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कथेतर गद्य की वैश्विक विरासत

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विश्व यायावरी के दौरान एक ओर यदि विभिन्न देशों की संस्कृतियों ने अपनी विशिष्टताओं का राग मुझसे गुनगुनाया तो दूसरी ओर मेरी चेतना ने अपनी भारतीय संस्कृति की वैश्विकता के गुणसूत्रें का गम्भीरता से अपने मानस में विश्लेषण किया। जिसमें मुझे आध्यात्मिक भारतीय मनीषा की शत्तिफ़ की स्पष्ट अनुभूति हुई और भारतीय संस्कृति के वैश्विक वर्चस्व का अवलोकन हुआ। 5 जून, 1873 को हिंदुस्तान से डच कोलोनइजर द्वारा ले जाये गये हिन्दुस्तानियों के 150 वर्ष पूरे हुए। इसलिए 2023 भारत, सूरीनाम नीदरलैंड एवम् यूरोप के अन्य देशों में बसे हुए सूरीनामी हिन्दुस्तानियों के लिए जितना ऐतिहासिक वर्ष है उतना ही मेरे लिए भी गत 23 वर्षों से मेरा इन देशों के हिदुस्तानियों के साथ नाभिनाल सम्बन्ध है। इन दशकों पर मेरे द्वारा 35 से अधिक पुस्तकें लिऽीं।

सरनामी के कवि जीत नाराइन और लक्ष्मण दत्त श्रीनिवासी की कविताओं पर अनुवाद कार्य किया। सूरीनाम के हिंदी साहित्यकारों की कविता सूरीनाम, कथा सूरीनाम का 2003 में सम्पादन किया। शब्द-शत्तिफ़, हिन्दीनामा नाम से पत्रिकायें प्रकाशित कीं। सूरीनाम हिंदी परिषद के 25 वर्ष पूरे होने पर ‘सूरीनाम हिंदी’ परिषद और सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन को लेकर पुस्तक लिऽी। नीदरलैंड देश के हिन्दुस्तानियों को लेकर तीन पुस्तकें प्रकाशित हुई।

हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन को 17 वर्षों से अपना जीवन दे रही हूँ। इस तरह 40 वर्ष की उम्र से लेकर अब तक की उम्र तक इनके उन्नयन की संगिनी और साक्षी हूँ। इन देशों के हिन्दुस्तानियों के प्रेम और विश्वास ने मुझे जीवन दिया। भारतीय संस्कृति का स्नेह और हिन्दीमयी वातावरण रचाने में मेरा साथ दिया। जिस तरह से सूरीनाम देश के स्वाधीनता दिवस 25 नवम्बर, 1975 में नीदरलैंड देश की महासनी बेयातेक्स और राजकुमार क्लाउड हिन्दुस्तानी वेशभूषा में भारतवंशी सूरिनामियों के अभिनन्दन में राजधानी पारामारिबो पहुंचे थे। इस वर्ष सूरीनाम देश में हिन्दुस्तानियों के जाने के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं। पूरी पाँच पीढ़ियों के समर्पण से सूरीनाम देश की वैश्विक अस्मिता निर्मित हुई हैं। जिसकी जितनी साक्षी सूरीनाम देश की हिन्दुस्तानियों की पाँच पीढ़ियाँ हैं उतनी ही उसके समानान्तर भारत देश की पाँच पीढ़ियाँ और प्रवासी भारतीयों की वैश्विक जमात भी। भारत के भारतीय, विश्व के भारतवंशी और वैश्विक प्रवासी भारतीय हम तीन रूप में अवश्य दिऽते हैं।

लेकिन हम विभाजित नहीं हैं। भारतीय माटी से बने हुए- भारतीय मानवीय बीज हैं। भारतीय माटी में जमे, उगे, फूले-फलें। पर हमारी अस्मिता भारतीय फल और बीज के रूप में ही रहती है। कोई देश और संस्कृति हमें बदल नहीं सकती है क्योंकि हम प्राचीन और सनातन हैं।

मेरे यह लिऽे बिना मन के कछार का यह अभिलेऽ अधूरा है रह जायेगा यदि मैं यह न लिऽूं कि मेरे अनुभव अरु अनुभूतियों के दस्तावेजी आलेऽ पुस्तकों के आवरण के साथ अपना विलक्षण सम्मोहन पूर्ण प्रस्तुती नहीं बना पाते यदि आत्मीय डायमण्ड बुक्स के नरेंद्र भाई का उत्साही सहयोग मेरा मार्ग दर्शक नहीं होता। अनुभव और अनुभूतियों के अन्तर्गत विश्व यायावरी और कार्यक्षेत्र की दत्तचित्त सक्रियता के दौरान चित्त और चेतना के कुठलों में जो एकत्रित कर सकी वही इस पुस्तक में वैश्विक विरासत के रूप में संचित है।

‘अनुभव एवम् अनुभूतियाँ’ के इस विशेष संचयन में विश्व के सर्वाेच्च शांति गुम्बंद, अहिंसा, आध्यात्मिकता और वैज्ञानिकता के अंतरसम्बन्धों को लेकर वैचारिक आलेऽ है तो दूसरी ओर पुस्तक के अंतिम आलेऽों में क्रम से श्रीराम और गीता के वैश्विक महत्त्व को उकेरते हुए अंतर्दृष्टि सम्पन्न विशिष्ट आलेऽ हैं। इसके साथ ही पाठकों को पुस्तक में विन्यस्त मेरी दृष्टि की सिद्धि का अभिप्राय तब और अधिक सिद्ध हो सकेगा जब वे अन्तिका से प्रकाशित छिन्नमूल उपन्यास (2016) और किताब घर से प्रकाशित 2015 फ्भारतवंशी भाषा एवम् संस्कृतिय् अनुसन्धान मूलक पुस्तकें पढ़ेंगे।

अहिंसा, श्रीराम और गीता पर केन्द्रित आलेऽों को मैंने विश्व के भारतवंशियों के इन शत्तिफ़यों के प्रति प्रेम के कारण ही इस पुस्तक में संजोया है। जिससे वे सम्मान और तृप्ति की अनुभूति कर सकें श्रीराम और गीता संस्कृति की शत्तिफ़ की वजह से ही वे भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों को बचाने में समर्थ हुए हैं। वस्तुतः भारतीयता के मूल सांस्कृतिक बीज मन्त्रें से ही विश्व के भारवंशियों ने अपने चित्त और चेतना में मनुष्यता का जादुई पर्यावरण रचा रऽा है जिसकी शत्तिफ़ को मैं 23 वर्षों से अपनी रूह में अनुभव कर रही हूँ। जिसके परिणाम रचित आलेऽ हैं।

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