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युवा शक्ति : विकसित भारत का संकल्प और विश्व मानवता की आशा

12 अगस्त – विश्व युवा दिवस पर विशेष

विश्व में प्रतिवर्ष 12 अगस्त को विश्व युवा दिवस मनाया जाता है। इस दिवस की घोषणा संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1999 में की थी तथा पहली बार इसे वर्ष 2000 में मनाया गया। इसका उद्देश्य युवाओं की क्षमता, उनकी समस्याओं, उनके अधिकारों तथा राष्ट्र एवं विश्व निर्माण में उनकी भूमिका के प्रति वैश्विक जागरूकता उत्पन्न करना है।

किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि उसके जागरूक, शिक्षित, संस्कारित और ऊर्जावान युवा होते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब युवाओं ने अपने सामर्थ्य को राष्ट्रहित में लगाया है, तब-तब समाज और सभ्यता ने नई ऊँचाइयों को प्राप्त किया है। भारत का स्वतंत्रता संग्राम हो, वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हों, सामाजिक परिवर्तन हो या लोकतंत्र की मजबूती ,हर युग में युवाओं ने अग्रणी भूमिका निभाई है।

आज भारत विश्व के सबसे युवा देशों में शामिल है। देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है और बड़ी आबादी कार्यशील आयु वर्ग में है। यह जनसांख्यिकीय शक्ति भारत के लिए एक अमूल्य अवसर है। यदि इस युवा ऊर्जा को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक कौशल, रोजगार, नवाचार और नैतिक मूल्यों से जोड़ा जाए तो भारत विश्व की अग्रणी आर्थिक और ज्ञान-शक्ति बन सकता है।

विश्व युवा दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी दिन है। आज का युवा अभूतपूर्व अवसरों और गंभीर चुनौतियों—दोनों के बीच खड़ा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल क्रांति, स्टार्टअप संस्कृति, अंतरिक्ष विज्ञान और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ने युवाओं के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। वहीं बेरोज़गारी, मानसिक तनाव, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति, साइबर अपराध, सोशल मीडिया की लत, फेक न्यूज़ और नैतिक मूल्यों का क्षरण जैसी चुनौतियाँ भी उसके सामने हैं।

युवा शक्ति तभी सार्थक होती है जब उसमें ज्ञान के साथ विवेक, तकनीक के साथ संवेदना और अधिकारों के साथ कर्तव्यबोध भी हो। केवल डिग्री प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है; आवश्यक है कि युवा चरित्रवान, अनुशासित, आत्मनिर्भर और राष्ट्रनिष्ठ बनें। राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक युवा की सहभागिता से ही संभव होता है।

भारत के महान विचारक संत स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था—”उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक मत रुको।” यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना एक शताब्दी पूर्व था। उनके अनुसार युवा केवल आयु का नाम नहीं, बल्कि साहस, आत्मविश्वास, सेवा और सतत् कर्म का प्रतीक है। युवाओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, लैंगिक समानता, लोकतांत्रिक मूल्यों, संविधान के प्रति सम्मान तथा राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना विकसित की जाए। शिक्षा संस्थानों को केवल परीक्षा केंद्र नहीं, बल्कि नेतृत्व, अनुसंधान, नवाचार और चरित्र निर्माण के केंद्र बनना होगा।

आज का युवा केवल अपने भविष्य का निर्माता नहीं, बल्कि विश्व की दिशा तय करने वाला नागरिक भी है। उसकी ऊर्जा यदि सकारात्मक दिशा में प्रवाहित हो, तो वह गरीबी, अशिक्षा, भेदभाव, प्रदूषण और हिंसा जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान बन सकता है। हम संकल्प लें कि युवाओं को अवसर, मार्गदर्शन और विश्वास प्रदान करेंगे, ताकि वे अपने सपनों के साथ-साथ राष्ट्र के सपनों को भी साकार कर सकें। क्योंकि जिस राष्ट्र का युवा जागृत, संस्कारित और कर्मठ होता है, उसी राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित, समृद्ध और गौरवशाली होता है।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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