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आर्थिक मोर्चे की दो शानदार खबरों से सशक्त होता भारत

-ः ललित गर्ग:-
राजनीतिक गर्मा-गर्मी के बीच मतदान से ठीक एक दिन पहले आर्थिक मोर्चे पर दो शानदार खबरें आई है, जो न केवल चौंका रही है, आश्चर्यचकित कर रही है बल्कि अपूर्व खुशी का अहसास करा रही है। भारत भूमि पर भारतीय रिजर्व बैंक के खजाने में 100 टन से कुछ ज्यादा स्वर्ण का शामिल होना सुखद और गौरवान्वित करने वाली खबर है। इसी तरह दूसरी महत्वपूर्ण खबर है पूर्व के सभी अनुमानों को ध्वस्त करते हुए देश की अर्थव्यवस्था ने 8.2 फीसदी की दर से उड़ान भरी है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2023-24 की जनवरी-मार्च चौथी तिमाही में सालाना आधार पर 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, पहली तिमाही अप्रैल-जून में 7.8 फीसदी, दूसरी तिमाही जुलाई- सितंबर में 7.6 प्रतिशत और तीसरी तिमाही अक्टूबर- दिसंबर में 8.6 फीसदी की दर से बढ़ी थी। इसके साथ ही पूरे वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर बढ़कर 8.2 प्रतिशत हो गई। जीडीपी की यह रफ्तार दुनिया के सभी विकसित एवं विकासशील देशों में सर्वाधिक है। उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति की यह तेज गति सशक्त अर्थव्यवस्था को एवं दुनिया की तीसरी आर्थिक महाताकत बनने के संकल्प को बल देगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूसरे कार्यकाल की एक मौलिक सोच एवं दृष्टि से ही भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया में एक चमकते सितारे के रूप में उभरी है, सुदृढ़ आर्थिक विकास के सुनहरे परिदृश्य प्रस्तुत कर रही है एवं “मजबूत आर्थिक विकास” को दर्शा रही है।

जीडीपी की शिखर की ओर बढ़ने की गति भारत के शक्तिशाली बनने का आधार है। विनिर्माण, निर्माण, लोक प्रशासन, रक्षा और अन्य सेवाओं द्वारा प्रोत्साहित, चौथी तिमाही की 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर अर्थशास्त्रियों द्वारा लगाए गए 7.3-7.4 प्रतिशत के उच्चतम अनुमान से कहीं अधिक रही। और 8.2 प्रतिशत की पूर्ण वर्ष की वृद्धि दर आरबीआई द्वारा अनुमानित 7 प्रतिशत और एनएसओ द्वारा 2023-24 के लिए 7.6 प्रतिशत के दूसरे अग्रिम अनुमान से अधिक है। यह आंकड़ा सभी अनुमानों एवं पूर्वानुमानों से ऊपर है। जीडीपी की गति इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, डिजिटल और सामाजिक विकास की दृष्टि से देश को आत्मनिर्भर बनाने की रफ्तार को भी गति देगी। यह आर्थिक विकास देश को न केवल विकसित देशों में बल्कि इसकी अर्थव्यवस्था को विश्व स्तर पर तीसरे स्थान दिलाने के संकल्प को बल देने में सहायक बनेगा। यह जीडीपी इसलिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि मोदी सरकार ने देश के आर्थिक भविष्य को सुधारने पर ध्यान दिया, न कि लोकलुभावन योजनाओं के जरिये प्रशंसा पाने अथवा कोई राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की है। राजनीतिक हितों से ज्यादा देशहित को सामने रखने की यह पहल अनूठी है, प्रेरक है। अमृत काल यानी 2047 तक भारत की अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का विजन निश्चित ही हम हासिल करेंगे।  
ध्यान देने की बात है कि आजादी के बाद की अधिकतम शासन करने वाली सरकारों ने आर्थिक संकट ही खड़े किये थे। साल 1991 में जब भारत पर आर्थिक संकट आया था, तब शायद भारतीय अर्थव्यवस्था से दुनिया के ज्यादातर देशों को विश्वास कुछ डिग गया था। मजबूरी में देश को अपना सोना विदेश भेजना पड़ा था। तब कर्ज का जाल भारी हो गया था, लेकिन आज भारत की अर्थव्यवस्था बेहतर प्रदर्शन कर रही है और कर्ज चुकाना अब समस्या नहीं है। ऐसे में, इतने बड़े पैमाने पर विदेश से सोना लाने की प्रशंसा ही की जा सकती है। मार्च के अंत तक रिजर्व बैंक के पास 822.1 टन सोना था, जिसमें से 413.8 टन विदेश में था। वास्तव में, अपना सोना किसी अन्य देश में रखने को बहुत अच्छा नहीं माना जाता है। रिजर्व बैंक शायद संदेश देना चाहता है कि भारत अब शक्तिशाली है और वह अपने सोने की हिफाजत खुद कर सकता है। आज अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर हम ब्रिटेन से आगे निकल गए हैं, तो हमें अपनी नीतियों में गरिमा के अनुरूप परिवर्तन करना ही चाहिए। वैसे, भारत की स्थिति अचानक नहीं सुधरी है। एक खास बात यह भी है कि भारत चालू वित्त वर्ष में ऐसे चंद देशों में शुमार है, जिन्होंने सोना खरीदा है। भारतीय रिजर्व बैंक ने कुछ ही महीनों में 27.5 टन सोना खरीदकर अपने स्वर्ण भंडार में जमा किया है।
 स्वर्ण भंडार के मामले में भारत 822.1 टन के साथ दुनिया में नौवें स्थान पर है और अमेरिका के पास सर्वाधिक 8,133 टन से ज्यादा सोना है। जर्मनी के पास 3,352 टन सोना है। उसके बाद इटली, फ्रांस, रूस, चीन (2,262 टन), स्विट्जरलैंड और जापान का स्थान है। समय के साथ सोने का भाव बढ़ता ही रहा है, बीस साल पहले जो सोना 6,307 रुपये प्रति दस ग्राम का था, वही सोना आज 73,390 रुपये प्रति 10 ग्राम का हो गया है। जाहिर है, सोने की मांग नहीं घटने वाली, पर ज्यादा से ज्यादा भारतीयों को अपनी बुद्धि, कौशल और श्रम से सोना खरीदने में सक्षम होना पड़ेगा, तभी देश के स्वर्ण भंडार की खनक-चमक बढ़ेगी। कई उच्च आवृत्ति संकेतक जैसे जीएसटी संग्रह, बिजली खपत, माल ढुलाई आंकड़े आदि संकेत देते हैं कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था लचीली और उत्साही बनी हुई है। मोदी यदि तीसरे कार्यकाल के लिये प्रधानमंत्री चुने जाते हैं तो भारत की आर्थिक विकास गति जारी रहेगी। जीडीपी एवं आर्थिक गति मूडीज, फिच, एसएंडपी, नोमुरा, रिजर्व बैंक, आईएमएफ आदि दिग्गज वित्तीय संस्थानों के अनुमानों को ठुकराते हुए नई छलांगे लगायेगी।

 प्रधानमंत्री ने देश में आतंकवादी वारदातें कम होने, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने, सरकार के ईमानदारी और पारदर्शिता से काम करने का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी सरकार ने गरीबों के कल्याण के लिए ज्यादा से ज्यादा धन खर्च किया है और 13.5 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला है। निश्चित ही भारत से गरीबी दूर हो रही है।  उन्होंने देशवासियों को इस बात का अहसास कराया कि जब देश आर्थिक रूप से मजबूत होता है तो तिजोरी ही नहीं भरती बल्कि देश का सामर्थ्य भी बढ़ता है। उन्होंने देशवासियों से परिवारवाद, भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण के खिलाफ लड़ने का आह्वान भी किया क्योंकि ये गरीब, पिछड़े, आदिवासियों और दलितों का हक छीनते हैं।
यह उल्लेखनीय एवं संतोष का विषय है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। ‘इंडियन इकॉनमी- अ रिव्यू’ में यह उम्मीद जताई गई है कि भारत 2027 तक 5 ट्रिलियन डॉलर और 2030 तक 7 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बन जाएगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार इस बात की गारंटी दे रहे हैं कि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो जाएगा। भारत फिलहाल दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। वैश्विक वित्तीय संस्थान मॉर्गन स्टेनली ने भी ऐसी ही भविष्यवाणी की थी। तमाम तरह की अनुकूलताओं एवं गुलाबी अर्थ रंगों के बावजूद हमें आर्थिक गति की बाधाओं पर भी ध्यान देना होगा। तेज विकास दर के बावजूद रोजगार के मोर्चे पर खास प्रगति नहीं हुई है। आज भी युवा बेरोजगारी का स्तर 40 फीसदी तक बताया जाता है। यह स्थिति गंभीर इसलिए भी है कि यह तेज विकास दर के फायदों को सीमित करती है। एक बड़ी चुनौती यह भी है कि निजी पूंजी निवेश में बढ़ोतरी नहीं हो रही है। श्रम-शक्ति में महिलाओं की कम भागीदारी आर्थिक ही नहीं सामाजिक और अन्य दृष्टियों से भी चिंता की बात है। इस मामले में हम पड़ोस के बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी पीछे हैं। अर्थव्यवस्था से जुड़ी दो खबरों ने राहत की सांसें है जिससे नया भारत- सशक्त भारत के निर्माण का संकल्प भी बलशाली बन सकेगा। सच्चाई यही है कि जब तक जमीनी विकास नहीं होगा, तब तक आर्थिक विकास की गति सुनिश्चित नहीं की जा सकेगी।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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