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वहीदा रहमान के उत्कृष्ट अभिनय का कायल है जमाना

एक परम्परागत भारतीय स्त्री को जिन मानवीय मूल्यों के साथ देखा जाता रहा है, हिन्दी फिल्मों में वहीदा रहमान स्त्री के उन्हीं मूल्यों का प्रतिनिधित्व करती रही हैं। वे एक नायाब नायिका, जिन्होंने पांच दशकों तक यादगार एवं अविस्मरणीय भूमिकाओं को निभाते हुए हिन्दी सिनेमा को न केवल उच्च शिखर दिये बल्कि मनोरंजन के अनेक दरवाजों को खोला। इस महान् अदाकार को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित करने का निर्णय भारत सरकार ने ऐसे समय में लिया है, जब ऐतिहासिक नारी शक्ति वन्दन अधिनियम संसद में पारित किया गया है।

वहीदा रहमान करोड़ो दर्शकों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी यादगार एवं संवेदनशील भूमिकाओं से विचरण करती रही है। जिनका अभिनय, प्रेम की तरह मन के एक सुरक्षित कोने में संजोया जा सकता है। वे दर्शकों के मन में इस तरह पैठ गयी है कि मन का वजन पहले से कई गुणा भारी हो उठता है। उनकी मोहक छवि, भंगिमाएं, नृत्य की बारीकियां दर्शकों को एकबारगी जड़ कर देती है। तब पर्दे पर यह विलक्षण एवं अद्भुत नायिका, प्रकृति की सबसे सुन्दर कृति के रूप में नजर आती रही है। उन्होंने अपने प्रभावशाली अभिनय से असंख्य दर्शकों का जो स्नेह-सम्मान पाया है, वह अद्भुत है, आज तक उनके अभिनय की गहनता को कोई अभिनेत्री छू नहीं सकी हैं। अपने अभिनय कौशल से किरदारों को संवेदनशील और अदम्य गरिमा प्रदान करने वाली वहीदा रहमान को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित करने का निर्णय ऊंची पसन्द के दिलों को गौरवान्वित करने की घटना है।  

निश्चित ही यह एक सुखद संयोग है कि देश जब हरदिल अजीज अभिनेता देव आनंद की जन्मशती मना रहा है, उसी दौरान उनकी कालजयी फिल्म गाइड की नायिका वहीदा रहमान को भारतीय सिनेमा का शिखर सम्मान की घोषणा की गई। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि वहीदा रहमान और देव साहब की जोड़ी रूपहले परदे पर लंबे समय तक छाई रही। दोनों ने सात फिल्में साथ-साथ की थीं, जिनमें से पांच जबर्दस्त हिट रहीं। वहीदा रहमान की शख्सियत का सबसे आकर्षक पहलू यह है कि फिल्मी करियर की शुरूआत से लेकर अब तक उन्होंने अपनी शर्तों पर ही काम किया और इसमें उनकी परवरिश का बड़ा योगदान रहा। बचपन में जब वह भारत नाट्यम सीख रही थीं, उनके जिला मजिस्ट्रेट पिता से किसी रिश्तेदार ने शिकायती अंदाज में कहा था, मुसलमान होकर बेटी को नचाओगे? तरक्की पसंद पिता का जवाब था, कला कोई बुरी चीज नहीं होती, इंसान की सोच बुरी होती हैं।

वहीदा रहमान की अदाओं का हिन्दी फिल्मों के बड़े पर्दे के दर्शक तो कायल रहे ही हैं, लेकिन तेलुगु, तमिल और बंगाली फिल्मों के दर्शकों पर भी उन्होंने राज किया है। वह 1950, 1960 और 1970 के दशकों की फिल्मों की विभिन्न शैलियों में अपने योगदान के लिए जानी जाती हैं। 3 फरवरी 1936 को जन्मी यह महान् कलाकार अनेक विशेषताओं एवं विलक्षणओं का समवाय रही हैं। हिंदी सिनेमा की सबसे निपुण अभिनेत्रियों में से एक मानी जाने वाली वहीदाजी को एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और तीन फिल्मफेयर पुरस्कार मिले हैं। रहमान को 1972 में भारत सरकार ने पद्मश्री और 2011 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। उन्होंने 90 से अधिक फिल्मों में काम किया है। करियर के इस पड़ाव पर रहमान ने अनेक चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं के साथ प्रयोग करना शुरू कर दिया। उन्होंने फागुन (1973) में जया भादुड़ी की मां की भूमिका निभाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
70 के दशक की नई पारी में वहीदा रहमान की सफल फिल्मों में कभी-कभी (1976),

त्रिशूल (1978), ज्वालामुखी (1980), नसीब (1981), नमकीन (1982), धरम कांटा (1982), नमक हलाल (1982) शामिल हैं। कुली (1983), मशाल (1984), चांदनी (1989) और लम्हे (1991)। कभी-कभी, नमकीन, चांदनी और लम्हे ने सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकन प्राप्त किया। लम्हे (1991) में अपनी उपस्थिति के बाद, उन्होंने फिल्म उद्योग से विश्राम की घोषणा की। 85 साल की उम्र में जैसे वहीदा रहमान अपनी जिंदगी जी रही हैं वो सभी महिलाओं के लिए एक प्रेरणा है, जीने का अनूठा एवं सार्थक अंदाज है। अक्सर इस उम्र में महिलाएं किसी बीमारी से घिर जाती हैं या जीने की आस छोड़ देती हैं लेकिन वहीदा रहमान ने इस उम्र में फोटोग्राफी और स्कूबा डाइविंग के जरिए अपने प्रशंसकों को प्रेरित किया वह काबिल-ए-तारीफ है। ऐसे में वह इस उम्र में भी अपनी उम्र की बाकी महिलाओं के लिए एक मिसाल हैं।

आधी सदी से लंबे कालखण्ड में पसरे अभिनय करियर में कई फिल्मों के लिए वहीदा हमेशा सराही एवं याद की जाएंगी, मगर उनके अभिनय के पूरे वितान को तीन फिल्मों- गाइड, तीसरी कसम और खामोशी से समझा जा सकता है। गाइड की ‘रोजी’ का किरदार तो जैसे स्त्री मुक्ति का उद्घोष है। तरह-तरह की पाबंदियों और वर्जनाओं को तोड़ने की उत्कंठा किस दौर की स्त्री की नहीं रही? जब वहीदा ने परदे पर आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है को चरितार्थ किया, तो जैसे समूचे नारी समाज की दमित इच्छा को अभिव्यक्ति मिल गई थी। आज जब स्त्री मुक्ति का विमर्श नए-नए रूपों में हमारे सामने है, बल्कि कई बार यह बेहद अशोभनीय रूप में सामने आता है, तब रोजी का किरदार हमें एक शालीन राह दिखाता है। ‘तीसरी कसम’ की हीराबाई असम्मानजनक पेशे में होने पर भी वहीदा के पवित्र सौंदर्य, निश्छल अनुभूति, अव्यक्त पीड़ा और भोले मीठे स्वर से सम्माननीय और प्रिय लगने लगती है।

‘प्यासा’ की गुलाबों वेश्या है, पर उसकी संवेदनशील भावमुद्राएं भी कुशल एवं उत्कृष्ट अभिनयशैली के कारण मासूम और सहज लगती है। ‘साहब, बीवी और गुलाम’ में वहीदा की शोखी और चुलबुली अदाएं दर्शकों को मधुर अहसास में डुबो गई और वे उनके साथ ही गुनगुना उठे ‘भंवरा बड़ा नादान है…।’ ‘चौदहवीं का चांद’ में पति को भरपूर चाहने वाली पारंपरिक और समर्पित वहीदा जैसी पत्नी किस युवा मन ने नहीं संजोई होगी। निश्चित ही वहीदा अलग है, उनकी वेशभूषा और श्रृंगार भी खास, शालीन एवं मर्यादित होता था। एक दुर्लभ प्रतिभा, मृदुभाषी महिला, जिसे दुनिया के महान् हस्तियों ने ऐसी शानदार कलाकार की संज्ञा दी है, जिसकी आत्मा कवि जैसी निर्मल और संवेदनशील है। सादा फैशन में लिपटी वहीदा रहमान, जिनके निभाए किरदार भी अपनी दृढ़ता और साफगोई के लिये जाने जाते हैं। यश चोपड़ा, प्रकाश मेहरा, मनमोहन देसाई, महेश भट्ट, राज खोसला और गुलजार जैसे फिल्मकारों की पसंदीदा अभिनेत्री वहीदा उस एक मुकाम पर खड़ी है, जहां आज की अभिनेत्रियां पहुंचने के ख्याल भर से हांफने लगती हैं। वे नवोदित अभिनेत्रियों के लिये एक प्रेरणा है, दीपशिखा है।

अब इतने वर्षों के बाद भी ‘गाइड’ की चमक बढ़ती जा रही है। ‘टाइम मैगजीन’ ने हिंदी सिनेमा का गहन विश्लेषण करते हुए इस क्लासिक फिल्म की चर्चा कर भारतीय सिनेमा के महत्व को नया आकाश दिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि गाइड ने भारतीय सिनेमा में जो जगह बनाई, वैसी जगह कोई फिल्म नहीं बना सकी। एक रोमांटिक ड्रामा फिल्म को जैसी आध्यात्मिक ऊंचाई मिली, उसका कोई सानी नहीं। वहीदा रहमान रोजी की भूमिका में बेजोड़ हैं।

वहीदा से बेहतर इस भूमिका को कोई भी अन्य हीरोइन नहीं निभा सकती थी। उनके नृत्यों की भंगिमाएं और भाव हिंदी सिनेमा में दुर्लभ हैं। ऐसी ही अमर फिल्मों से वहीदा रहमान ने भारतीय सिनेमा में नये स्वस्तिक रचे हैं, उनकी फिल्में एक जीवित संग्रहालय मानी जा सकती है। जब हम भविष्य में अपनी आने वाली पीढ़ियों को भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग की एक प्रभावशाली, महान् एवं जीवंत अदाकारा वहीदा रहमान के बारे में बताते हुए यह कह सकेंगे कि यह है वहीदा रहमान, जो अभिनय में अपने हृदय का इस्तेमाल सबसे अधिक करती थी। अपने किरदार को संजीदा कर देती थी।

ललित गर्ग
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