NEW English Version

समाधान की ओर पहला कदम: जन-भागीदारी से ही बदलेगी तस्वीर

-7 अप्रैल विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर-

भारत में आबादी के मुकाबले स्वास्थ्य सेवाओ की बहुत कमी है, स्वास्थ्य सेवांओ से यह तात्पर्य नहीं है कि केवल डाक्टरों की सुविधा ही, बल्कि डाक्टरों के आने वाली उन कई सहायक सेवाओं से है, जिसकी मदद से डाक्टर इलाज कर पाते हैं। वहीँ चिकित्सा क्षेत्र में विकसित एवं विकासशील देश अरबों रुपए शोध कार्य पर खर्च कर रहे हैं। पर दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि जिन बीमारियों के लिए नयी-नयी दवाईयां खोजी जा रही हैं वे अमीरों की बीमारियां हैं, दिल संबंधी बीमारी, उच्च रक्त चाप, कैंसर, लिवर, किडनी प्रत्यारोपण और, सबसे बड़ी अमीरों की बीमारी है एड्स,। हर साल भारत सहित एशियाई देशों और अफ्रीका में लाखो व्यक्ति मलेरिया, कुपोषण, डायरिया, हैजा, डिहाईड्रेशन और टीकों एवं दवा के अभाव में दम तोड़ देते हैं, और इधर चिकित्सा विज्ञान प्लास्टिक सर्जरी के शोध करने में जुटा हुआ है। यहां यह भी गौर करने की बात है कि जिस तरह से कोरोना नामक महामारी 2019 में आई और लगभग 2024 में चली भी गई। इस‌ अनपेक्षित महामारी ने करोड़ों की संख्या में लोगों की जान ली थी। 

स्वास्थ्य की महत्ता वर्षों पूर्व नेपोलियन बोनापार्ट ने समझकर ही यह कहा था कि “अगर मुझे स्वस्थ्य माएं मिले तो मैं एक सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण कर सकता हूं।” नेपोलियन की यह उक्ति आज भी प्रासंगिक है। किसी भी राष्ट्र के सुदृढ़ निर्माण में स्वस्थ्य मांएं और सुसंस्कृत महिलाओ की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि वे ही तो आने वाली स्वस्थ्य पीढ़ी की जन्मदात्री हैं। संभवतः इसी सत्य को स्वीकार करते हुए  भारत सहित प्रदेशों की सरकारों ने अपने वृहद स्वास्थ्य कार्यक्रम को क्रियान्वित किया है जिसके केंद्र में महिलाओं एवं बच्चों को रखा गया है, प्रदेशों की स्वास्थ्य क्षेत्र में देखा जाए तो पिछले वर्षों में कोई उल्लखनीय प्रगति नही हो पाई है। जैसे अविभाजित मध्यप्रदेश क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे बड़े राज्यों में है। 1991 की जनगणना के अनुसार यहां की कुल लगभग जनसंख्या 66135862 व्यक्ति मानी जाती है। लेकिन राज्य स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवाओं की दृष्टि से अभी भी देश के अनेक राज्यों से काफी पिछड़ा है।

स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं की दृष्टि से मध्यप्रदेश राज्य के पीछे रह जाने के कारणों में यहां साक्षरता ,शिक्षा की कमी, आर्थिक पिछड़ापन, परिवहन के साधनों की न्यूनता और जनसंख्या में जनजाति संख्या का बाहुल्य है। 1981 के आंकड़ों के अनुसार राज्य में साक्षरता का प्रतिशत 27.87 था, जो देश के साक्षरता प्रतिशत से काफी कम है। गैर शिक्षित लोग अंधविश्वासी और जादू टोनों से बड़ी बड़ी बीमारियों का उपचार करते हैं। इससे स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पर्याप्त मात्रा में धन नहीं जुट सका है। परिवहन की अपर्याप्त सुविधा के कारण मध्यप्रदेश में पर्याप्त संख्या में स्वास्थ्य केंद्र चिकित्सालय और औषधालय नहीं खुल सके हैं। राज्य की जनसंसवा में लगभग 22.97 प्रतिशत भाग अनुसूचित जन जातियों का है जो दुर्गम घने वनों और पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती है। इन क्षेत्रों में सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं के विकास में अत्यंत कठिनाई का सामना करना पड़ता है। जनजाति के लोग सभ्य लोगों से मिलना जुलना पसंद नहीं करते हैं। वे अपना इलाज झाड़फूंक और जादू टोनों से करते है। अतः ऐसी स्थिति में यहां स्वास्थ्य सेवाओं का विकास अवरुद्ध रहा, फलतः मध्यप्रदेश देश के अन्य राज्यों की तुलना में स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं में काफी पीछे रह गया। 

 क्या आपको पता है कि सारी दुनिया में रोज पचास हजार से ज्यादा बच्चे मौत के मुंह में जा रहे हैं। वजह अतिसार, निमोनिया, पानी की कमी, कुपोषण जैसी साधारण बीमारियां हैं। सारी दुनिया में हथियारों और फौज के खरचो के हिसाब को देखे तो पता चलेगा कि कई सौ करोड़ डालर रोज खर्च किए जा रहे हैं। हर दिन खर्च होने वाले ये करोड़ों डालर सिर्फ इसलिए कि हमारी दुनिया सुरक्षित रह सके। इसके दूसरी तरफ जिन लोगों के लिए इस दुनिया को बचाया जा रहा है, उनकी बेसमय मौत रोकने के लिए होने वाले खर्च फौजी खर्च के पासंग भी नहीं है। भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में हर वर्ष करीब बीस लाख शिशु अपना पहला जन्मदिन देखे बगैर मौत का ग्रास बन जाते हैं। क्या कारण है कि हमारे पास काफी हंद तक असमय मौत रोकने के चिकित्सकीय सुविधाओं के होने के बावजूद भी हम इन्हें रोकने में नाकामयाब हो रहे हैं। कारण है सामाजिक जागरुकता का अभाव। दरअसल समस्या ,कही यह है कि स्वास्थ्य को बीमारी से जोड़कर देखा जाता है तो कहीं बीमारी की गैर मौजूदगी स्वास्थ्य का लक्षण समझा जाता है, जबकि ऐसा नहीं है। 

एक स्वस्थ्य व्यक्ति का अर्थ मानसिक, शरीरिक, नैतिक रूप से उसका अपने वातावरण से सही संबंध होना है। स्वास्थ्य की इस पूरी परिभाषा की अनुपस्थिति बहुत सी समस्याओं को जन्म देती है।   भारतीय संदभों में अपने भविष्य की सुरक्षा की जब हम बात करते हैं तो हमे स्वास्थ्य की इस परिभाषा और उसके सामजिक संदभों को केंद्र में रखना होगा। अपने मौजूदा हालात में तथ्यों को सिलसिलेवार देखें तो वे कुछ इस तरह से होंगे। भारत में रोज होने वाली मौतों का कारण है प्रमुख कुछ बीमारियां 1 गलघोंटू  2 काली खांसी 3 टेटनस 4 तपेदिक (टीबी) 5 पोलियो 6 खसरा (मीजल्स)।

इन सभी रोगों से बचपन में टीकाकरण द्वारा बचाव हो सकता है। इन तथ्यों की रौशनी में एक बार फिर यदि बच्चों के भविष्य को देख तो तस्वीर उतनी स्याह नही रहती। यदि देश के बच्चों को टीके की सुविधा सामान्य रुप से मिलने लगे तो इससे बच्ची की मृत्युदर में कमी होगी। मृत्यु दर में कमी का अर्थ है कि माता पिता में बच्चों के भविष्य के प्रति विश्वास जागेगा और जन्मदर घटेगी, जन्मदर घटने के साथ वे बहुत सी बुनियादी सुविधाएं लोगों को मुहैया होने लगेगी जो अब तक उपलब्ध नहीं हैं। 

यह बातें जितनी संभव लगते हैं उतनी है नहीं एक वैज्ञानिक सत्य है की तरक्की का एक सीधा असर यह होता है की जनसंख्या पर अपने आप नियंत्रण हो जाता है। इसे वैज्ञानिक डेमोग्राफिक ट्रांजिशन कहते हैं। यदि टीकाकरण और सामान्य स्वस्थ लोगों तक पहुंचाने की कोशिश में यदि इस डेमोग्राफिक ट्रांजिशन की स्थिति में पहुंचते हैं तो एक बड़ा कदम होगा। सर्दी के अंत तक सबके लिए स्वास्थ्य की मुहीम हमारे देश में चलाई जा रही है। इसका पहला‌ मोर्चा टीकाकरण टीकाकरण ही है। इस मोर्चे पर पिछले दिनों काफी कार्य हुआ है। विभिन्न इलाकों में सत्तर से नब्बे प्रतिशत के बीच टीकाकरण होने लगा है। राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान जो 1978 में प्रारंभ किया गया था आज तक की स्थिति तक आते-आते खासा काम कर चुका है। टीकाकरण और इस तरह के दूसरे अभियानों में जो दिक्कतें आती है वह सामाजिक अधिक होती हैं।

हमारे देश में स्वास्थ्य और बीमारी जैसी बातें व्यक्तिगत या पारिवारिक समस्याएं समझी जाती है। सारी वैज्ञानिक समझ के बाद यदि लोगों का सोचने का रवैया नहीं बदलता तो सफलता संदिग्ध हो जाती है। जरूरत इस बात की है कि टीकाकरण जैसी बातों के हर पहलू पर गांव देहात तक के स्तर पर चर्चा हो। सारे देश में जानकारी का ऐसा वातावरण बने जो लोगों के सीखने के तरीकों में बदलाव लाए। 

दूसरी विडम्बना भी हमारे देश में मौजूत है। प्रायः यह देखते हैं कि हमारे देश में अमीरों के लिए बड़े बड़े अस्पताल हैं। छोटे छोटे शहरों में भी-  प्राइवेट क्लीनिक और नर्सिंग होम खुले हुए हैं। इनमें चिकित्सा की आधुनिकतम सुविधाएं रहती है, साफ सफाई और सेवा सुश्रुषा पर ध्यान दिया जाता है। नर्सिंग होम या अस्पताल में आपरेशन, डीलिवरी, या इलाज इतनी मंहगी होती है कि गरीबों की चादर छोटी पड़ जाती है। जिनके पास पैसे नहीं है, उनकी बीमारियों का इलाज आज भी सरकारी दवाखानों में मुफ्त बंटने वाली लाल और पीली गोलियों से होता है। सरकारी हास्पिटल के जनरल वार्ड एक तरह से धनहीन लोगो के लिए आरक्षित रहते हैं। वहां इतनी गंदगी लापरवाही और धांधली रहती है कि स्वस्थ आदमी भी बीमार पड़ जाए। पर लाचार गरीब आदमी कर ही क्या सकता है। दवाएं और मंहगी होती जा रही हैं।

टीबी, टायफाइड, चर्मरोग, कालरा, हैजा आंत्रशोथ जैसी छोटेआदमी की बीमारियों का इलाज खर्चीला हो गया है। और हैरत इस बात पर होती है कि चिकित्सा वैज्ञानिक अपनी तरक्की की दुन्दुभि बजा रहे हैं। आम आदमी‌ सर्दी खांसी में दूध में हल्दी पीता है, पेट दर्द में हींग, फोड़े फुंसी के लिए लिए अंकोर का गरम पत्ता, चोट के लिए कत्था चुना या हल्दी प्याज इस्तेमाल करने वाला गरीब तबका मंहगाई के चलते और क्या कर सकता है। यह है हमारी तरक्की का असली खाका, जो चिकित्सा विज्ञान के दावों को खोखला और कागजी साबित करता है। बहुत बार बड़ी समस्या लगने वाली बातों का निदान एक छोटे कदम की शुरुआत से हो जाती है। एक चीनी कहावत है कि “हजारों मील के सफर की शुरुआत एक छोटे कदम से होती है।” अतः इस समस्या से निजात पाने प्रत्येक व्यक्ति अपने छोटे कदमों से इस पहल के लिए शुरुआत करेगा इन्ही शुभाकांक्षाओं के साथ।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Translate »