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प्राइवेट स्कूलों की मनमानी, स्टूडेंट पेरेंट्स की बढ़ती परेशानी

बिलासपुर: न्यायधानी में प्राइवेट स्कूलों की संख्या लगभग एक सौ से अधिक है। यह संख्या समय-समय पर बदलती रहती है, क्योंकि नए स्कूल खुलते रहते हैं और पुराने स्कूल बंद हो जाते हैं। शिक्षा सभी के लिए जरूरी है। अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए पैरेंट्स कई तरह के जतन करते हैं। अपने बच्चों की बेहत शिक्षा के लिए निजी स्कूलों का सहारा लेते हैं। छत्तीसगढ़ में निजी स्कूल की मनमानी ऐसी की स्कूल फीस से लेकर कॉपी, किताब और स्कूल ड्रेस में भी कमीशन लेने की शिकायतें हमेशा आती रही हैं। अभिभावक सबसे ज्यादा मनमर्जी फीस की बढ़ोतरी को लेकर परेशान रहते हैं।प्रदेश के निजी स्कूलों की मनमानी साफ तौर पर देखी जा सकती है। कई स्कूलों में 20 से 25 प्रतिशत तक फीस को बढ़ाया गया है। शासकीय स्कूलों से लोंगो का मोहभंग हो रहा है तो निजी स्कूल संचालक जमकर फीस वसूल रहे हैं।

फीस वृद्धि और शिकायतें

अभिभावकों ने फीस में मनमाने ढंग से वृद्धि करने की शिकायत की है। सभी निजी स्कूल प्रत्येक वर्ष स्कूल इस वृद्धि में मनमानी ढंग से वृद्धि कर देते हैं जिससे मध्यवर्गीय पालकों को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। निजी स्कूलों द्वारा शिक्षा के नियमों का पालन न करने और मनमानी करने की शिकायतें भी सामने आई हैं। 

यू डाइस में जानकारी

कुछ मामलों में, निजी स्कूलों ने यू डाइस  में जानकारी उपलब्ध कराने में देरी की, जिससे काम प्रभावित हुआ। कुछ मामलों में, स्कूल संचालकों को यू डाइस में जानकारी उपलब्ध न कराने पर उनकी मान्यता रद्द करने की चेतावनी दी गई थी। 

अभिभावकों का आंदोलन

निजी स्कूलों की मनमानी के खिलाफ अभिभावकों ने आंदोलन भी किए हैं और चुनाव बहिष्कार की चेतावनी भी दी है। चार दिन के बाद फिर वही ढाक के तीन पात और निजी स्कूल प्रबंधन पुनः अपने मनमानी पर उतर आते हैं। पालकगण हद से ज्यादा इन निजी स्कूलों के मनमाने रवैया से परेशान हो चुके हैं। 

कलेक्टर और डीईओ को शिकायतें

अभिभावकों ने निजी स्कूलों की मनमानी के खिलाफ डीईओ और कलेक्टर से शिकायतें की हैं। न्यायधानी में ही गत वर्ष पालकों द्वारा निजी स्कूल प्रबंधन के मनमाने रवैया के खिलाफ एकजुट होकर काफी लंबा और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया गया था। कलेक्टर कार्यालय में घेराव , जिला शिक्षा अधिकारी का विरोध करते हुए पालकों ने सशक्त अभियान छेड़ा था, लेकिन कोई परिणाम नहीं मिल पाया। 

बदहाल सरकारी स्कूल

निजी स्कूलों की मनमानी न रुक पाने का सबसे पहला कारण है सरकारी स्कूलों की अव्यवस्था। सरकारी स्कूलों की अराजकता से मजबूर होकर अभिभावक अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भर्ती कराते हैं। अभिभावकों का एकजुट होकर विरोध न करने की प्रवृत्ति एवं अन्याय के प्रति उदासीनता के कारण भी निजी स्कूलों की मनमानी बढ़ रही है।

राजनीतिक प्रभाव का असर

निजी स्कूल ज्यादातर सत्तारूढ़ दल के नेताओं या उनके रिश्तेदारों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। वे अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल मनमानी फीस वसूलने एवं नए-नए नियम लागू करने के लिए करते हैं। सरकारी तंत्र उन पर प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पाता है। यही कारण है कि उनके अनुचित व्यवहार पर रोक नहीं लग पाती है।

मान लिया सफलता का पैमाना

लोगों ने अंग्रेजी स्कूलों को ही सफलता का पैमाना मानलिया है। इसलिए निजी स्कूलों को प्राथमिकता दी जा रही है। इसके साथ ही सरकारी स्कूलों के घटते स्तर के कारण निजी स्कूलों में बच्चों की भीड़ बढ़ी है।

कमजोर निगरानी तंत्र

निजी स्कूलों की मनमानी नहीं रुकने का मुख्य कारण शिक्षा क्षेत्र में नियमन और निगरानी की कमी है। शिक्षा का व्यावसायीकरण बढने से निजी स्कूल मनमाने ढंग से फीस बढ़ाते हैं और अनावश्यक शुल्क वसूलते हैं। सरकारी नियमों के बावजूद, इन पर सख्ती से अमल नहीं होता। अभिभावकों के पास सीमित विकल्प हैं। कानूनी जागरूकता की कमी भी एक कारण है। सरकार को सख्त नियम लागू कर, शिकायत निवारण प्रणाली सुदृढ़ करनी चाहिए। सरकारी स्कूलों की स्थिति ठीक हो जाए तो निजी स्कूलों का आकर्षण भी कम हो जाएगा।

सरकार की अनदेखी

निजी स्कूल सरकारी नियम-कानूनों का ध्यान नहीं रखते। वे मनमाने ढंग से चलते हुए फीस वसूली में भी मनमानी करते हं। सरकारी लापरवाही व अनदेखी साथ ही संसाधनों का अभाव होने से सरकारी स्कूल बदहाल हैं और निजी स्कूल पनप रहे हैं। बिलासपुर में प्राइवेट स्कूलों में अंकुश जरूरी है, क्योंकि कई प्राइवेट स्कूलों में मनमानी और लूट खसोट की शिकायतें मिलती रहती हैं। इन स्कूलों में फीस की दरें बहुत अधिक होती हैं और कई बार स्कूल प्रशासन द्वारा अभिभावकों पर अनावश्यक दबाव डाला जाता है।

निजी स्कूलों पर प्रभावी अंकुश जरूरी

अंकुश के जरिए इन स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है और अभिभावकों को अनावश्यक दबाव से मुक्ति मिल सकती है। इसके अलावा, अंकुश के जरिए स्कूलों में पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ाई जा सकती है।कुछ महत्वपूर्ण बिंदु जिन पर अंकुश की आवश्यकता है। 1. फीस की  बढ़ती दरों पर नियंत्रण 2. शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार 3. कार्य प्रणाली में पारदर्शिता 4. स्कूल प्रबंधन की तय जवाबदेही। नगर में 101 निजी स्कूलों में 30415 छात्र छात्राएं हैं, लेकिन स्कूलों में शिक्षा के अधिकार के नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित हो रहे है। इसके अतिरिक्त भी कई विद्यालय हैं, जिन्होंने अपना रजिस्ट्रेशन नहीं करवाया है। इसके कई नियमों का पालन निजी स्कूलों द्वारा नहीं किया जा रहा है। इसके साथ ही शिक्षा विभाग के अधिकारी भी शिक्षा के अधिकारी अधिनियम के प्रति ज्यादा गंभीर नहीं है। जिससे बच्चों को इस अधिकार का फायदा नहीं मिल पा रहा है। फीस निर्धारण के मामले में कई निजी स्कूलों ने तोड़ निकाल लिया है। 

शिक्षा के अधिकार क्या है नियम 

शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत हर स्कूल में 25 प्रतिशत तक बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने का प्रावधान है। जिसकी फीस का भुगतान सरकार द्वारा किया जाता है। जहां सरकारी विद्यालयों में बच्चों से फीस नहीं ली जाती है। वहीं निजी विद्यालयों में भी हर कक्षा में विद्यार्थियों के अनुपात में 25 प्रतिशत विद्यार्थियों का भुगतान शिक्षा विभाग द्वारा किया जाता है। इसके साथ ही शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत निजी विद्यालयों पर कई नियम भी लागू होते है। जिसमें निजी विद्यालयों की फीस का निर्धारण, प्रशिक्षण धारी शिक्षकों द्वारा शिक्षण कार्य व निजी स्कूलों में इस अधिनियम के तहत बच्चों को अन्य सुविधाएं प्रदान करना है।

नई स्कूलों की फीस का निर्धारण नहीं

हाल ही कुछ सालों में जिन स्कूलों द्वारा मान्यता ली गई या लेना बाकि है, शिक्षा विभाग द्वारा अभी तक उन स्कूलों की फीस का निर्धारण नहीं किया गया है। जिससे वे स्कूल अपने मनमाने रूप से पैसे वसूलने का काम कर रहे है। अभिभावकों द्वारा शिक्षा विभाग में इस बारे में शिकायत भी की जाती है तो अधिकारियों द्वारा इन स्कूलों के फीस निर्धारण कमेटी द्वारा फीस निर्धारित करने की बात कहकर टाला जा रहा है।

बिना मान्यता चल रहे हैं कई निजी स्कूल

आरटीई अधिनियम के लागू होने के बाद कहीं भी निजी स्कूल बिना मान्यता के संचालित नहीं हो सकते। लेकिन लातेहार में कई जगहों पर बिना मान्यता के स्कूलों का संचालन हो रहा है। स्कूल संचालकों द्वारा यह रास्ता निकाला गया है, जिसमें प्ले स्कूल को मान्यता लेने की जरूरत नहीं है। ऐसे में इन स्कूल संचालकों द्वारा प्ले स्कूल के नाम पर 8वीं तक स्कूलों का संचालन किया जा रहा है। जिससे आरटीई के नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही है। शिक्षा विभाग द्वारा हर साल सभी स्कूलों से यू-डाईस भरवाई जाती है। लेकिन नई मान्यता लेने वाले निजी स्कूल यू-डाईस भी नहीं भर रहे है।

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