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बिलासपुर के अचानकमार टाइगर रिजर्व में फिर गूंज रही बाघों की दहाड़

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर में स्थित  अचानकमार टाइगर रिजर्व (एटीआर) आज देश में बाघ संरक्षण की एक प्रेरक मिसाल बनकर उभर रहा है। कभी महज छह बाघों तक सीमित रहने वाला यह टाइगर रिजर्व अब 18 से अधिक बाघों का सुरक्षित आवास बन चुका है। इनमें स्थानीय बाघों के साथ कान्हा और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से आए बाघ भी शामिल हैं, जिन्होंने अचानकमार के घने जंगल, पर्याप्त शिकार, प्राकृतिक जलस्रोत और सुरक्षित वातावरण को अपना नया घर बना लिया है। 

संरक्षण के सफल प्रयासों से 18 से अधिक बाघों का सुरक्षित बसेरा

विश्व बाघ दिवस के अवसर पर सामने आए आंकड़े बताते हैं कि एटीआर में बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह उपलब्धि वैज्ञानिक प्रबंधन, आधुनिक निगरानी प्रणाली, वन विभाग की सतत मेहनत तथा स्थानीय ग्रामीणों की सहभागिता का प्रतिफल मानी जा रही है।

केंद्र के मूल्यांकन में शानदार प्रदर्शन

बाघ संरक्षण एवं प्रबंधन के आधार पर केंद्र सरकार द्वारा किए गए मूल्यांकन में अचानकमार टाइगर रिजर्व को 70 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त हुए हैं। वर्ष 2018 में यह आंकड़ा 63 प्रतिशत था। इस प्रकार रिजर्व के प्रदर्शन में लगभग सात प्रतिशत का उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुधार बाघों की बढ़ती संख्या, सुरक्षित आवास और प्रभावी वन प्रबंधन का परिणाम है।

ग्लोबल टाइगर फोरम और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने भी सराहा

दिल्ली स्थित ग्लोबल टाइगर फोरम की तीन सदस्यीय विशेषज्ञ टीम ने भी अचानकमार का दौरा कर यहां के संभावित क्षेत्रों का अध्ययन किया, जहां भविष्य में अन्य टाइगर रिजर्व से बाघों को बसाया जा सकता है। सेवानिवृत्त आईएफएस एवं कान्हा टाइगर रिजर्व के पूर्व फील्ड डायरेक्टर डॉ. राजेश गोपाल के नेतृत्व में विशेषज्ञों ने लमनी, छपरवा और अचानकमार रेंज सहित विभिन्न इलाकों का निरीक्षण किया। वहीं डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया और छत्तीसगढ़ वन विभाग द्वारा संयुक्त रूप से किए गए अध्ययन में भी एटीआर में बाघों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। दिसंबर 2023 के कैमरा ट्रैप सर्वे में लगभग 10 बाघ दर्ज किए गए थे, जबकि वर्तमान में यह संख्या बढ़कर 18 से अधिक हो चुकी है।

कैमरा ट्रैप में कैद हुए बाघ, हर गतिविधि पर नजर

वन विभाग के अनुसार एटीआर में मौजूद सभी बाघों की पहचान कर उनकी कैटलॉगिंग की गई है। ट्रैप कैमरों में इनकी तस्वीरें और गतिविधियां लगातार दर्ज हो रही हैं। हालांकि, अचानकमार का जंगल कान्हा, बांधवगढ़ और आसपास के अन्य वन क्षेत्रों से प्राकृतिक कॉरिडोर के माध्यम से जुड़ा होने के कारण बाघों की आवाजाही निरंतर बनी रहती है। वर्तमान समय में एटीआर क्षेत्र में लगभग 12 बाघों की नियमित मौजूदगी दर्ज की गई है।

प्राकृतिक आवास और बेहतर सुरक्षा बना सफलता का आधार

अचानकमार का घना वन क्षेत्र बाघों सहित तेंदुआ, भालू, गौर, सांभर, चीतल और अन्य वन्यजीवों के लिए अत्यंत अनुकूल माना जाता है। पर्याप्त शिकार, जल स्रोत, प्राकृतिक आवरण और सुरक्षित आवास के कारण यहां वन्यजीवों की संख्या में भी लगातार वृद्धि हो रही है। वन विभाग द्वारा 24 घंटे गश्त, आधुनिक कैमरा ट्रैप, वैज्ञानिक मॉनिटरिंग, अवैध शिकार पर कड़ी निगरानी तथा ग्रामीणों को वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूक करने जैसे उपाय लगातार किए जा रहे हैं।

मादा बाघिन बनी संरक्षण की प्रेरणा

अचानकमार में पहुंची एक मादा बाघिन अब तक कई शावकों को जन्म दे चुकी है। हाल के वर्षों में यहां 16 शावकों के जन्म की जानकारी सामने आई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि एटीआर का वातावरण न केवल बाघों के रहने बल्कि उनके सफल प्रजनन के लिए भी अत्यंत अनुकूल है।

गुरु घासीदास-तमोर पिंगला में भी बढ़ रही संभावनाएं

प्रदेश के दूसरे प्रमुख संरक्षित क्षेत्र गुरु घासीदास-तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व में भी बाघों की नियमित मौजूदगी के प्रमाण मिल रहे हैं। देश के 56वें टाइगर रिजर्व के रूप में पहचान बना चुका यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में बाघ संरक्षण और वन्यजीव पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। यहां प्राकृतिक कॉरिडोर, आधुनिक निगरानी व्यवस्था और सुरक्षित आवास के विकास पर विशेष कार्य किया जा रहा है।

वन विभाग का दावा

प्रभारी डीएफओ अभिनव कुमार के अनुसार अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन, आधुनिक तकनीक, कैमरा ट्रैप, नियमित गश्त और स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी से लगातार बेहतर परिणाम मिल रहे हैं। आने वाले समय में बाघों की संख्या में और वृद्धि की पूरी संभावना है।

संरक्षण की नई पहचान बना अचानकमार

अचानकमार टाइगर रिजर्व आज यह साबित कर रहा है कि यदि वैज्ञानिक प्रबंधन, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और स्थानीय समुदाय का सहयोग मिले तो वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की जा सकती है। बाघों की बढ़ती दहाड़ न केवल छत्तीसगढ़ के समृद्ध जैव-विविधता की पहचान है, बल्कि यह प्रकृति संरक्षण की एक प्रेरणादायक सफलता की कहानी भी है।

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