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पाठ्य-पुस्तक ‘पंखुड़ी’ का मुखपृष्ठ और कक्षा तीन के बच्चे

2 अगस्त, 2024 की रात झमाझम बारिश से गांव की सड़क कीचड़ और गोबर से सनी हुई थी। मैं अतर्रा-नरैनी मुख्य मार्ग छोड़कर कार्य स्थल गांव की ओर मुड़ा ही था कि कीचड़ से बाइक फिसलते-फिसलते बची। पीछे बैठे शिक्षक साथी ने गीली जमीन पर अपने पांव मजबूती से जमा न दिये होते तो गिर ही गये थे। हमारे पैर कीचड़ से सराबोर थे, मेरे दाहिने पैर का सैंडल कीचड़ में कहीं गहरे घुस गुम हो गया था, ऊपर की जेब में रखी छोटी डायरी और पेन उछलकर कीचड़ के ढेर पर पड़े कराह रहे थे। अभी भी आसमान में बादल मंडरा रहे थे।‌ कुछ काले पनीले बादल गांव के ऊपर झुक आये थे मानो कि अब बरसें कि तब। सैंडल खोज और पैरों को झटक कीचड़ साफ कर आगे बढ़े तो विद्यालय के बगल के नाले का पानी टूटी पुलिया को छूकर बहता मिला। सावधानी से पुलिया पार कर विद्यालय के मुख्य द्वार पर पहुंच देखा कि सामने के तालाब के भीटे से गेट तक एक सैकड़ा से अधिक गायें और कुछ बैल बैठे-खड़े मिले‌। पुलिया से विद्यालय तक 20 मीटर के कंक्रीट रास्ते पर भीटे की गीली चिकनी मिट्टी जमा थी, बाइक फिसली जा रही थी। गेट पर कुछ बच्चे और रसोईया प्रतीक्षा में थे, जल्दी से गेट खोला और अंदर प्रवेश किया कि तभी बादल बरस पड़े मानो हमारे सुरक्षित स्कूल पहुंच जाने का इंतजार कर थे।

मेरा पहला पीरियड कक्षा तीन में हिंदी भाषा का था। उस दिन मैं हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘पंखुड़ी’ के पाठ 8 की कविता ‘अगर पेड़ भी चलते होते’ (कवि दिविक रमेश) पर बातचीत करने वाला था। दरअसल पढ़ाने को मैं एकतरफा शिक्षकीय निर्देश की बजाय हमेशा बच्चों से आपसी बातचीत या संवाद के रूप में ही देखता हूं। कक्षा में नामांकित 21 बच्चों में से मैंने चार-चार बच्चों के पांच समूह बना रखे हैं। हर महीने समूहों का पुनर्गठन होता है ताकि सभी बच्चों को एक-दूसरे के साथ काम करने और सीखने का अवसर मिलता रहे। छोटे समूहों पर काम करके फिर बड़े समूह यानी पूरी कक्षा के सामने प्रस्तुति और संवाद से विषय की पहुंच हर एक बच्चे तक बहुत स्पष्ट और सहजता से हो जाती है, ऐसा मेरा अनुभव रहा है।

इस कविता के लिए भी मैंने कुछ गतिविधियां करवाने हेतु सभी समूह में अलग-अलग कार्यों का बंटवारा कर रखा था। पहले समूह को एक चार्ट पर साज-सज्जा के साथ कविता को लिखने का काम दिया गया था। दूसरे समूह को आर्ट पेपर पर कविता से संबंधित चित्र बना चार्ट पर चिपकाने थे। तीसरे समूह को कविता में आए कठिन शब्दों के अर्थ, विलोम और पर्यायवाची शब्दों पर काम करते हुए पाठ के अंत में दिए प्रश्नों सहित बच्चों के समझ अनुसार उत्पन्न होने वाले अन्य प्रश्न और उनके उत्तर लिखने थे। चौथे समूह को परिवेश में पाए जाने वाले पेड़-पौधों के नाम लिख चित्र बनाते हुए उनके लाभ अंकित करने थे और पांचवें समूह को पुस्तकालय की पुस्तकों से वृक्षों के महत्व पर कुछ अन्य कविताएं चयन कर ए-4 पेपर में लिखकर चार्ट में चिपकानी थीं। इन सब काम के लिए कक्षाकक्ष की अलमारी में हमेशा सादे और लाइनदार ए-4 कागज, चार्ट, पटरी-पेंसिल-इरेजर, कलर, स्केच और मार्कर पेन, गोंद, सुतली, छोटी कीले आदि सामग्री उपलब्ध रहती है।

थोड़ी सी अनौपचारिक बातचीत के बाद समूहों के साथ काम शुरू करने ही वाला था कि अंबिका देवी पाठ्य पुस्तक ‘पंखुड़ी’ लेकर मेरे पास आई और कवर में अंकित चित्र को दिखाकर पूछा कि यह सूरजमुखी का फूल है ना? मैंने सहमति में सिर हिलाया। तब वह बोली कि निराशा और सुनैना कह रही हैं कि यह बेला-चमेली के फूल हैं, तब तक वे दोनों भी मेज के निकट दौड़ कर पहुंच गईं और बोलीं कि उनके घर में इसी तरह के बेला-चमेली फूल हैं। मैंने उन्हें चमेली-बेला और सूरजमुखी के फूल मोबाइल पर दिखाए। तब तीनों संतुष्ट हो अपने स्थान पर बैठ गईं। तभी अरुण ने सवाल उछाला कि लड़की के हाथ के ऊपर उड़ रही दतैया (ततैया) क्या फूलों का रस पीने आई थी। लेकिन कक्ष के बायें कोने में पीछे बैठी काजल ने कहा कि यह तो मधुमक्खी है, तुम्हें इतना भी नहीं पता। सभी बच्चे उसकी बात से सहमति दिखा खिलखिला कर हंस पड़े। अरुण झेंप गया‌। सभी बच्चे तितली की बजाय उसे मधुमक्खी ही समझ रहे थे। मुझे लगा की कविता के पाठ पर काम करने की बजाय क्यों न आज हम लोग मुखपृष्ठ पर बातचीत करते हुए अपने परिवेश से जोड़ते हुए एक सामान्य समझ विकसित करें।

बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। मैंने मुखपृष्ठ दिखाते हुए कहा इस पूरे चित्र में क्या-क्या दिखाई पड़ रहा है? सभी बच्चों के हाथ उठ गए थे। मैंने प्रत्येक समूह से दो बच्चों को उत्तर देने के लिए निर्देशित किया। समूह एक से अंशिका बोली कि एक लड़की यूनिफॉर्म पहने हुए बालों में फीता बांधे हुए दिख रही है तो दूसरे छात्र गोपाल सिंह ने कहा कि इसमें आकाश का नीलापन और सूरज के उगने का पीलापन भी है। अगले समूह से पुष्पेन्द्र खड़ा हुआ और ऊपर दाहिनी ओर बने शिक्षा का अधिकार लोगो की ओर संकेत करते हुए कहा कि इस पेज में गिनती (अंक) भी लिखी है। इस समूह से ही एक लड़की अलका ने कहा कि एक लड़का और एक लड़की पेंसिल पर बैठे हुए हैं।

मैंने कहा कि इस चित्र में लड़की ही आगे क्यों है? बच्चों के उत्तर मुझे चौंकाने वाले थे। लड़कियां बोल पड़ीं, क्योंकि लड़कियां पढ़ने-लिखने और सभी काम में में सबसे आगे हैं। पूरी कक्षा में हंसी का फव्वारा बिखर गया तभी एक लड़के ने हस्तक्षेप किया कि ऐसा नहीं है लड़के भी पढ़ने में होशियार और आगे रहते हैं। कोई किसी की बात को काट नहीं रहा था, यह मुझे अच्छा लगा। यह शायद उनके साथ पिछले वर्ष से किये जा रहे बातचीत के तौर तारीके का असर ही था। अगले समूह से एक पतली सी लड़की आराधना ने पूछा कि अगर यह मधुमक्खी नहीं है तो क्या है सर? मैंने कहा कि यह तितली है। तभी राधा तपाक से बोली कि तितली फूलों का रस पीती है क्या? मैंने कहा कि हां, और तितली का एक वीडियो नेट पर दिखाया जिसमें तितली अपने दो लंबे सुंड से फूलों का रस पी रही थी।

मैं आगे बोला कि यदि मधुमक्खी और तितलियां न हों तो फैसलें उगाना लगभग सम्भव नहीं होगा। बच्चे आश्चर्यचकित थे क्योंकि वह परागण की प्रक्रिया से परिचित नहीं थे। मैंने बस इतना कहा कि तितली और मधुमक्खी द्वारा फूलों का रस चूसते समय उनके पैरों, पंखों और सुंड में परागकण चिपक जाते हैं और दूसरे फूल पर बैठने से उसमें चिपक जाते हैं तभी उनमें फल और दाने बनते हैं। बातचीत आगे और बढ़ती इसके पूर्व घंटी लग चुकी थी। मैंने उन्हें परिवेश में उगे फूलों को निकट से अवलोकन-निरीक्षण कर उनके नाम लिखने और तितली का चित्र बनाने का काम दिया और इसी तरह अन्य पुस्तकों के मुखपृष्ठ पर परस्पर बातचीत करने हेतु प्रेरित कर कक्षा से बाहर निकल गया। मैंने पलट कर देखा, बच्चे अपने बस्तों से दूसरी पुस्तकें निकाल उनके मुखपृष्ठ का अवलोकन कर रहे थे। कक्ष के बाहर उगा किशोर कदम्ब का पौधा मुस्कुराने लगा था।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
प्रमोद दीक्षित मलय
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