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आर.एस.एस. के वरिष्ठ नेता सह-सरकार्यवाह श्री सुरेश सोनी जी ने 71 दिन से चल रहे विश्व कल्याण हेतु महायज्ञ में दी आहुति

संस्कृत भाषा की एक प्रमुख विशेषता य़ह है कि वह व्यष्टि से समष्टि का बोध करवाती है: कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा

संस्कृति का अर्थ है किसी देश या समाज के विभिन्न जीवन व्यापारों में या सामाजिक सम्बन्धों में मानवता की दृष्टि से प्रेरणा प्रदान करने वाले उन उन आदर्शों  की समष्टि को ही संस्कृति कहते हैं। जिस से परिमार्जित संस्कारों से युक्त मनुष्यों की सभ्यता का निर्माण होता है ।हमारी आत्मा, अस्मिता, भारत, भारती एवं  भारतीयता हमारी संस्कृति में है, जिसका प्राण संस्कृत भाषा में है। संस्कृति व्यक्ति के विकास के साथ-साथ आन्तरिक विकास की भी बोधक होती है। इसका लक्ष्य व्यक्ति का विकास और प्रकृति का सन्तुलन है। भाषा संस्कृति की वाहिका होती है। भारतीय संस्कृति के सभी पक्षों जैसे  ऐतिहासिक, आर्थिक, धार्मिक, प्राकृतिक, राजनैतिक तथा कला, ज्ञान, विज्ञान आदि का सूक्ष्म तथा वास्तविक ज्ञान संस्कृत भाषा के माध्यम से ही हो सकता है। संस्कृत भाषा में वैदिक साहित्य से अतिरिक्त भी अन्य सभी विद्याओं तथा ज्ञान-विज्ञान का बहुत सूक्ष्म अध्ययन उपलब्ध है। संस्कृत हमारे दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, गणितज्ञों, कवियों, नाटककारों, व्याकरण आचार्यों आदि की भाषा थी। इसके माध्यम से भारत की उत्कृष्टतम मनीषा, प्रतिभा, अमूल्य चिंतन, मनन, विवेक, रचनात्मक, सर्जना और वैचारिक प्रज्ञा का अभिव्यंजन हुआ है।

व्याकरण के क्षेत्र में पाणिनी और पतंजली (अष्टाध्यायी और महाभाष्य के लेखक) के समतुल्य पूरे विश्व भर में कोई दूसरा नहीं है। खगोलशास्त्र और गणित के क्षेत्र में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कर के कार्यों ने मानव जगत को नवीन मार्ग दिखाया। वहीं औषधि के क्षेत्र में चरक और सुश्रुत ने महत्वपूर्ण कार्य किया।

उक्त  विचार सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के योगसाधना केंद्र में विद्वत विचार मंथन कार्यक्रम में  राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के  सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी जी ने बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के ज्ञान तत्व को जनमानस के सामने लाने की जरूरत है, हमारे वास्तु शास्त्र में क्या है?इसके लिये यह संस्था बताये कि हम क्या थे? हमारा चिंतन क्या था?हमारा आविष्कार क्या था ? आज इसी पर मंथन कर यहाँ के विद्वानों एवं विशेषज्ञों को कार्य करने की जरूरत है।

इसके पूर्व सह-सरकार्यवाह जी ने सरस्वती भवन पुस्तकालय में संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों के लिये राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के द्वारा कराए जा रहे संरक्षण के कार्यो  एवं संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों को देखकर  अभिभूत होकर कहा कि इसके संरक्षण के साथ-साथ इस पर शोध कर नवीन ज्ञान तत्व को तैयार कर शोध व ‘स्व’ आधारित सत्य को सामने लाये यह संस्था। *ये प्राचीन ग्रंथ हैं शामिल।

 सरस्वती भवन में संरक्षित पांडुलिपियों में श्रीमद्भागवतम् (पुराण) संवत-1181 देश की प्राचीनतम कागज आधारित पाण्डुलिपि, भगवद्गीता – स्वर्णाक्षरों में लिपि, दुर्गासप्तशती कपड़े के फीते पर दो इन्च चौड़ाई रील में अतिसूक्ष्म (संवत 1885 मैग्नीफाइड ग्लास से देखा जा सकता है), रासपंचाध्यायी (सचित्र)- पुराणोतिहास विषय से युक्त-देवनागरी लिपि (स्वर्णाक्षर युक्त) इसमें श्रीकृष्ण जी के सूक्ष्म चित्रण निहित, कमवाचा (त्रिपिटक पर अंश), वर्मी लिपि- लाख पत्र पर स्वर्ण पॉलिश, ऋग्वेद संहिता भाष्यम इसके साथ ही लाह, भोजपत्र, कपड़ा काष्ठ सहित कागज पर लिपिबद्ध पांडुलिपियां शामिल हैं।

यज्ञशाला में चल रहे चतुर्वेद स्वाहाकार विश्वकल्याण चल रहे महायज्ञ के 71 वें दिन सह  सरकार्यवाह सुरेश सोनी ने यजमान के रूप में आहुति देकर आध्यात्मिक विचारधारा में कहा कि इससे धनात्मक ऊर्जा, प्राचीन शास्त्र परम्पराओं के माध्यम से वैश्विक कल्याण और आध्यात्मिक उत्थान को बढावा मिलेगा।नवीन पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परम्परा के अमृत ज्ञान तत्व के गूढ़ ज्ञान का रहस्य ज्ञात होगा।

उन्होंने प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित दुर्लभ ग्रंथों और पुस्तकों को देखकर कहा कि सम्पूर्ण देश में दुर्लभ ग्रंथों पर सभी की विश्वसनीयता और लोकप्रियता अद्भुत है।यहाँ से भारतीय ज्ञान परम्परा के गूढ़ रहस्य युक्त ग्रंथों को सरल भाषा में ज़न सुलभ बनायें जिससे आमजन भी इसका उपयोग कर सकेंगे।

श्री सोनी ने कहा कि यह संस्था 234 वर्षों से अनवरत वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति एवं भारतीयता का संदेश दे रहा है।प्रत्येक दृष्टिकोण से इसे केंद्रीय दर्जा प्राप्त होना चाहिए। इसके विश्वविद्यालय सम्पूर्ण अभिलेख तैयार करे, शीघ्र ही इसके लिए पहल किया जाएगा।

अध्यक्षता करते कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि संस्कृत भाषा की एक प्रमुख विशेषता य़ह है कि वह व्यष्टि से समष्टि को जोड़ती है। उसकी प्रत्येक प्रार्थना में विश्व बंधुत्व की भावना व्याप्त है।जो विपुल ज्ञान भंडार संस्कृत में है, उसे देश की प्रगति और मानवता के कल्याण के लिए उपयोगी हो सकता है।

य़ह संस्था भारतीय विद्याओं के संवर्धन- संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। इन विद्याओं मे सन्निहित ज्ञान सर्वज़न सुलभ बने, भारतीय, भारतीयता का बोध कराते हुये आगे बढ़े। इसी उद्देश्य के साथ इस संस्था की संरचना हुयी है।

कुलपति प्रो शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हमे प्रकृति से जोड़ती है,प्रकृति की शक्तियों को पहचानकर उसी धारा में चलने की जरूरत है। प्रकृति के प्रत्येक पक्ष से जोड़कर उसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करती है। आज इस संस्था का दायित्व और अधिक बढ़ गया है। सभी विद्वान अपने-अपने विचार तत्व को सामने लाये।

प्रारम्भ में अपने परंपरा के आलोक में कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा जी ने  मुख्य अतिथि सुरेश सोनी जी का पुष्पगुच्छ देकर स्वागत और अभिनंदन किया। उस दौरान विश्वविद्यालय परिवार के प्रो रामपूजन पाण्डेय, प्रो राजनाथ, प्रो दिनेश कुमार गर्ग, डॉ पद्माकर मिश्र, डॉ विजय कुमार शर्मा, डॉ दिनेश कुमार तिवारी साथ कुलसचिव राकेश कुमार आदि उपस्थित थे।


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