NEW English Version

आज के युवा को केवल अधिकार नहीं अपने दायित्वों का भी बोध रखना होगा

लोकतंत्र में उग्रता नहीं, विवेक और उत्तरदायित्व ही परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम है

      किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसकी युवा शक्ति होती है। युवा केवल वर्तमान का प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि वह भविष्य का निर्माता भी होता है। उसकी ऊर्जा, उसकी चेतना, उसका विवेक और उसका चरित्र ही यह निर्धारित करते हैं कि आने वाला भारत कैसा होगा। इसलिए जब देश का युवा अपने अधिकारों के लिएू सड़क पर उतरता है, तो यह लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण माना जाता है। किंतु वही युवा यदि अपने अधिकारों की लड़ाई में संवैधानिक मर्यादाओं, सामाजिक अनुशासन और लोकतांत्रिक मूल्यों को भूलने लगे, तो यह केवल एक आंदोलन का विषय नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है।

        हाल के वर्षों में देश ने अनेक युवा आंदोलनों को देखा है। इन आंदोलनों ने यह सिद्ध किया है कि आज का युवा अपने अधिकारों के प्रति पहले से अधिक सजग, शिक्षित और मुखर है। वह अन्याय का प्रतिकार करना जानता है और शासन-प्रशासन से जवाबदेही की अपेक्षा रखता है। यह स्वस्थ लोकतंत्र का सकारात्मक पक्ष है। किंतु इसके साथ एक दूसरा पक्ष भी सामने आता है, जो कहीं अधिक चिंताजनक है।

जब किसी आंदोलन में उत्तेजना, हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति, सुरक्षा बलों पर हमला, अपमानजनक भाषा अथवा संवैधानिक संस्थाओं के प्रति असम्मान दिखाई देता है, तब यह आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है कि क्या हम अधिकारों की लड़ाई लड़ते-लड़ते अपने कर्तव्यों को भूलते जा रहे हैं ?

भारत का संविधान केवल अधिकारों का दस्तावेज़ नहीं है। वह नागरिकों को मौलिक कर्तव्यों का भी बोध कराता है। दुर्भाग्य यह है कि हमारे समाज में अधिकारों की चर्चा तो व्यापक रूप से होती है, किंतु कर्तव्यों पर अपेक्षाकृत कम बल दिया जाता है। परिणामस्वरूप अनेक बार अधिकारों की मांग तो लोकतांत्रिक होती है, लेकिन उन्हें प्राप्त करने के तरीके लोकतांत्रिक नहीं रह जाते।

यहां सबसे बड़ा प्रश्न शिक्षा का भी है। क्या केवल डिग्रियां प्राप्त कर लेना शिक्षित होने का प्रमाण है ? यदि शिक्षा व्यक्ति में संयम, संवाद, सहिष्णुता, अनुशासन और राष्ट्रहित का बोध उत्पन्न नहीं करती, तो वह अधूरी शिक्षा है। बुद्धिमान होना और विवेकशील होना दोनों अलग बातें हैं। बुद्धि तर्क करना सिखाती है, किंतु विवेक सही निर्णय लेना सिखाता है। आज आवश्यकता बुद्धि से अधिक विवेक की है।

भारतीय संस्कृति ने सदैव कहा है कि “विद्या ददाति विनयम्” – सच्ची विद्या विनम्रता देती है, अहंकार नहीं; संयम देती है, उग्रता नहीं; समाधान देती है, संघर्ष नहीं। यदि शिक्षा के साथ संस्कार नहीं जुड़े, तो ज्ञान भी कभी-कभी विनाश का कारण बन सकता है।

आज अभिभावकों के सामने भी एक गंभीर चुनौती है। वे अपने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं, तकनीकी शिक्षा और रोजगार के लिए तो तैयार कर रहे हैं, किंतु क्या वे उन्हें संविधान, लोकतांत्रिक मर्यादाओं, सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक साहस का भी पाठ पढ़ा रहे हैं ? परिवार केवल आर्थिक सुरक्षा देने का माध्यम नहीं है; वह चरित्र निर्माण की प्रथम पाठशाला भी है। यदि घर में संवाद, अनुशासन और नैतिकता का वातावरण होगा, तो समाज भी सुदृढ़ होगा।

सोशल मीडिया के युग में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। आज अफवाहें, अधूरी सूचनाएं और भावनात्मक उकसावे कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाते हैं। ऐसे समय में प्रत्येक युवा को स्वयं से प्रश्न करना चाहिए..क्या मैं किसी भी संदेश पर बिना सत्यापन के विश्वास कर लेता हुं? क्या मैं भीड़ का हिस्सा बनकर सोचता हुं, या फिर अपने विवेक से निर्णय लेता हुं ?

लोकतंत्र में असहमति राष्ट्रद्रोह नहीं है और विरोध भी अपराध नहीं है। किंतु असहमति का अधिकार तभी सम्मानित होता है जब वह संविधान की मर्यादाओं के भीतर व्यक्त किया जाए। हिंसा किसी भी पक्ष से हो, वह लोकतंत्र की शक्ति नहीं, उसकी कमजोरी का प्रतीक है। इसलिए राज्य, प्रशासन, आंदोलनकारी और समाज सभी को आत्मसंयम और संवाद की संस्कृति को अपनाना होगा।

आज आवश्यकता किसी विशेष आंदोलन या किसी एक वर्ग का मूल्यांकन करने से अधिक उस व्यापक मानसिकता को समझने की है, जिसमें अधिकार तो याद रहते हैं, पर कर्तव्य पीछे छूट जाते हैं। यह प्रवृत्ति यदि बढ़ी, तो लोकतंत्र केवल मांगों का मंच बनकर रह जाएगा, उत्तरदायित्व का नहीं।

भारत का भविष्य संसद की दीवारों से उतना नहीं बनेगा, जितना देश के युवाओं के चरित्र से बनेगा। यदि युवा अपने अधिकारों के साथ संविधान, कर्तव्य, अनुशासन, राष्ट्रहित और मानवीय संवेदनाओं को भी समान महत्व देंगे, तो भारत को विकसित राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता। आज समय का संदेश स्पष्ट है-  “अधिकार हमें बोलना सिखाते हैं, पर कर्तव्य हमें सुनना भी सिखाते हैं।

ज़ी हां, अधिकार हमें शक्ति देते हैं, पर कर्तव्य उस शक्ति को दिशा देते हैं। और जब शक्ति तथा दिशा दोनों राष्ट्रहित में मिल जाते हैं, तभी इतिहास बदलता है।” युवाओं से यही अपेक्षा है कि वे संघर्ष करें, प्रश्न करें, परिवर्तन की मांग करें,परंतु संविधान की मर्यादा, लोकतंत्र की गरिमा और भारतीय संस्कृति के संस्कारों को साथ लेकर। यही सच्चे राष्ट्रनिर्माता की पहचान है।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Translate »