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रस-रंग-भंग-व्यंग्य

चले थे मनाने…..”होली”

किस्सा कुछ पुराना है। कुछ सालों पूर्व की घटना है। होली का त्योहार आने वाला था मेरा मित्र प्रदीप उपाध्याय जो पेण्ड्रा तहसील में जटगा-पसान के रास्ते के मध्य में पड़ने वाला एक छोटा सा गांव है बांधापारा, जो घनघोर जगलों (फिलहाल तो जितने जंगल बचे हैं उनमें तो यहां के जंगल अभी भी सुरक्षित बचे हुए हैं। ) के बीच मात्र बीस तीस घरों का छोटा सा गांव है।

वहीं वह प्राध्यापक के पद पर पदस्थ था। एक दो दिनों के लिये उसका बिलासपुर प्रवास प्रायः होता रहता था, तभी मुलाकात के दौरान उसने कहा था कि “यार तुम एक बार होली बांधापारा में मना के देखो मजा आ जायेगा। शहर की होली मनाते तो जी ऊब गया होगा।” उसके बांधापारा चलने के लिए जोर देने पर मैंने भी विचार किया कि शहर की होली देखते देखते तो जमाना बीत गया है, क्यों न एक बार जंगल में होली मनायी जाय कुछ चेंज भी आयेगा, नये अनुभव भी होंगे । 

वैसे भी मैं जंगलों-पहाड़ों में घूमने का अत्याधिक शौकीन रहा हूं,सो “जंगल में मंगल” का आनंद लेने वहां की स्वच्छ हवा, सुरम्य और सर्वत्र छाई हरियाली और ऐसे मनभावन वातावरण में इतना सुकून शायद पृथ्वी पर अन्यत्र कहीं नहीं मिलता होगा मैं मन ही मन मनाए जाने वाले रोमांच भरे होली की कल्पना से ही खुश होकर उसे होली में बांधापारा आने का वादा कर दिया।

अपने वादे के अनुसार मैं होली के एक दिन पूर्व घर से निकल पड़ा बस से बांधापारा के लिए। दोपहर होते होते मैं वहां पहुँच गया। बस से उतरा तो वहाँ का वैसा ही नजारा पाया जैसा प्रदीप ने बताया था देखकर तो मन प्रफुल्लत ही हो उठा। चारों तरफ हरियाली और घनेरा पहाड़ी जंगल सचमुच स्वार्गिक दृश्य था। धीरे धीरे मैं चलता हुआ जब प्रदीप के घर पहुंचा तो देखता क्या हूं कि घर में ताला लगा है,एक आदमी दूर से भागकर आता नजर आया।

उसने पास आकर पूछा कि क्या मैं बिलासपुर से आ रहा हूं तब मेरे हां कहने पर उसने बताया कि मास्टर साहब पत्नी सहित कटघोरा गये हैं कल आयेंगे।आगे उसने बताया कि उन्होंने कहा था कि बिलासपुर से मेरे दोस्त आने वाले हैं तुम सब इंतजाम कर देना। खैर इतना सुनकर तो कुछ ढाढस बंघा कि चलो बेवकूफ( मेरा दोस्त )कल तो आ ही जायेगा नहीं तो होली के नये अनुभव के चक्कर में अकेले बियाबान में काटना पड़ जाता। 

मेरा दोस्त भी आखिरकार देर रात तक बांधापारा में कटघोरा से वापस पहुंच गया, उसे देखकर जान में जान आई उसने बताया कि बहुत जरूरी काम आ जाने के कारण अचानक कटघोरा जाना पड़ गया। रात को फिर हम दोनों गपशप मारते हुए खा पीकर हम सब सोने चले गए।

आखिर वह बहु प्रतिक्षित होली की सुबह आ पहुंची। उस दिन घटनाएं कुछ ऐसी घटी के आप ही लोग बताइए क्या कहा जाए अपनी आपबीती को….? घटना कुछ इस प्रकार है उस दिन सुबह से ही मैंने देखा कि प्रदीप भाई साहब भांग का शर्बत बाल्टी भर तैयार करवा रहे हैं, तरह तरह के पकवान भी बनवा रहे थे तब मैंने कहा था कि भांग इत्यादि मैं पसन्द नहीं करता हूँ, होली का त्योहार रगों का त्योहार है रंग गुलाल खेलते हैं, जगलों की सैर करते हैं।

यहाँ के लोगों से मिलेंगे उनकी भी होली देखेंगे साथ में खेलेंगे लेकिन उन लोगो में किसी ने भी मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया। अब हो यह रहा था कि रंग गुलाल के साथ होली खेलना तो दूर रहा, यह लोग सभी सुबह से ही आने वाले लोगों के साथ भांग के शर्बत पीने का दौर पे दौर चलाने लगे। ये दौर ऐसा चला कि कुछ ही देर में सभी घर के लोग (केवल मुझे छोड़कर) नशे में चूर यदा कदा पड़ कर यहाँ वहाँ पड़ गए और गहरी नींद में खर्राटें लेने लग गये थे।

 मेरा तो मारे गुस्से के दिमाग खराब हो गया, इन लोगों को इस हालत में देखकर।होश में आयेंगे तो मजा चखाउगा।क्या क्या सोचकर यहाँ आया था एक अलग माहौल में होली मनाने का आनंद कुछ और आयेगा.. मगर क्या करें अकेले ही उस जंगली गाँव में रहना पड़ रहा था। उस पल को कोसते हुए कि मैंने क्यों यहां होली मनाने का निर्णय लिया था, आखिरकार कुछ रंग गुलाल लेकर ये लोग न सही कम से कम गाँव के लोगों के साथ तो होली खेला जा सकता है, ये विचार आते ही मैं घर से निकल पड़ा। 

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