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रक्षा में आत्मनिर्भरता के बढ़ते कदमों से बढ़ती सैन्य-ताकत

ऑपरेशन सिंदूर की शानदार कामयाबी, पाकिस्तान को करारी चोट पहुंचाने, विश्व को भारत की सैन्य ताकत दिखाने और अपने सैनिकों के अद्भुत पराक्रम के प्रदर्शन की गौरवपूर्ण स्थितियों के बीच एक बड़ी खुशखबरी है कि भारत सरकार ने पांचवीं पीढ़ी के स्वदेशी लड़ाकू विमान (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए) के प्रोडक्शन मॉडल को मंजूरी देते हुए इस परियोजना पर आगे बढ़ने को हरी झंडी दिखा दी है। निश्चित ही इस फैसले से दुनिया की महाशक्तियां चौंकी है, वहीं यह भारतवासियों के लिये एक नई आशा एवं संभावनाभरी खुशखबरी है। क्योंकि दुनिया की महाशक्ति बनने के लिये सैन्य साजो-सामान की दृष्टि से आत्म निर्भर होना प्रथम प्राथमिकता है। दुनिया पर वर्चस्व स्थापित करने का यह सबसे बड़ा आधार है कि हम सैन्य साजो सामान में स्वावलम्बी ही नहीं, निर्यातक बने।

क्योंकि उन्हें दूसरे देशों से खरीदने में विदेशी पूंजी का व्यय होने के साथ कई तरह के दबावों का भी सामना करना पड़ता है। दूसरे देश अपनी शर्तों पर ये हमें उपलब्ध कराते हैं, अर्थ का व्यय भी स्वदेशी उत्पादन की तुलना में बहुत ज्यादा करना पड़ता है। जबसे रक्षा सामग्री के निर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई गई है, तब से भारत का रक्षा निर्यात तेजी से बढ़ा है। रक्षा मंत्रालय के ताजा फैसले के बाद सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियों के शेयर जिस तरह उछले, उससे यही पता चलता है कि देश रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के लिए नई दिशाओं को उद्घाटित कर रहा है।

निश्चित ही पांचवीं पीढ़ी के उन्नत लड़ाकू विमानों का देश में ही निर्माण करने और उसमें निजी क्षेत्र का सहयोग लेने की रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की घोषणा एक ऐसा फैसला है, जो दूरगामी एवं देशहित का सराहनीय कदम है। ऐसे फैसलों में बिना विलम्ब के प्रोत्साहन एवं सहयोग होना चाहिए। हमें निश्चित करना चाहिए कि आधुनिक लड़ाकू विमानों के निर्माण तय समय में हो, इसके लिए हरसंभव उपाय किए जाने चाहिए। ऐसे फैसलों से भारत की ताकत बढ़ती है, दुनिया की अधीनता कमतर होती है। गौरतलब है, अभी तक अमेरिका, रूस और चीन ने ही पांचवीं पीढ़ी के स्वदेशी लड़ाकू विमान बनाने में सफलता हासिल की है। इस योजना के जरिये दुनिया को यह संदेश देना है कि भारत अब पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान खरीदने की बजाय खुद बनाने का काम करेगा।

इस स्वदेशी विमान के डिजाइन और विकास के लिए सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने हाल ही में पन्द्रह हजार करोड़ रुपये की राशि मंजूर की थी। अब रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व करेगी और डीआरडीओ के मुखिया की मानें, तो अगले एक दशक में यह लड़ाकू विमान भारतीय वायु सेना के बेड़े का हिस्सा होगा। निस्संदेह, हमारे रक्षा वैज्ञानिकों की सराहना की जानी चाहिए कि उनके अथक परिश्रम, तकनीकी कौशल और मेधा के कारण देश जल्द ही सुरक्षा साजो-सामान के मामले में भी आत्म-निर्भर बन जाएगा। इन स्थितियों के लिये जहां रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की सराहना होनी चाहिए वही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व का लोहा मानना चाहिए।

मौजूदा समय में भारत लड़ाकू विमान के मामले में दूसरे देशों पर निर्भर है। सरकार ने इस दिशा में भी आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। इस फैसले से घरेलू एयरोस्पेस इंडस्ट्री को सशक्त बनाने में मदद मिलेगी। एएमसीए का विकास भारतीय वायु सेना की लड़ाकू क्षमताओं को मजबूत करने और देश की रक्षा को बढ़ावा देने में मील का पत्थर साबित होगा। पडोसी देशों की हरकतों, युद्ध की संभावनाओं एवं षडयंत्रों को देखते हुए आने वाले समय में होने वाले युद्ध में वायुसेना की क्षमता और तकनीक को अधिक सशक्त बनाने की अपेक्षा है। भारत हमेशा से एक शांतिकामी मुल्क रहा है, मगर अपनी सरहदों व विशाल आबादी की सुरक्षा के लिए वह दूसरे देशों के हथियारों या सुरक्षा उपकरणों पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकता। विदेशी लड़ाकू विमानों या हथियारों की खरीद में उनके तकनीकी हस्तांतरण को लेकर कई तरह की पेचीदगियां पेश आती हैं। कई देश उन्नत रक्षा उपकरण तो दे देते हैं, लेकिन उनकी तकनीक नहीं देते या फिर उनके कलपुर्जे देने में देरी करते हैं।

इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पर्याप्त संख्या में तेजस लड़ाकू विमान बनाने में इसलिए विलंब हो रहा है, क्योंकि अमेरिका उनके लिए इंजन देने में आनाकानी कर रहा है। इसलिए एचएएल, डीआरडीओ की स्थापना की जरूरत मससूस की गई थी और आज इनके बनाए हथियार न सिर्फ हमारी सैन्य शक्ति का हिस्सा बन रहे हैं, बल्कि इस वजह से हमारा 20 फीसदी से भी अधिक सैन्य आयात कम हुआ है। आज हम अपने स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस दुनिया को बेचने की स्थिति में हैं।
मौजूदा समय में लड़ाकू विमान के लिए भारत अमेरिका और पश्चिमी देशों और रूस पर निर्भर है। देश में लड़ाकू विमानों की कमी भी है। ऐसे में सरकार स्वदेशी निर्मित आधुनिक लड़ाकू विमान के निर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठाकर सूझबूझ एवं दूरगामी सोच का परिचय दिया है। आज जब युद्ध के तौर-तरीके बदल रहे हैं, तब भारत को हर तरह की रक्षा सामग्री स्वदेश में ही बनाने में इसलिए सक्षम होना होगा, क्योंकि ऐसा करके ही वह सच्चे अर्थों में महाशक्ति बन सकता है।

प्रारंभ में विदेशी कंपनियों का सहयोग लेने में हर्ज नहीं, क्योंकि ऐसा करके ही तेजी के साथ उन्नत रक्षा समाग्री का निर्माण किया जा सकता है। भारत आधुनिक रक्षा उपकरण एवं तकनीक का निर्माण करने में सक्षम है, इसे आपरेशन सिंदूर ने साबित भी कर दिया। हमारे रक्षा उपकरणों और तकनीक ने जिस तरह तुर्किये के ड्रोन की हवा निकालने के साथ चीनी एयर डिफेंस की पोल खोल दी, उसे विश्व भर के रक्षा विशेषज्ञ भी मान रहे हैं। रूस के सहयोग से बनी ब्रह्मोस मिसाइल और स्वदेशी तकनीक पर आधारित आकाश ने सिद्ध किया कि हमारे रक्षा विज्ञानी किसी से कम नहीं। उन्हें भरपूर प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है।
भारत की रक्षा सेना दुनिया में सबसे शक्तिशाली और सम्मानित सेनाओं में से एक है, जो अपने आकार, ताकत और उन्नत तकनीक के साथ वैश्विक मंच पर धूम मचा रही है। चाहे सीमाओं पर गश्त करना हो, आसमान की सुरक्षा करनी हो या विशाल हिंद महासागर को सुरक्षित रखना हो, भारत की सेना एक ऐसी ताकत है जिसका लोहा माना जाना चाहिए। भारत का लक्ष्य सिर्फ़ वैश्विक सैन्य शक्तियों के साथ बने रहनाभर नहीं है-यह उनके साथ है बल्कि अब उससे आगे भी आना है।

किसी भी युद्ध या संघर्ष में वायु सेना की भूमिका निर्णायक हो चली है। हमास-इजरायल जंग हो या रूस-यूक्रेन लड़ाई, इस तथ्य को पूरी दुनिया स्वीकारती है। ऑपरेशन सिंदूर के जरिये हमारी वायु सेना ने भी दिखा दिया है कि किस सटीकता से शत्रुओं के लक्ष्य को मटियामेट करने में वह सक्षम है। ऐसे में भारतीय वायु सेना की जरूरतों पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। वर्तमान में, भारत दुनिया में चौथे स्थान पर है, जो केवल संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन से पीछे है। यह स्थान इसके उन्नत विमान, बेहतर प्रशिक्षण और रणनीतिक महत्व के संयोजन के कारण अर्जित किया गया है। बहुमुखी राफेल जेट से लेकर शक्तिशाली सुखोई अपने रास्ते में आने वाली किसी भी चुनौती से निपटने के लिए सुसज्जित है। निश्चित ही भारत ने एक ऐसा सैन्य बल बनाया है जो ध्यान आकर्षित करता है, जिसमें विशाल जनशक्ति, अत्याधुनिक तकनीक और गहन रणनीतिक फोकस का संतुलन है। यह अब सिर्फ़ एक क्षेत्रीय खिलाड़ी नहीं है; भारत खुद को एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है। भारतीय वायुसेना के पायलट दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पायलटों में से हैं, जो न केवल हार्डवेयर बल्कि मानवीय तत्व के कारण हवाई प्रभुत्व बनाते हैं। चाहे वह सीमाओं पर खतरों का जवाब देना हो या हवाई श्रेष्ठता सुनिश्चित करना हो, भारत की वायु सेना अपनी रक्षा रणनीति में एक प्रमुख खिलाड़ी है, जो हमेशा आसमान की रक्षा के लिए तैयार रहती है।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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