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चौथे स्तंम्भ पत्रकारिता के आदर्श देवर्षि नारद

-13 मई देवर्षि नारद जयंती पर विशेष-

आज के अधुनातन जीवन में जबकि दुनिया के कुछ भागों में राजशाही शासन तो कहीं सैनिक या लोकतंत्र का शासन चल रहा है। वे सभी शासन तंत्र शक्ति केंद्रित रहते हैं। मीडिया अर्थात पत्रकारिता जगत ( संस्थान) एक सजग प्रहरी के समान शासन तंत्र की गलतियों या कमजोरियों पर सतत बड़ी सूक्ष्म नजर रखे रहते हैं। वे जरा सी भी गल्ती किए नहीं कि उनके कार्यों पर उंगली उठा देता है।    

पत्रकारिता जगत दुनिया की व्यवस्था के सुचारु रूप से चलते रहने के लिए पत्रकार दिनरात चौबीस घंटे कार्य करते हैं। ऊपरी तौर पर तो यह लगता है कि समाचारों को एकत्र कर लोगों तक पहुंचाने भर का कार्य हैं। पर नहीं इसका बहुत गहरा नाता रहा है व्यवस्था व शासन के सुसंचालन के लिए। यही तो सजग प्रहरी हैं जो शक्ति केंद्रित सत्ता व शासन को दिग्भ्रमित होने नहीं देते हमेशा सजग प्रहरी की भांति उसे सचिव व उनकी गलतियों से रूबरू अवगत कराते रहते हैं यही पत्रकारिता का आदर्श है और सही पत्रकारिता भी यही है। 

यह कार्य पुरातन व पौराणिक काल से देवर्षि नारद जी करते चले आ रहे हैं। वे अपना काम इतनी चाक चौबंद एवं कर्मठता से करते थे कि मजाल है कोई घटना घटी हो और वे उससे बेखबर रह गए हो। नारद ने हमेशा चल संचार केंद्र की भूमिका का निर्वहन किया, चाहे वह दैत्य, दानव, गंधर्व, किन्नर या फिर मानव के बीच का कार्य हो या समाचार। वे सभी बातों से बाखबर रहा करते थे। इसके लिए वे हमेशा हर पल सक्रिय रह कर कार्य करते। वे कभी एक जगह ठहर नहीं सकते थे। उनकी इसी सक्रियता और चपलता से डरकर एक बार भगवान शंकर ने उन्हें एक ऋषि के आश्रम को बड़ा ही मनोरम व मनमोहक बनाकर वहां रोके रखने का प्रयास किया था, जिसमें वे पूरी तरह से सफल नहीं हो पाए थे। नारद वहां कुछ दिन तो वास्तव में भूले रहे पर जल्द ही उन्हें भान हो गया कि उन्हें यहां कोई विशेष प्रयोजन से ही रोक रखा गया है। यह एहसास होते ही बस वह वहां से छूमंतर हो गए। और पुनः अपने जगप्रसिद्ध कार्य में लग गए। 

कहते हैं कि ना जहां रवि (सूर्य की किरणें) ना पहुंच सके वहां कवि  पहुंच सकता है। यह लोकोक्ति शायद नारद के क्रियाकलापों को देखकर ही किसी विद्धजन ने बनाई होगी। हालांकि देवर्षि को यह कहकर बदनाम किया जाता है कि वे हमेशा इधर की बात उधर और लड़ाने भिड़ाने की जुगत में लगे रहते थे। मगर यह गलत है। सच तो यह है कि उन्हें मालूम रहता था कि चाहे वह देव हो या दानव। जब भी वह अपने कर्तव्यपथ से हटकर कोई काम करने को उद्यत हुआ। ठीक वहीं उन्होंने उसके कार्यों से होने वाले संभावित अनर्थ को टालने के लिए और उसे ठीक करने की जुगत में भिड़ जाते। अर्थात लोक कल्याण की भावना ही नारद के समस्त कार्यों में निहित रहती थी। इतनी विशाल भावना को समझ न पाना नारद के प्रति अन्याय नहीं तो क्या है।

वर्तमान परिवेश में देखें तो हमें प्रायः रोजाना अखबारों में पढ़ने को मिल जाता है कि फलां पत्रकार पर गोली चला या किसी पत्रकार की गुंडों ने हत्या कर दी। कारण सिर्फ यह था कि उसने किसी धनिक सेठ या नेता के खिलाफ खबर लिख दी थी। कहने का मतलब एक पत्रकार “सर्वजन हिताय” जैसी सूक्ति को सामने रखकर ही अपने खबर को बनाता है। और उस समाचार को अपने अखबार में प्रकाशित करता है। मगर किसी व्यक्ति विशेष को वह बात अखर जाती है कि उसके शक्ति संपन्न होते हुए भी एक अदना सा पत्रकार उसका साम्राज्य छिन्न भिन्न करने में लगा है। बस इसी अभिमान के चलते वह अपनी तानाशाही हरकतों को अंजाम देता है। और समाज के एक सजग प्रहरी (पत्रकार) को हानि पहुंचाता है।

ठीक उसी प्रकार उस समय भी नारद को ऐसी ही बातों से दो चार होना पड़ा था, उनके भी प्राणों पर कई बार संकट आन पड़ता था। देव दानव तो क्या स्वयं शंकर भोलेनाथ भी उन पर एक अवसर पर कुपित होकर नारद की जान के पीछे पड़ गए थे। तब भगवान विष्णु और माता पार्वती देवी के उद्यम से ही उनके प्राण बच सके थे। देवर्षि नारद सृष्टिकता ब्रम्हा के पुत्र हैं। पर वे हमेशा विष्णु का ही नाम जपते रहते हैं। उनके श्रीमुख से हर पल नारायण नारायण (अर्थात विष्णु का नाम) श्री गुंजायमान होता रहता है। इस बात पर भी कुछ लोग रहस्य की अनुभूति रखते हैं।

पत्रकारिता के पितामाह और आदर्श देवर्षि नारद के संचार के महान कार्यों की वजह से ही दुनिया का सर्वनाश कई बार बचा है। दैत्यों की लगभग-लगभग जीत को भी उन्होंने अपने कार्यों के बल पर ही पराजय में बदलकर दुनिया में सुव्यवस्था को बचाए रखने में महति योगदान दिया है। अब के समय भी ठीक इसी प्रकार कितनी ही सरकारें बन जाती है, और कितनी सरकारें गिर जाती है। सिर्फ पत्रकारिता के कारण इसकी इतनी महत्ता को जानकर ही इसे लोकतंत्र का महत्वपूर्ण चौथा स्तंभ स्वीकार किया गया है। 

समाज के किसी भी वर्ग या व्यक्ति के साथ शासक वर्ग जरा भी – तानाशाही या ज्यादती किया नहीं कि पत्रकारिता जगत तुरंत सक्रिय हो उठता है और उसके विरोध में जनता के कान फूंकने का काम करने लगता है। बेखबर लोगों को हो रहे अन्याय के प्रति सचेत कर उन्हें उसका विरोध करने और उसे खिलाफ लड़ाई लड़ने की प्रेरणा देता है। बस यही शासक वर्ग को नागवार गुजरता है। और वह पत्रकारिता को फूटी आंख भी देखना गवारा नहीं करता। यही एक मात्र वजह थी कि देवर्षि नारद भी ऐसे ही लोगों द्वारा बदनाम किए जाते रहे कि वे अशांति फैलाते  हैं। चुगलचारी करते फिरते हैं।

कमोबेश आज भी वही स्थिति कुछ रद्दोबदल के साथ जस की तस कायम है। हां एक बात और जुड़ गई है कि अब पत्रकारिता के आड में व्यावयायिकता व स्वार्थलोलुपता ने भी अपना स्थान ले लिया है। स्वस्थ्य पत्रकारिता की बजाय पीत पत्रकारिता होने लगी है। लोक कल्याण की भावना छोड़कर चाटुकारिता और वर्ग विशेष के हित की पत्रकारिता ने अब इस कार्य को कलुषित कर दिया है। “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” के इस कार्य में रोजी रोटी की आस रखना बुरी बात नहीं है! पर बुरा तो तब होता है, जब हम इसकी परिभाषा को ही छलकपट से बदल कर रख देते हैं। आज के परिवेश में अब पत्रकारिता धन लोलूपता के मायाजाल में फंसकर अपनी दिशा से भटक गई है। अब पत्रकारिता शक्ति ही शक्तिमान और धनवान के पक्ष में की जा रही है जो की चौथे स्तंभ के गिरते मानदडों का परिचायक है। जिस प्रकार देश के आजादी के पूर्व पत्रकारिता एक मिशन होता था उसे मानदंडों के साथ अब पत्रकारिता को पुनर्जीवित करना है इसके लिए चौथे स्तंभ के सभी कर्णधारों को सजग और प्रयत्नशील होना होगा। पत्रकारिता में लगे हुए प्रत्येक कर्मठ व्यक्ति को देवर्षि नारद के पदचिन्हों पर चलकर एवं समाज व विश्व की निःस्वार्थ सेवा कर सकें ऐसा कार्य करना प्रारंभ कर देना होगा ईश्वर से प्रार्थना है कि वह पत्रकारिता जगत को इतनी शक्ति जरुर देवें।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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