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क्रांतिकारी उल्लासकर दत्त

देश में ऐसे असंख्य मौन साधक हुए हैं जो नाम-यश की आकांक्षा से दूर मां भारती की सेवा साधना में अविचल अविराम साधनारत हो राष्ट्र यज्ञ में जीवन का कण-कण, पल-पल अर्पित करते रहे हैं। अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध देश के स्वातंत्र्य समर के औप्रज्वलित अग्निकुंड में जीवन की श्वास समिधा समर्पित कर अंग्रेजी सत्ता की नींव उखाड़ भारत माता के प्रति सम्मान और श्रद्धा का अर्ध्य प्रदान किया। किंतु आजादी मिलने के बाद हजारों नायक गुमनामी के अंधेरे में खो गए।

इतिहास के पृष्ठों में स्थान न पा सके। समय और उपेक्षा की धूल ऐसी पड़ी कि देश की नई पीढ़ी भी इन भूले बिसरे क्रांतिकारी नायकों से अपरिचित ही रह गई। ऐसा ही एक अपरिचित अद्वितीय क्रांतिकारी है उल्लासकर दत्त जिसे सेलुलर जेल (काला पानी की सजा) की घोर अमानवीय यातना ने पागल बना दिया था। यह वही गुमनाम क्रांतिकारी है जिसके बनाये बम से खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर के मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड की गाड़ी पर हमला किया था।

संयोग से किंग्सफोर्ड उस गाड़ी में नहीं बल्कि पीछे आ रही दूसरी गाड़ी में था। लेकिन उस हमले में दो अंग्रेज महिलाएं मृत्यु को प्राप्त हुई थीं जो अंग्रेज वकील प्रिंगल केनेडी की पत्नी और बेटी थीं। स्मरणीय है कि बम बनाने में सिद्धहस्त उल्लासकर दत्त ने सेलुलर जेल में जेलर के नियम मानने से इनकार कर दिया था। वह मानते थे कि बागी बागी ही होता है, चाहे वह जेल के बाहर हो या भीतर। नाराज जेलर ने उल्लासकर को घोर यातना दी। फलत: वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठे और पागल हो गये। 

        परम देशभक्त उल्लासकर दत्त का जन्म 16 अप्रैल, 1885 को बंगाल प्रांत के कलिकाछा गांव में हुआ था जो अब बांग्लादेश में है। लंदन विश्वविद्यालय से कृषि स्नातक पिता द्विजदास दत्त स्वतंत्र सोच के व्यक्ति थे। माता मुक्तकेशी की ममता एवं वात्सल्य की छांव में पले-बढ़े उल्लासकर ने प्रारंभिक शिक्षा गांव में प्राप्त कर उच्च शिक्षा हेतु कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। यहां से 1903 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर एफ.ए. कक्षा में पहुंच गये। वह शीघ्र ही अपने विचारों के बल पर युवकों में प्रिय हो गए और युवाओं में राष्ट्रभक्ति का भाव  जगाने लगे।

वह एफ.ए. की परीक्षा में नहीं बैठ सके क्योंकि  एक दिन कक्षा में अंग्रेज प्रोफेसर रसेल ने बंगालियों पर अभद्र अपमानजनक टिप्पणी करते हुए भारतीयों का मजाक उड़ाया। देशभक्ति के रंग में डूबे उल्लासकर को भला यह कैसे सहन होता, पलक झपकते ही उसने अंग्रेज के गाल पर जोरदार तमाचा जड़ दिया। परिणामस्वरूप उल्लासकर को कालेज से निकाल दिया गया, क्योंकि यह तमाचा एक व्यक्ति के गाल पर नहीं बल्कि अंग्रेजी सत्ता के क्रूर चेहरे पर पड़ा था और अंग्रेज सरकार इससे तिलमिला गई थी। 

         कालेज से निष्कासन के बाद वह बम्बई के टेक्सटाइल इंस्टीट्यूट में प्रवेश ले कपड़ा बुनने की कला एवं तकनीकी सीखने लगे। यहीं पर रसायनों के प्रयोग करने की रुचि जगी। हृदय में देशप्रेम की आग धधकाए मां भारती का वह पुत्र अरविंद घोष की अनुशीलन समिति एवं युगांतर दल से जुड़ गया, जहां उसका परिचय देश के अन्य क्रांतिकारियों से हुआ। वह समय बंग भंग के विरोध और स्वदेशी अपनाने के आग्रह का काल था। स्वदेशी वस्तुएं प्रयोग करने की भावनावश पश्चिमी पोशाक त्याग परम्परागत बंगाली परिधान धोती-कुर्ता धारण कर लिया। बिपिनचंद्र पाल के भाषणों से प्रभावित उल्लासकर दत्त ने इसी दौरान घर पर बनाई प्रयोगशाला में बारूद से घातक बम बनाने में कुशलता हासिल कर ली।

इसी अवधि में बिपिनचंद्र पाल की बेटी लीला पाल से सगाई पश्चात विवाह तय था। लेकिन  खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी द्वारा 30 अप्रैल, 1908 को किंग्सफोर्ड के ऊपर बम फेंके जाने के बाद 2 मई, 1908 को एक क्रांतिकारी द्वारा पुलिस का मुखबिर बन जाने से अरविंद घोष, उल्लासकर दत्त, बारीन्द्र घोष, उपेन्द्र बनर्जी सहित तीन दर्जन से अधिक अन्य क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गये। प्रफुल्ल चाकी ने पुलिस के हाथ लगने से पहले ही आत्महत्या कर ली और खुदीराम बोस की मुजफ्फरपुर से दूर भागने के दौरान स्टेशन पर गिरफ्तारी हो गयी। उल्लेखनीय है कि यह घटना इतिहास में ‘अलीपुर बम केस’ नाम से जानी जाती है क्योंकि युगांतर दल का बम बनाने का स्थान अलीपुर में था।

मई 1908 से मई 1909 तक कलकत्ता में सभी क्रांतिकारियों पर ‘अलीपुर बम काण्ड’ नाम से मुकदमा चलाया गया। साक्ष्यों के अभाव में अरविंद घोष निर्दोष सिद्ध हुए। उल्लासकर दत्त, बारीन्द्र घोष और खुदीराम बोस को फांसी और अन्य को कारावास की सजा सुनाई गई। आगे 11 अगस्त, 1908 को खुदीराम बोस को मुजफ्फरपुर में फांसी पर चढ़ा दिया गया। भारतीय स्वाधीनता इतिहास में सबसे कम उम्र में फांसी पर चढ़ने वाले पहले क्रांतिकारी के रूप में खुदीराम बोस का नाम अमर हो गया। ध्यातव्य है कि अदालत में बयान में अपना पेशा ‘गायों का चरवाहा’ बताने वाले उल्लासकर दत्त मिमिक्री एवं कठपुतली कला में दक्ष थे और इस कला के द्वारा साथी क्रांतिकारियों का मनोरंजन भी करते थे।

            बारीन्द्र घोष फांसी की सजा के खिलाफ अपील करने को तैयार थे पर उल्लासकर को स्वीकार न था। लेकिन परिवारजन एवं अन्य क्रांतिकारी साथियों के आग्रह पर अपील पर हस्ताक्षर कर दिये। देशबंधु चितरंजन दास ने केस लड़ा और अपने अकाट्य तर्कों से फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलवाने में सफल रहे। अदालत द्वारा दोनों क्रांतिकारियों को भारतभूमि से सैकड़ों किलोमीटर दूर सेलुलर जेल में कैद करने का आदेश हुआ और 1909 में उल्लासकर दत्त एवं बारीन्द्र घोष कलकत्ता जेल से सेलुलर जेल स्थानांतरित कर दिये गये। उल्लासकर ने पहली भेंट में ही जेलर को बता दिया कि वह किस मिट्टी के बने हुए हैं। जेलर द्वारा कैदियों से करवाये जाने वाले कार्यो यथा नारियल खोल से नारियल अलग करना, नारियल की रस्सी बटना, कोल्हू में बैल की जगह जुत कर नारियल का मन भर से अधिक तेल निकालना आदि करने से सख्त मना करते हुए कहा कि यह सरकार अवैध है। मैं इसका कोई नियम न मानूंगा और न कोई काम करूंगा।

एक दिन ईंट भट्ठे पर काम करने से मना कर देने पर जेलर ने कहा, “यह जेल बाहरी जेलों जैसी नहीं है। पहली बार मना करने पर हथकड़ी डाल देंगे, दूसरी बार मना करने पर बेड़ियां जकड़ देंगे और तीसरी बार मना करने पर तीस बेंतों की सजा मिलेगी। और तब जिस्म पर पड़ने वाला हर बेंत तुम्हारे शरीर में एक इंच गहरा घाव कर देगा।” उल्लासकर दत्त ने स्वाभिमान से निर्भय हो उत्तर दिया, “तुम तीस बेंतों की बात करते हो, तुम मुझे टुकड़े-टुकड़े भी कर दो तब भी तुम मुझसे काम नहीं करा सकते यदि मुझे लगता है कि उसे करना गलत है।”  क्रूर जेलर ने सिपाहियों को आदेश दिया कि उल्लासकर को हथकड़ी और बेड़ी डालकर धूप में खड़ा रखा जाये। कोठरी में हाथ ऊपर बांधकर खड़ा रखा जाये। सालों तक अनवरत जारी इस अमानवीय यातना से वह बेहोश हो जाते। तेज बुखार से ग्रस्त हो गये और अंततः अपना मानसिक संतुलन खो बैठे। तब स्थानीय अस्पताल में भर्ती करवाया पर आराम न मिलते देख 10 जून, 1912 को मद्रास पागलखाने भेज दिया। आगे प्रथम विश्व आरम्भ होने और ब्रिटेन द्वारा विजयी होने पर कैदियों को जेल से छोड़ने का आदेश हुआ।

तो 1920 में उल्लासकर दत्त भी सेलुलर जेल से रिहा कर दिये गये। पर मानसिक संतुलन खो जाने से वह देश में इधर-उधर भटकते रहे। पर सेलुलर जेल की कैद एवं यातना से मुक्त वह प्रकृति के सान्निध्य में जीवन यापन करते स्वस्थ हो पुनः लोक जागरण के काम में लग गये। अंग्रेज सरकार की किरकिरी बने तो 1931 में गिरफ्तार कर 18 महीने कैद रखा। कैद से छूट वह अपने गांव चले गये। देश आजाद हुआ। 1957 में बिपिनचंद्र पाल की बेटी लीला पाल से विवाह कर असम के सिलचर में जा बसे। किंतु दाम्पत्य जीवन अधिक न रहा, 1958 में पत्नी लीला का निधन हो गया। उन्होंने ‘द्विपांतरेर कथा’ और ‘आमार काराजीबन’ नामक दो पुस्तकें लिखीं जो क्रांतिकारी साहित्य की प्रामाणिक एवं अमूल्य निधि हैं।

       17 मई, 1965 को मां भारती का यह साधक पुत्र अपनी मातृ आराधना पूर्ण कर भारत माता कि पावन रज को माथे पर अलंकृत कर मां की गोद में चिरनिद्रा में सो गया। उनकी स्मृति को संजोने हेतु सिलचर और कोलकाता में दो सड़कों के नाम उनके नाम पर रखे गये। सिलचर में उल्लासकर स्मृति उपवन में प्रस्तर स्तम्भ में उनका योगदान अंकित है। राष्ट्रीय स्मारक सेलुलर जेल की चित्र गैलरी में अन्य क्रान्तिकारियों के साथ उल्लासकर दत्त का भी चित्र लगाया गया है। उल्लासकर दत्त का तप एवं त्यागमय बलिदानी जीवन संघर्ष और भारत माता के प्रति किया गया अप्रतिम योगदान हमें सदैव प्रेरित कर कर्तव्य पथ पर बढ़ने का सम्बल देता रहेगा।

लेखक शैक्षिक संवाद मंच के संस्थापक एवं भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के अध्येता हैं।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
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