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स्वार्थ, सफलता और संवेदनहीनता के बढ़ते संकट का सामाजिक विश्लेषण

क्या आज का मनुष्य अनैतिक होता जा रहा है?

मानव सभ्यता का इतिहास केवल भौतिक विकास का इतिहास नहीं है, बल्कि नैतिक मूल्यों, सामाजिक मर्यादाओं और मानवीय संवेदनाओं के विकास का भी इतिहास है। समाज की वास्तविक शक्ति उसके भवनों, उद्योगों या तकनीकी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र, ईमानदारी और नैतिकता में निहित होती है। किंतु आज का समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहां यह प्रश्न बार-बार उठता है…? क्या आज का मनुष्य अनैतिक होता जा रहा है?

यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि गहन सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक विमर्श का विषय है। चारों ओर दृष्टि डालें तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानो अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए नैतिक सीमाएँ लगातार टूट रही हैं। सत्य, ईमानदारी, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं, जबकि छल, अवसरवाद, झूठ, लालच और दिखावे को सफलता का पर्याय मान लिया गया है।

आज समाज में यह धारणा तेजी से फैल रही है कि “यदि लक्ष्य प्राप्त हो जाए तो साधनों की शुद्धता का कोई महत्व नहीं।” यही सोच अनैतिकता की सबसे बड़ी जड़ बनती जा रही है।

वर्तमान समय प्रतिस्पर्धा का युग है। सफलता की इच्छा स्वाभाविक है, किंतु जब सफलता किसी भी कीमत पर प्राप्त करने की मानसिकता बन जाती है, तब नैतिकता सबसे पहले बलि चढ़ती है। नौकरी, व्यापार, राजनीति, शिक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा अथवा आर्थिक लाभ हर क्षेत्र में कुछ लोग अनुचित साधनों का सहारा लेने में संकोच नहीं करते।

आज व्यक्ति यह कम सोचता है कि उसका कार्य समाज को क्या संदेश देगा; वह केवल यह सोचता है कि उससे उसका व्यक्तिगत लाभ कितना होगा। यही प्रवृत्ति सामाजिक विश्वास को कमजोर कर रही है।

सूचना प्रौद्योगिकी ने जीवन को सरल बनाया है, परंतु इसके साथ नई प्रकार की अनैतिकताओं ने भी जन्म लिया है। फर्जी समाचार, चरित्र हनन, साइबर अपराध, ट्रोलिंग, अफवाह, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दुरुपयोग और झूठे प्रचार का विस्तार यह संकेत देता है कि तकनीक स्वयं समस्या नहीं है; समस्या उसके उपयोगकर्ता की नैतिक चेतना में है।

आज कुछ लोग प्रसिद्धि, राजनीतिक लाभ या आर्थिक कमाई के लिए असत्य को भी सच की तरह प्रस्तुत करने लगे हैं। इससे समाज में भ्रम, अविश्वास और वैमनस्य बढ़ रहा है। नैतिकता का संकट केवल व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था का भी है।

यह मान लेना उचित नहीं होगा कि केवल व्यक्ति ही अनैतिक हुआ है। अनेक बार सामाजिक व्यवस्था भी ऐसी बन जाती है जहाँ ईमानदार व्यक्ति स्वयं को असहाय महसूस करता है। जब भ्रष्टाचार को सफलता, छल को चतुराई और अवसरवाद को नेतृत्व समझा जाने लगे, तब नैतिक व्यक्ति स्वयं को उपेक्षित अनुभव करने लगता है।

फिर भी यह भी उतना ही सत्य है कि हर युग में ईमानदार, संवेदनशील और चरित्रवान लोग भी बड़ी संख्या में मौजूद रहे हैं। इसलिए पूरे समाज को अनैतिक घोषित करना न्यायसंगत नहीं होगा। समस्या यह है कि अनैतिक घटनाएँ अधिक दिखाई देती हैं और उनका प्रभाव व्यापक होता है।

नैतिकता का प्रथम विद्यालय परिवार होता है। यदि बच्चों को बचपन से सत्य, अनुशासन, संवेदना और जिम्मेदारी का संस्कार न मिले तो केवल विद्यालय उन्हें नैतिक नहीं बना सकता।

आज अनेक परिवारों में सफलता की परिभाषा केवल धन, पद और प्रतिष्ठा तक सीमित होती जा रही है। चरित्र निर्माण की चर्चा अपेक्षाकृत कम हो रही है। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी उपलब्धि तो सीख रही है, लेकिन उसके साथ उत्तरदायित्व नहीं सीख पा रही।

अनैतिकता का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव विश्वास का टूटना है। जब समाज में लोग एक-दूसरे पर भरोसा खो देते हैं, तब सामाजिक ताना-बाना कमजोर होने लगता है।

इसके परिणाम अनेक रूपों में सामने आते हैं- भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों में वृद्धि। पारिवारिक संबंधों में अविश्वास। सामाजिक तनाव और वैमनस्य। मानसिक असुरक्षा और भय। युवाओं में गलत आदर्शों का निर्माण। यह विकृतियां अब दिखने लगी हैं। जो की चिंतनीय विषय है।

जब समाज में ईमानदारी अपवाद और बेईमानी सामान्य लगने लगे, तब वह समाज दीर्घकाल तक स्वस्थ नहीं रह सकता।

इसके समाधान की अगर बात करें तो समाधान केवल कानून से नहीं आएगा। कानून अपराध को रोक सकता है, लेकिन चरित्र का निर्माण नहीं कर सकता। नैतिक समाज बनाने के लिए परिवार, शिक्षा, मीडिया, धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं और शासन सभी को अपनी-अपनी भूमिका निभानी होगी।

सबसे आवश्यक है कि हम अपने बच्चों को केवल सफल नहीं, बल्कि सज्जन और उत्तरदायी नागरिक बनने की प्रेरणा दें। समाज में ऐसे व्यक्तियों का सम्मान बढ़ाना होगा जो सत्यनिष्ठा और ईमानदारी का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

आज यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि पूरा मानव समाज अनैतिक हो गया है, किंतु यह कहना भी असत्य होगा कि अनैतिकता नहीं बढ़ रही। वास्तव में समस्या यह है कि स्वार्थ की तीव्रता ने नैतिक विवेक को चुनौती दी है। यदि यह प्रवृत्ति अनियंत्रित रही तो सामाजिक विश्वास, मानवीय संबंध और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।

समय की मांग है कि विकास और नैतिकता साथ-साथ चलें। क्योंकि जिस समाज में चरित्र का मूल्य समाप्त हो जाता है, वहाँ समृद्धि भी स्थायी नहीं रह सकती।

“धन से सम्पन्न समाज शक्तिशाली हो सकता है, परंतु नैतिकता से सम्पन्न समाज ही वास्तव में सभ्य कहलाता है।”

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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