसे ही कई सवालातों के घेरे में मन फंस जाता है। 

 पर एक कोने में कहीं ना कहीं एक खुशनुमा सा एहसास बचा हुआ महसूस होता है। इन सभी नकारात्मकता, सूनेपन छाई हुई खामोशियों के बीच एक रिश्ता आज भी जीवंत है, जो हमेशा से बना हुआ है। और वह रिश्ता एक बुलबुल जोड़े के हमारे परिवार के साथ है। जो बुलबुल जोड़े ने आज तक हमारे घर से अपना डेरा नहीं छोड़ा। ये बुलबुल जोड़ा आज भी हर वर्ष ठीक अप्रैल  माह में किसी भी दिन घर के आसपास आ जाते हैं । ये बुलबुल जोड़ा घर के ही इर्दगिर्द मंडराते उड़ते रहते हैं। इस बीच दिनभर नर बुलबुल मादा बुलबुल के लिए चारा ढूंढ ढूंढ कर लाता रहता है और उसे खिलाता रहता है। इस दौरान हमारा घर इन बुलबुलों की चहचहाटों से दिन भर गूंजते रहता है। इसे सुनना कितना आनंदायक प्रतीत होता है यह तो केवल हम ही लोग बता सकते हैं और महसूस कर सकते हैं। 

बुलबुल और हमारे बीच बने हुए इस अनजाने से रिश्ते का हमें कुछ भान भी नहीं था। इस रिश्ते को तो हमने करीब चौदह वर्ष पहले ही जाना और समझा था। बस तभी से बुलबुल परिवार के साथ हमारा परिवार पूरी गंभीरता और सुरक्षा से पेश आने लगा था। अब तो यह बुलबुल न जाने कैसे हमें अपना एक परिवार ही का हिस्सा लगने लगे थे। इनके न दिखने पर  मन क्यों उदास हो जाता था शायद भावनाओं में भटक कर में विषयांतर कर बैठा हूं चलिए अपनी बात फिर से सिलसिलेवार बताता हूं। 

बुलबुल और हमारे परिवार के बीच रिश्ते की को जब हमने जाना और समझा था। जब उन दिनों बुलबुल जिन पेड़ों पर अपने घोसले बनाती थी आ रही थी। उस अशोक के पेड़ को हम लोगों ने मजबूरीवश कटवा दिया। लेकिन बुलबुल परिवार भी शायद हमारे घर आंगन को छोड़ना ही  नहीं चाहते थे। उन दिनों बुलबुल के जोड़े ने इसके बाद घर में ही लगे हुए एक अन्य आम के पेड़ पर अपना घोंसला बना लिया। फिर यह सिलसिला चल ही रहा था कि सन् 2017 के समय घर बनाने के लिए मुझे आंगन के बचे हुए हिस्से पर लगे आम के पेड़ को भी कटवाना पड़ गया। पर वाह रे बुलबुल का परिवार उसे हमारा घर तो शायद छोड़ना ही गवारा नहीं था। बुलबुल ने आखिरी पेड़ काटने के बाद जहां पेड़ लगा हुआ था उसके सामने ही घर के लेंटर से निकले हुए छज्जे में जिसमें एक नारियल की रस्सी बंधी हुई थी। उसी रस्सी में मनी प्लांट की बेलें लिपटी भरी हुई थी। बस उसी रस्सी और मनी प्लांट के बीच बुलबुल ने अपना घोसला बना लिया। और यही घोंसला आज भी मेरे घर में मौजूद और सही सलामत है। 

हर साल बुलबुल का जोड़ा आता है। और इस घोसले को मरम्मत करके फिर से अंडे देता है,अंडे सेने के बाद दो या तीन बच्चे जब निकलते हैं तो फिर इन्हें बुलबुल जोड़ा उड़ना सीखाते हैं। एक डेढ़ महीने तक जब बच्चे उड़ना सीख जाते हैं बड़े हो जाते हैं, तो फिर पूरा परिवार उड़ जाता है। और फिर प्रतिवर्षानुसार अंडा देने के समय यानी अप्रैल माह के बीच यह परिवार पुनः घर के घोंसले के आसपास मंडराने लगता है, और फिर से वही सिलसिला प्रतिवर्ष की भांति चलता रहता है। हम लोगों ने जब पहले पहल देखा की बुलबुल ने रस्सी पर ही घोंसला बना दिया है। तभी से हम परिवार के लोगों ने उसके घोसले की रखवाली और सुरक्षा का ख्याल रखकर कभी भी घोसले को कुछ नहीं होने दिया। इसी घोसले में बुलबुल पिछले कई सालों से अंडे देती आ रही है। प्रत्येक वर्ष के अप्रैल आते ही बुलबुल का जोड़ा घर में आ जाता है और आसपास उड़ते रहते हैं। इसके पहले ये बुलबुल कहां-कहां उड़ते घूमते रहते हैं पता ही नहीं चलता। हां कभी-कभी उनकी किसी मुंडेर से आवाज़ें भी सुनाई देती रहती है। 

 उनकी आवाज़ सुनकर ही समझ में आता है कि यही बुलबुल का परिवार आसपास है। और जब ये अंडे देने के समय आते हैं तो कुछ दिन तक अपने पुराने पड़े हुए घोसले को फिर से मजबूती देने कहां-कहां से घास फूस चोंच में बटोर बटोर के लाते हैं और घोसले को बुनकर मजबूत बना देते हैं। घोसला मजबूत स्थिति में लाने के बाद फिर उसपर मादा बुलबुल अंडे देने के लिए बैठ जाती है। इस बीच करीब बीस बाईस दिनों तक लगातार मादा घोसले में ही बैठी रहती है। नर बुलबुल पूरे दिन उसके लिए दाना चारा लाकर उसे खिलाता रहता है। रात को फिर वह न जाने किसी पेड़ पर जाकर बैठ जाता है, सुबह होते ही फिर घोंसले के पास नर बुलबुल आ जाता है। इन सब के बीच हम लोग भी बुलबुल के जोड़े का पूरा ध्यान रखते हैं। दोनों बुलबुल के लिए दाना पानी घोंसले के पास ही नीचे सीढ़ी में रख देते हैं, जिनको वे लोग हमारे नहीं रहने पर आकर चुग लेते हैं। घर में आस-पास की एक दो बिल्लियां भी आती जाती रहती हैं, उसे भी हम समय-समय पर भगाते रहते हैं। ताकि बुलबुल के लिए खतरा न रहे। कुछ दिन बीतने के बाद बुलबुल बच्चों की घोसला से बारीक और धीमी धीमी आवाज़ें आने लगती हैं, तब हम समझ जाते हैं कि घोंसले के अंदर बच्चे मौजूद हैं। बच्चे निकलने के कुछ दिन बाद मादा भी घोसले को छोड़कर नर के साथ दाना चारा ढूंढ कर लाती और बच्चों को दोनों मिलकर खिलाते है। करीब बीस दिन होते-होते बच्चे भी बड़े हो जाते हैं और अपने मां-बाप के आकार में आ जाते हैं। इसके बाद नर और मादा बुलबुल बच्चों को उड़ने की ट्रेनिंग देना शुरू करते हैं। बच्चे भी धीरे-धीरे आसपास छोटी -छोटी उड़ानें भरकर मुंडेर, सीढ़ी आदि पर बैठ जाते। इस बीच नर और मादा बुलबुल साए की तरह बच्चों के साथ ही लगे रहते हैं। कभी-कभी उड़ना सीखने के दौरान बच्चे अगर थक कर जमीन पर आ बैठते, और हम कहीं गलती से भी उनके पास पहुंच तो जाएं, तो नर और मादा बुलबुल चीख चिल्लाहट से हमें बच्चों से दूर रहने को आगाह करते हैं।  बुलबुल जोड़े के एतराज को जानकर हम तुरंत बुलबुल बच्चों के पास से हट जाते हैं। ऐसा करते-करते कुछ दिनों में बच्चे पूरी तरह से उड़ना सीख जाते हैं। फिर यही बुलबुल का परिवार घोसले को छोड़ देता है, और परिवार सहित उड़ जाता है।

बुलबुल का जोड़ा पिछले कई सालों से लगातार ऐसे ही हमारे घर में घोंसला बनाता चला आ रहा है अंडे देता है बच्चे निकलते हैं और फिर ट्रेनिंग उड़ाना देख उड़ना सीख कर बच्चे बड़े होने के बाद उड़ जाते हैं। इसके बाद कभी कभार बुलबुल का परिवार दिख जाता है तो हमें यह समझ में नहीं आता कि इस पर बच्चे कौन है और इनके मां-बाप कौन हैं हां यह जरूर है की बुलबुल परिवार और हमारे परिवार के बीच न जाने कौन सा कैसा अंजाना सा रिश्ता बना हुआ है कि यह बुलबुल परिवार कभी भी हमारा घर नहीं छोड़ते हैं। और ठीक उनके वैसे ही हम लोग भी हर वर्ष अप्रैल के आते ही उनके आने के इंतजार के दिन गिनने लग जाते हैं। हमें उनके आने का बेसब्री से इंतजार बना रहता है।

ये भी दूं कि बुलबुल जोड़ा के साथ खासकर मेरे बीच इन बने रिश्तो में और भी मजबूती तब आई, जब एक घटना 2019 में घटी। उस वर्ष हुआ कुछ ऐसा कि जब बुलबुल के घोसले में उसके बच्चे छोटे-छोटे ही थे। इस वर्ष बुलबुल ने पुराने आम के पेड़ के डगाल पर बने घोसले में ही अंडे दिए थे। 

    उस दिन सुबह-सुबह ही ना जाने कैसे एक बच्चा घोंसले के बाहर नीचे गिर गया। जिस पर मेरी नजर पड़ गई ।वह बच्चा बहुत छोटा सा था उसके ठीक से पंख भी नहीं निकले थे मैं उस बच्चों को दूर से ही निहार रहा था कि तभी अचानक एक बिल्ली ना जाने किधर से आकर उसे झपट्टा मार कर मुंह में दबाकर सीढ़ी की ओर तेज चढ़ते हुए भागने लगी। यह सब मेरे ही सामने हुआ, यह देखकर मैं चौंक उठा। और सामने देखा एक लकड़ी दिखाई दी उस लकड़ी को  लेकर बिल्ली के पीछे  दौड़ पड़ा। बिल्ली मुझे आता देखकर घबराई, मैंने लकड़ी उसके तरफ फेंका, तब बिल्ली मुंह में दबे हुए बुलबुल के बच्चों को छोड़कर भाग जाती है। मैं उपर सीढ़ी पर बुलबुल बच्चे के पास पहुंचा तो देखा की बुलबुल का बच्चा घायल हो चुका था। 

उसके कुछ खून भी निकला हुआ था। बच्चों का एक पैर बिल्ली ने शायद दांतों से चला लिया था। तुरंत मैंने बच्चों को उठाकर गोद में ले लिया। बच्चा डर और कमजोरी से ठीक से बोल भी नहीं पा रहा था। वैसे भी बुलबुल का वह बच्चा बहुत कमजोर सा था। उसे देखने में वह चूहे के बच्चे जैसा दिख रहा था। इतने में ही बच्चों के माता-पिता बुलबुल आ गए और मेरे आस-पास उड़ने लगे और बुरी तरह से चीखने चिल्लाने लगे। मुझे लगा मुझे वह चोंच मार कर हमला भी कर सकते हैं। यह देखकर मैं तुरंत उपरी मंजिल पर बने कमरे के अंदर आ गया। फिर भी बाहर कमरे के बाहर से नर मादा बुलबुल उड़कर कमरे के अंदर आकर हल्ला करने लगे और मुझ पर हमला करने का प्रयास करने लगे। यह देखकर मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि अपनी संतान की सुरक्षा के लिए पंछी भी कितने संवेदनशील और जुझारू हो जाते हैं। 

यही सोचते सोचते मैंने तुरंत एक निर्णय ले लिया और धीरे से सिर पर हमला करने के अंदाज में उड़ रहे बुलबुल जोड़े को बाहर कर दरवाजा बंद कर लिया। अब तक मैंने सोच लिया था कि इस बच्चे को अब घोसले में फिर से छोड़ने से शायद बच्चा बच्चा जिंदा नहीं बच पाएगा, इसलिए मैंने उसे ठीक और तंदुरुस्त होने तक पास में सुरक्षित रखने का इरादा कर लिया। इसके लिए मैंने बांस की एक बड़ी सी टोकनी लेकर उसके अंदर नरम कपड़े में बुलबुल के बच्चे को रख दिया और टोकनी को ढंक दिया। ऊपर वजनी पत्थर रख दिया, ताकि बिल्ली आदि उसे ना खोल सकें। इसके बाद तुरंत मैंने उसके घायल पैर पर दवा लगाकर पट्टी बांध दी और बच्चे को उंगली के पोरों से पानी की बूंदें टपका टपका कर पिलाया। इस दौरान खामोशी से बुलबुल बच्चा केवल टुकुर-टुकुर मुझे देखता रहता। 

अब बुलबुल बच्चे को समय-समय पर पानी दाना खिलाने और उसे देखभाल करने की मेरी रोजाना की ड्यूटी बन गई । इस बीच मैंने जानकारों से पूछताछ बुलबुल बच्चे के लिए दवा तैयार कर लिया जिसे सुबह शाम उसके घायल पैर पर लगाता और मालिश करता था। उसका पैर शायद पोलियोग्रस्त जैसा होकर बेजान हो गया था। फिर भी मैं रोज उसके पैर की दवा से मालिश करने लगा। दिन में कई बार उसे किशमिश, काजू रोटी जैसे पौष्टिक आहार भी देता, जिसे वह प्रेम से खाने लगा। ऐसा करते-करते कई दिन बीत गए। बुलबुल का बच्चा भी काफी घायल होने के कारण मुझे शुरुआत में तो लग रहा था कि शायद नहीं बच पाएगा, लेकिन ऊपर वाले की कृपा से बच्चा बच गया शायद मेरी रोज की सेवा देखभाल का भी असर उस पर होने लगा। अब बुलबुल बच्चा धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा और उसकी बढत भी दिखने लगी। 

 अब तो वह धीरे-धीरे आवाज़ें भी निकालने लगा उसकी आवाज की ही नकल करते हुए मैं भी सीटी बजाकर उससे बातें करने लगता। वह भी सिटी सुनकर मेरे सिटी का जवाब देता, तो यह देखकर मुझे बहुत खुशी हुई कि चलो कई दिनों की मेहनत सफल होती नजर आ रही है। बुलबुल बच्चे के पंख भी अब पूरी तरह से आने लग गए थे। अब वह बहुत सुंदर सा नजर आने लगा। इस बीच उसकी एक टांग जो सूखी लकड़ी जैसी हो गई थी। उसकी रोज दवा लगाकर मालिश करने से उस पर भी अच्छा असर होने लगा अब उसकी उस पैर में भी हरकत होती दिखाई देने लगी। अब उसे मैं टोकरी से निकाल कर बाहर रख लेता  और उसे काफी देर तक बातें करता।  बुलबुल का बच्चा भी अब तक मुझसे काफी हिल मिल गया।

करीब एक माह बीतने के बाद मैंने उसे टोकनी से ही बाहर निकाल दिया। अब वह कमरे में ही उड़ने का प्रयास करता फिर धीरे से मेरे पास आकर बैठ जाता। ऐसे ही दो महीने बीत गए। बुलबुल का बच्चा अब आसपास के घरों तक भी उड़ कर चला जाता। इस दौरान वह खूब सुन्दर और तंदरुस्त हो गया दिन भर चहकता रहता। अलसुबह पांच बजते ही बुलबुल बच्चे की वजह से‌ मुझे उठना पड़ता। चूंकि वो सामने कमरे में ही दरवाजे के परदे के राड में ऊपर रात भर आराम करता फिर सुबह होते ही चहकने लगता। उसकी आवाज काफी मधुर लेकिन तेज होने के कारण मेरी नींद खुल जाती। जैसे ही मैं बिस्तर से उठता बुलबुल बच्चा खुश हो कर तेजी से उड़ कर मेरे कंधों पर आकर बैठ जाता और तेजी से चहकने लगता। इधर-उधर फुदकने लगता। मेरे लिए यह उसका इशारा था कि मुझे भी अब दाना पानी दो। फिर मैं उसे दाना चारा खिलाकर पानी पिलाता,फिर धीरे से उड़ा देता, तभी जाकर मैं आगे अपना कुछ काम कर पाता।

 इस बीच वह आसपास उडता रहता। फिर दस बजे के आसपास जब मैं नहाने के लिए जाता ना जाने किधर से उड़ कर वह मेरे पास आकर फुदकने लगता, मुझे नहाता देखकर वह भी बहते हुए पानी में अपना सर डालकर पंख फड़फड़ा कर नहाने का प्रयास करते लगता। मैंने जब पहली बार उसे ऐसा करते देखा, तभी समझ गया कि वह भी नहाना चाहता है। तभी से मैंने अपने नहाने के समय एक मिट्टी के जग में पानी भर कर रखने लगा। फिर जैसे ही वह उड़कर मेरे नहाते समय पास आता तो मैं उसके पास पानी भरे पात्र को रख देता। बस फिर वह उस पात्र में मजे से नहाने लगता। नहा कर मैं कमरे में आकर ड्रेसिंग टेबल के पास बाल संवारने लगता तो वह भी खिड़की से उड़कर अंदर आ जाता और फड़फड़ा कर अपने गीले पंखों से पानी झड़ानै लगता। जब मैं तैयार होता तो मेरे कंधे पर आकर बैठ जाता और फिर मुझसे बातें करने लगता। मैं भी लगातार सिटी बजा बजा कर उससे बातें करते जाता। फिर हम दोनों ही साथ-साथ नीचे आते मैं खाने की टेबल में पहुंचता तो वह भी टेबल में उड़ कर बैठ जाता। खाने के टेबल में उसके लिए भी दाना पानी रखा जाता। हम लोग खाना खाते रहते तो वह भी अपने लिए रखे दाने को चुगता, बीच बीच में मेरी थाली में भी चोंच मारता। जब उसका पेट भर जाता तो वह सीधे उड़ कर बाहर चला जाता। धीरे-धीरे अब तीन महीने और बीत गए। बुलबुल का बच्चा पूरी तरह से बड़ा हो गया था। उसकी एक जो घायल टांग थी वह भी पूरी तरह से अच्छी हो गई थी।

वह बहुत सुंदर अच्छा और बड़ा सा दिखने लगा था। इतने दिनों तक बुलबुल और हम मेरे रिश्ते के बारे में पासपड़ोस के लोगों को पता चल चुका था। और उसे देखने के लिए पड़ोसी आने लगे। पड़ोसी जब उसे नहीं देखते तो मुझे बोलते की हमको भी बुलबुल को दिखाओ। तब मुझे छत पर लोगों को ले जाना पड़ता और बुलबुल को सिटी की तेज आवाज मार कर बुलाना पड़ता। मेरी सिटी की आवाज वह अच्छी तरह से पहचानता था तब मेरी सिटी की आवाज सुनकर वह जहाँ कहीं भी रहता सीधे उड़कर सीधे मेरे कंधे पर आकर बैठ जाता और मुझसे बातें करने लगता। मेरे अगल-बगल खड़े लोगों से वह तो कतई नहीं डरता था जब तक मैं मौजूद रहता। 

हमारे बीच का यह रिश्ता देखकर पड़ोसी आश्चर्य में पड़ जाते। लोगों के बीच बुलबुल से मेरे रिश्ते को जान कर प्रायः कोई ना कोई आने लगा। शाम को अक्सर मुझे ऊपर के कमरे का दरवाजा खुला रखना पड़ता जब तक कि बुलबुल बच्चा वापस न आ जाए, क्योंकि वह दिन ढलते ही कमरे में आकर रात्रि के लिए अपनी जगह पर बैठता था और सुबह तक विश्राम स्थल पर ही रहता। मैं अक्सर बाहर भी जाता था तब वह मुझे बेचैनी से दिनभर खोजता रहता। मेरे आने पर वह मुझे देखते ही खुश होकर खूब  चहकने लगता, और सीधे कंधे पर आकर बैठ जाता।  बस यही हमारे बीच प्रेमल और स्नेह भरा संबंध चल रहा था ।

       लेकिन हां यह जरूर बताना चाहूंगा कि मैं कभी भी बुलबुल बच्चे को पिंजरे में रखने का या कैद करने के लिए नहीं सोचा। उसे हमेशा ही खुले आसमान में ही आजाद रखा। मुझे मालूम था वह बुलबुल बच्चा हमारे बीच कितने दिन खुश रहेगा आखिर उसको स्वच्छंद रूप से खुले आसमान में आजादी से रहना ही उसकी असली जिंदगी है, और मैं नहीं चाहता था कि उसकी आजादी और उसके लोग उसे दूर रहें।

इसका ही यह परिणाम निकला की बुलबुल बच्चा दिन बचने के साथ घर पर कम आने लगा। वह अक्सर शाम को गायब रहता। यदाकदा अब किसी किसी दिन वह मेरे पास आता और सीधे कंधे में बैठकर बतीयता और फिर उड़ जाता। अभी भी यह क्रम बदस्तूर जारी है। बुलबुल बच्चा कभी भी छत पर मुझे देखकर कहीं से भी उड़ कर आता है,और कंधे पर बैठकर कुछ देर बतियाता है फिर उड़ जाता है।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
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