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भैरव बाबा की पूजा से अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति

-22 नवंबर बाबा भैरव नाथ जयंती पर-

रतनपुर में आदिशक्ति महामाया कौमारी शक्तिपीठ के रूप में विराजमान है वहीं उनके रक्षक भैरव नाथ का  का मंदिर बिलासपुर की ओर से मां महामाया मंदिर से तकरीबन ढाई किलोमीटर पहले स्थित है। यह मंदिर सिद्ध तंत्र पीठ श्री काल भैरव मंदिर से विख्यात है। यह बिलासपुर रतनपुर मार्ग में दाहिनी तरफ है। हजारो भक्त भैरव के दर्शन करने और अभीष्ट कामना की पूरी करने आते हैं। लगभग एक हजार वर्ष प्राचीन महामाया देवी का दिव्य एवं भव्य मंदिर दर्शनीय हैं। इसका निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा  ग्यारहवीं शताब्दी में कराया गया था। यह मूर्ति पहले खुले चबूतरे पर विराजित थी, बाद में मंदिर का निर्माण बाबा ज्ञानगिरी गोसाई ने करवाया ।

मंदिर में लगी प्रतिमा कब से है, इसकी कोई जानकारी किसी के पास नही है| ऐसा माना जाता है जब सती का दाहिना स्कंद यहा गिरा तब ही भैरव मूर्ति रक्षक बन यहां स्थापित हो गयी होगी। यहां दर्शन करने के बाद ही कौमारी शक्तिपीठ के दर्शन पूर्ण माने जाते हैं। इस मंदिर में स्थापित मूर्ति दस फीट ऊंचाई की है। जो नित्य बढ़ती ही जा रही है। यह रौद्र रूप दुष्टों के लिए और अपने भक्तो की सुरक्षा के लिए है। बीस भुजाओ में विभिन्न आयुध है और प्रतिमा बहुत सारे अलंकरणों से सज्जी हुई है। यहां का सभाग्रह छोटा और संकरा है ।यह प्रतीक है की यहा प्राचीन काल में सिद्ध योगी, तांत्रिक साधना करने आते होंगे।

माँ महामाया शक्तिपीठ दर्शन के बाद भैरव के दर्शन करने से शिव पार्वती की अपार कृपा की प्राप्ति होती है । मानसिक और शारीरि कष्ट दूर होते हैं ।आपके मनोरथ पूरे होते हैं। जादू मंत्र, भुत प्रेत दोष दूर होते हैं। इस मंदिर में भैरव जयंती (कालाष्टमी) और अन्य भैरव पूजा के दिन में कई सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रम करवाए जाते है! यहां पूजा पाठ हवन यज्ञ का कार्य चलता ही रहता है !यहाँ जनकल्याण के कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाती है !पिछले कई वर्षो से भैरव जन्मोत्सव पर सामूहिक विवाह करवाए जा रहे है| साथ ही निशुल्क स्वास्थ्य परिक्षण चिकित्सक द्वारा समय समय पर होता रहता है!    

यहाँ विराजित भैरव सहित अन्य मंदिरों में तैयारियां शुरु हो गई हैं। हनुमान जी की तरह भैरवजी की प्रतिमा पर भी सिंदूर का चोला अर्पित किया जाता है। मूंग व उड़द की दाल के मंगौड़े, इमरती, कचौड़ी का भोग अर्पित होता है। भैरव अष्टमी के साथ छप्पन भोग व भंडारों का भी आयोजन किया जाएगा।वैदिक पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 22 नवंबर को शाम छह बजकर सात मिनट पर शुरु होगी। इस तिथि का समापन 23 नवंबर को शाम सात बजकर 56 मिनट पर होगा। काल भैरव देव की पूजा निशा काल में होती है। इसलिए भैरव जयंती के दिन 22 नवंबर को कालाष्टमी मनाई जाएगी। इस दिन मासिक कृष्ण जन्माष्टमी भी मनाई जाएगी।

 इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। भगवान शिव के उग्र अवतार यानी भैरव बाबा का ध्यान करें। सूर्य देव को अर्घ्य दें। पूजा कक्ष की सफाई अच्छी तरह से करें। भगवान काल भैरव की एक प्रतिमा स्थापित करें। उन्हें चंदन का तिलक लगाएं। फूल-माला अर्पित करें। मीठी रोटी और हलवे का भोग लगाएं। कालभैरव अष्टकम और मंत्रों का पाठ करें। आरती से पूजा को पूरी करें। शंखनाद करें। भगवान कालभैरव का आशीर्वाद लें। शाम को भी विधिपूर्वक काल भैरव जी की पूजा करें।मंदिर जाएं और चौमुखी दीपक जलाएं। गरीबों को भोजन खिलाएं। तामसिक चीजों से परहेज करें। कुत्तों को मीठी रोटी खिलाएं। ऐसा करने से भैरव बाबा की कृपा प्राप्त होगी।काल भैरव का पूजन मंत्र इस प्रकार है-

ॐ काल भैरवाय नमः।।
ॐ हं षंनंगं कंसं खं महाकाल      
भैरवाय नमः ।।
ॐ ह्रीं बं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय हीं।।

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