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राजकपूर : जाने कहां गए वो दिन…. 

-हिंदी फिल्मों के महान शो-मैन राज कपूर के जन्मशती वर्ष के अवसर पर-

आज जबकि यह महान हस्ती हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी यादें तो हमारे दिलों में हरदम साथ रहती हैं। शतकाधिक उम्र की और बढ़ते भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े शो-मैन स्व. राजकपूर को “दादा साहब फालके” पुरस्कार तो मिलना ही था, या यह कह सकते हैं कि यह पुरस्कार ही उनके लिये निश्चित किया गया था। क्योंकि भारतीय सिनेमा को दिया उनका अड़तालिस साला योगदान निर्णायकों को बेहिचक पुरस्कार देने के लिये निर्णित करता था। वैसे भी राजकपूर ने  “आग” के बाद कई हर दृष्टिकोण से सफल फिल्में बनाई।”आवारा”, “बरसात”, “श्री चार सौ बीस” जिस देश में गंगा बहती है, “बाबी”, “प्रेमरोग”, “राम तेरी गंगा मैली”, जैसी सुपरहिट फिल्म एवं दिल्ली अब दूर नहीं, “जागते रहो”, “मेरा नाम जोकर”, “सत्यम शिवम सुंदरम्”, “बीबी ओ बीबी”, जैसी फिल्म भी बनाई जो व्यावसायिक दृष्टि से कम सफल रहीं।

  राजकपूर सपनों के सौदागर थे। वे अपनी फिल्म के एक-एक फ्रेम को किसी उन्मादी कलाकार की तरह तराशकर सैल्यूलाइड स्क्रीन के जरिये दर्शकों को दिन में भी सपनों की सैर करा देना ही  उनका ध्येय व सफलता, रही है। इनकी फिल्मों में दर्शकों को वह सब कुछ मिला जो वह अपनी ऊबी हुई जिन्द‌गी में पलायन की भावना आने पर फिर वापस जिन्दगी की तरफ लौटने के बीच रहता है। अड़तालिस साल के अपने फिल्मी सफर में तरह-तरह के सपने राजकपूर ने बेचे हैं। दर्शकों ने भी इन सपनों को हाथों-हाथ लिया।

    दर्शकों की जेब से पैसे निकलवाना राजकपूर की खूबी रही है। यही कारण था कि वे फिल्मी दुनिया में हमेशा “शो-मैन” के नाम से मशहूर रहे। सौदर्य फिल्मांकन दिल को छू लेने वाला संगीत और फिल्म की हर एक फ्रेम वैभवशाली होना राजकपूर की फिल्मों की विशेषता रही है। मेरा नाम जोकर तक स्व. राजकपूर ने स्वयं अभिनय किया जिसमे अपनी नीली आंखों से सिनेमा के पर्दे पर जहां दर्द बिखेरा, वहीं मासूम शरारतें भी बिखेरी।

 मेरा नाम जोकर राजकपूर की सबसे महत्वाकांक्षी फिल्म थी। अधिकतर का ऐसा मानना है कि राजकपूर ने इस फिल्म के लिये जितना कुछ किया उतना तो शायद उन्होंने और किसी फिल्म के लिये नहीं किया। लेकिन अफसोस उनका सपना चूर-चूर हो गया। इस फिल्म की असफलता ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया कि गलती कहां हुई? कैसे हुई? इन प्रश्नों की गुत्थी सुलझाने में राजकपूर ताजिन्दगी सफल नहीं हो पाये थे। हालांकि 17 साल के बाद कसे हुए संपादन के बाद यही फिल्म दोबारा रिलीज हुई तो अपेक्षाकृत पूर्व के काफी चली थी, लेकिन सत्तरह साल पहले जब यह फिल्म जिस तरह से बाक्स आफिस पर ध्वस्त हुई थी। वह उन्हें हमेशा ही सालता रहा। 

     “मेरा नाम जोकर”एक ऐसे जोकर की कहानी थी, जिसका दिल इतना बड़ा है कि वह सारी दुनियां को इसमें समा लेना चाहता है। लेकिन कोई उसके इस विशाल दिल में झांकना नहीं चाहता, जो झांकना भी चाहते है वह उस दिल में मेहमान नहीं बनना चाहते, अपनाना नहीं चाहते, मैरी, मेरीना और मीना तीनों जोकर राजू के दिल में महज कुछ पल के लिये झांकते हैं। मगर कतराकर निकल जाते हैं। 

         मेरी जिसने राजू को मुहब्बत का सबक सिखाया, मैरीना, जिसने राजू की मुहब्बत को जुबान दी, मीना जिसे राजू ने सड़क से उठाकर महलों तक पहुंचाया और अपनाना चाहा। मेरी, मैरीना और ‘मीना जोकर राजू के दिल को नहीं समझ पाईं।हसंनेश्र -खेलने का समान समझकर राजू के दिल के साथ दिल्लगी करती रहीं और अपने-अपने हमराही के हाथ थामकर चल दीं। फिल्म का आखिरी दृश्य है जोकर राजू अपना आखिरी शो पेश कर रहा है। और उसने अपने जीवन को एक खास मायने देने वाली अपनी तीनों हमदर्द महिला मेरी, मैरीना, मीना को बुलाया है। उसके दिल का आपरेशन का दृश्य है। आपरेशन के बाद राजू का दिल निकालते दिखाया जाता है। और वह भी इतना बड़ा दिल की दुनिया भी उनके आगे बौनी लगती है।

राजू अपने दोनों हाथ पसारे पूछ रहा है। “मेरा दिल खो गया है किसने चुरा लिया है उस? किसके पास है? मैरी, मैरीना, मीना इन तीनों के आंखों में आंसू भरे दिखते हैं, क्योंकि तीनों ही राजू से प्यार करती है। लेकिन वह प्यार नहीं जो राजू चाहता था। और फिल्म के आखिरी में राजू का दिल कई टुकड़ों में बिखर जाता दिखाया जाता है। जिसके हर टुकड़े में मैरी, मैरीना, मीना की तस्वीरे दिखती है। राजू कहता है कि जोकर का तमाशा अभी खत्म नहीं हुआ। यह तो सिर्फ इंटरवल है जो पन्द्रह मिनट का भी हो सकता है और पंद्रह महिने का भी हो सकता है। और पन्द्रह महिने का भी। 

 यह अति महत्वपूर्ण सपना जो राजकपूर ने देखा था धाराशायी हुआ तो यह इंटरवल ही इस विशाल फिल्म का खुद-ब-खुद अघोषित अंत साबित हो गया। अगर इस सपने को दर्शक थोड़ा भी प्यार देते, थोड़ा भी राजकपूर को सांत्वना देते सहलाते तो निश्चित ही पक्का था कि राजकपूर जोकर का दूसरा भाग लेकर जरुर ही उपस्थित होते और दर्शकों को फिर जोकर राजकपूर के बाकी बचे सपने देखने को मिलते ।

अब तो खैर आहें ही निकल सकती है। उनके चले जाने के बाद तो  फिल्म दुनिया में एक रिक्तता सी आ गई ।यह एहसास हमेशा सालता रहेगा क्योंकि राजकपूर एक ऐसी हस्ती रही जिसकी भरपाई तो दूर उसकी छाया की भरपाई भी नहीं किया जा सकता है। 

 इस महान हस्ती ने जाने के बाद भी अपना प्यार उडे़लने का काम नहीं छोड़ा था। “हिना” जो पूरी की पूरी उनकी ही फिल्म थी यहां तक कि पूरी फिल्म को हर पहलू को वे गढ़ गये थे।  जिसे उनके अनुरुप उनके ज्येष्ठ पुत्र रणधीर कपूर ने “जैसा बाप वैसा बेटा” की तर्ज पर पूरा कर उनके दिल को उनकी आत्मा की शांति पहुंचाई। फिर भी फिल्मी दुनिया एवं दर्शकों को उनकी कमी का एहसास तो हमेशा कांटे की तरह चुभता रहेगा, उनके इस दुनिया में न होने का गम तो सालता ही रहेगा, इसी गमगीन वातावरण में गर यह गीत स्वमेव ही फूट पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। 

जाने कहाँ गये वो दिन,
कहते थे तेरी राह में,
नजरों को हम झुकाएँगे…। 

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
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