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शिवसेना के बाद एनसीपी में बगावतः परिवारवाद होगा तो शिंदे-अजित कांड भी होंगे

देखते ही देखते महाराष्ट्र की सियासी तस्वीर बदल गई। महज चंद महीने में उद्धव ठाकरे के बाद महाविकास अघाड़ी के मुख्य घटक एनसीपी के मुखिया शरद पवार को बगावत झेलनी पड़ी। बगावत ऐसी कि राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार के लिए अपनी पार्टी को बचाना मुश्किल हो गया है। जिस तरह से रविवार को पवार के भतीजे अजित पवार अपने समर्थकों के साथ शिंदे मंत्रिमंडल में शामिल हुए, उसको ले कर चर्चाओं का बाजार गर्म है।

कोई इस घटनाक्रम को शरद पवार के सियासी सफर का सबसे बड़ा झटका मान रहा है तो इस पूरे घटनाक्रम को केंर्द्रीय जांच एजेंसियों के भय का परिणाम बता रहे है। हालांकि यहां सच्चाई दूसरी है। राजनीति में बगावत कोई नई बात नहीं है।

खासतौर से क्षेत्रीय दलों में तो यह आम बात है। कभी चंद्रबाबू नायडू ने बगावत कर अपने श्वसुर एनटी रामाराव से पूरी पार्टी ही छीन ली थी। वर्तमान में भी देखें तो विरासत की यह जंग कई दलों में जारी है। कुछ वर्ष पूर्व सभी सपा में हुई बगावत के गवाह बने। वर्तमान में वाईएसआर सीपी में विरासत को ले कर जगनमोहन रेड्डी और उनके बहन के बीच जंग छिड़ी हुई है। भाजपा की सहयोगी अपना दल कुछ साल पहले ही दो फाड़ हो गई थी।

राष्ट्रीय जनता दल में भी लालू परिवार में विरासत को ले कर खटपट की सूचना आती ही रहती है। करुणानिधि के बाद ऐसी ही विवाद की स्थिति डीएमके में भी आई थी। हालांकि करुणानिधि के वंशजों ने आपसी संवाद का सहारा ले कर पार्टी को टूटने से बचा लिया। कहने का आशय है कि देश के सभी क्षेत्रीय दल परिवार केंद्रित पार्टियों में सिमट कर रह गए हैं। ऐसे दलों में मुखिया के नहीं रहने, उम्रदराज होने और मुखिया की अपनी ओर से परिवार में ही विरासत की तलाश शुरू होने पर अकसर विवाद पैदा होता रहा है।

मुश्किल यह है कि ये क्षेत्रीय दल राजनीति में बस अपने परिवार के सदस्यों को ही आगे बढ़ाने के लिए कुख्यात रहे हैं। चूंकि एक ही परिवार के सदस्य पार्टी और सत्ता में आने पर सरकार में अहम पद संभालते हैं। ऐसे में इनकी महत्वाकांक्षा पूरी की पूरी विरासत को स्वयं केंद्रित कर लेने की बन जाती है। इसके बाद मुखिया के इतर परिवार के सदस्यों के बीच आपसी खींचतान शुरू होती है और इसका परिणाम बगावत के रूप में सामने आता है।

महाराष्ट्र में शिवसेना के बाद एनसीपी में हुई बगावत का कारण भी यही है। विरासत के सवाल पर ही बाला साहब ठाकरे के बाद उनके भतीजे राज ठाकरे ने बगावत का रास्ता अपनाया। इसके बाद जब उद्धव ठाकरे ने पार्टी की कमान संभाली तो अपनी विरासत के रूप में अपने बेटे आदित्य ठाकरे को मजबूत करना शुरू किया। इससे पार्टी के ऐसे वरिष्ठ नेता नाराज हुए जो ठाकरे परिवार के सदस्य नहीं थे। अंत में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना दो हिस्से में बंट गई। इस बगावत के कारण महाविकास अघाड़ी को राज्य की सत्ता भी गंवानी पड़ी।

एनसीपी में बगावत के पीछे भी विरासत की जंग ही है। शरद पवार के भतीजे अजित पवार नहीं चाहते थे कि पार्टी और पवार साहब की विरासत सुप्रिया सुले को सौंपी जाए। सच्चाई यह है कि पार्टी में शरद पवार के बाद सबसे सक्रिय नेता अजित पवार ही थे। पार्टी के कामकाज पर ध्यान देने के कारण पार्टी संगठन और विधायकों में अजित की गहरी पकड़ थी। इसके उलट पवार साहब अपनी जिस सांसद पुत्री सुप्रिया सुले को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपना चाहते थे, उनकी पार्टी और संगठन में कोई पकड़ नहीं थी। कई बार सांसद बनने के बावजूद सुप्रिया सिर्फ अपने पिता के भरोसे  राजनीति करती रहीं।

इसी बीच जब इस्तीफे की राजनीति से सहानुभूति बटोरने की रणनीति के तहत पवार साहब ने जब विरासत के मामले में अपने बेटी का रास्ता साफ करने का सिलसिला शुरू किया तो असंतोष बढ़ गया। कार्यकारी अध्यक्ष नहीं बनाने और राज्य संगठन से दूर करने के बाद अजित को लगा कि पवार साहब उनकी राजनीति के आगे लगातार अवरोध खड़ी कर रहे हैं। ऐसे में अजित ने खुल कर बगावत की और नतीजा अब सबके सामने है। जहां तक पवार साहब का सवाल है तो यह उनके लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका है।

अपने 55 साल के राजनीतिक कॅरियर में पवार साहब हमेशा अपने विरोधियों पर भारी पड़ते रहे हैं। सरकार किसी की भी हो, मगर महाराष्ट्र की राजनीति पवार साहब के ही इर्दगिर्द घूमती थी। इसलिए उन्हें राजनीति का चाणक्य कहा गया। हालांकि इस बार पवार साहब की अपने भतीजे के सामने एक नहीं चली। वह भी तब जब उन्हें अजित पवार के बगावत का अंदाजा था। पवार साहब के लिए मुश्किल यह है कि इस बगावत में उनके भतीजे अजित पवार के साथ ही सबसे करीबियों में शुमार प्रफुल्ल पटेल ने भी साथ छोड़ दिया।

जिन नौ विधायकों ने रविवार को शपथ ली, उनमें से ज्यादातर पवार साहब के विश्वासपात्र रहे हैं। वैसे पवार साहब को पता है कि इतिहास अपने आप को दोहराता रहा है। महाराष्ट्र में अजित पवार ने जिस तरह बगावत करते हुए एनसीपी तो तोड़ा, ठीक उसी तरह 45 साल पहले शरद पवार ने रेड्डी कांग्रेस को तोड़ा था। तब पवार बगावत के बाद महज 37 साल के उम्र में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने थे, अब अजित डिप्टी सीएम बने हैं। अजीब संयोग है कि पवार ने भी पहल बार जुलाई महीने में ही सीएम पद की शपथ ली थी।

दरअसल आपातकाल के बाद महाराष्ट्र में कांग्रेस इंदिरा कांग्रेस और रेड्डी कांग्रेस के रूप में दो फाड़ हो गई थी। तब साल 1978 में विधानसभा चुनाव से पहले पवार इंदिरा कांग्रेस की जगह रेड्डी कांग्रेस में शामिल हुए। विधानसभा चुनाव में त्रिशंकु जनादेश के बाद कांग्रेस के दोनों धड़े ने मिल कर सरकार बनाई और रेड्डी कांग्रेस के वसंतदादा पाटिल को मुख्यमंत्री तो पवार को उद्योग मंत्री बनाया गया। हालांकि इसी साल पवार ने 40 विधायकों के साथ बगावत करते हुए समाजवादी कांग्रेस बनाई और पाटिल की सरकार गिराने के कुछ दिनों बाद जनता पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, शेतकरी कामगार पार्टी के साथ सरकार बनाई।

हालांकि साल 1980 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद इंदिरा गांधी सरकार ने पवार सरकार को बर्खास्त कर दिया था। अब यही दृश्य पवार के सामने है। यह सच है कि जिन नौ विधायकों ने रविवार को मंत्री के रूप में शपथ ली थी, उनमें से अजित पवार, छगन भुजबल सहित चार प्रवर्तन निदेशालय ईडी की जांच के दायरे में थे। ऐसे में अजित की बगावत को केंद्र की मोदी सरकार के दबाव के रूप में भी देखा जा रहा है। बगावत का यह एक पक्ष हो सकता है, इसमें सच्चाई भी हो सकती है। हालांकि असली सच्चाई तो यह है कि यह एनसीपी में परिवार के बीच विरासत की जंग का परिणाम है।

अजित अपने चाचा शरद पवार से नाराज थे, जिसे भाजपा ने सफलतापूर्वक भुना लिया। अब सवाल है कि आगे क्या होगा? आगे क्या होगा, इसका एक जवाब तो आज ही मिल गया है। इस बगावत के कारण विपक्षी एकता की मुहिम को तगड़ा झटका लगा है। इसी झटके के कारण पटना के बाद बंगलुरू में प्रस्तावित विपक्षी दलों की बैठक टालनी पड़ी है। वह इसलिए कि विपक्षी एकता की मुहिम के मुख्य सूत्रधारों में से एक शरद पवार के सामने अब पहली प्राथमिकता अपनी पार्टी बचाने की है। बगावत के बाद विपक्ष को एकजुट करने की मुहिम के बदले पवार की पार्टी और अपनी साख बचाना पहली प्राथमिकता है।

हालांकि चुनौती बहुत बड़ी है, मगर चूंकि सामने शरद पवार हैं, ऐसे में भविष्य में इस कहानी में कुछ नए मोड़ आ सकते हैं। पवार साहब का सियासी सफर बताता है कि वह थक हार कर बैठने वाले नेताओं में से नहीं हैं। ऐसे में सवाल है कि अपने भतीजे से सियासी पटखनी खाने के बाद अब वह क्या करेंगे? अजित ने राज्य में विधानसभा चुनाव के तत्काल बाद भी बगावत की थी। अचानक फडणवीस सरकार में उपमुख्यमंत्री बन गए थे।

हालांकि बाद में पवार साहब ने सब संभाल लिया। महाविकास अघाड़ी की गठबंधन सरकार बनाई और अजित इस सरकार में भी उपमुख्यमंत्री बने। हालांकि तब यह भी कहा गया था कि अजित ने अपने चाचा पवार के कहने पर ही शपथ ली थी। बहरहाल यह अतीत की बात है। वर्तमान परिस्थिति दूसरी और शरद पवार के लिए अपने सियासी सफर की बसे बड़ी चुनौती ले कर आई है। सवाल है कि क्या शरद पवार अपनी पार्टी बचा पाएंगे? क्या शरद पवार अजित के इतर पार्टी समर्थकों को अपने नेतृत्व में एकजुट रख पाएंगे? इसका जवाब भविष्य के गर्भ में है। देखना दिलचस्प होगा कि उम्र के आखिरी पड़ाव पर खड़े पवार का अगला रास्ता क्या होगा?

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