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कालिदास भारतीय साहित्याकाश का दैदिप्यमान सितारा

-1 जुलाई विलक्षण कवि कालिदास जयंती पर विशेष-

पेड़ पे चढ़ा व्यक्ति उसी डाल को काट रहा था जिस पर वह खड़ा था। ऐसे महामूर्ख व्यक्ति को मालूम नहीं था कि वह उस डाल के कटते ही स्वयं भी जमीन पर गिरकर घायल हो सकता है, कालांतर  में यही निपट मूर्ख व्यक्ति दिग् दिगांतर विश्व प्रसिद्ध विद् कवि कालिदास के रूप में विश्वविख्यात हो जावेगा। इसकी कल्पना तो शायद सपने में भी नहीं की होगी, जिसने भी कालिदास को ऐसा करते देखा होगा।

कालिदास के जन्म एवं स्थान के बारे में  काफी मतान्तर व्याप्त है, कुछ कालिदास को 800 ईसा पूर्व का मानते हैं तो कुछ गुप्त काल का उन्हें कहते हैं। ठीक वैसे ही उनके निवास एवं जन्म स्थान के बारे में भी भिन्न भिन्न राय रखते हैं । कुछ लोगों ने उन्हें काश्मीरी कहा है तो कुछ कहते हैं कालिदास बंगाल के थे। वहीं केरल बिहार, उडीसा के लोग उन्हें अपने प्रदेश का मानते हैं। पर इतना सत्य है कि ज्यादातर लोग और स्थापित मान्यता यहीं रही है कि वे प्रसिद्ध ऐतिहासिक नगरी उज्जैयिनी के थे। वे वहाँ के महाराजा विक्रमादित्य के समकालीन माने गये हैं। वहीं विक्रमादित्य जिनके नाम से विक्रम संवत चला है। कालिदास की एक अप्रतिम रचना “विक्रम वंशीयम्” भी इन्हीं के विशेष संबध में है।

विश्व के महानतम् कवि एवं नाटककार कालिदास ने साहित्य को उच्चतम शिखर पर अपने कर कमलों से प्रतिष्ठ किया। इनकी सात कृतियाँ कुमारसंभव, रघुवंश, ऋतुसंहार, मालविकाग्निमित्र, विक्रमोवंशीयम् और अभिज्ञान शाकुन्तलम ,हमारी परस्पर नस नस में पहुँच गये हैं। ये रचनाएँ रामायण और महाभारत के बाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वहीं इनकी एक अन्य रचना “मेघदूतम्” अद्वितीय है। यह रचना शब्द और ध्वनि, कल्पना, साहित्य बोध, इसमें सभी कुछ एक साथ गुंथा हुआ है। राजाओं से लेकर साधारण जन तक कालिदास की आँखों में पूरी मानवता परिदृश्य रहा हो ऐसा लगता है उनके कृतित्व को पढ़कर। 

‌कालिदास की प्रसिद्ध रचना “मेघदूतम्” की रचना शायद अधिकतर लोगों को मालूम नहीं होगा, उन्होंने हमारे छत्तीसगढ़ राज्य के सरगुजा जिले में अम्बिकापुर मुख्यालय से करीब चालीस किलोमीटर दूर उदयपुर स्थित रामगढ़ के पहाड़ों में कालिदास द्वारा ही रचित की गई थी। वहाँ आज भी पुरावशेष इस बात के साक्षी हैं। रायगढ़ के पहाड़ में कुलभूषण कवि कालिदास की स्मृति में ही प्रत्येक वर्ष सावन महीने में बृहण संगीत एवं काव्य सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। 

कालिदास ने समूचे भारत को एक आंका था, जिस प्रकार आदि शंकराचार्य ने इस महान देश की पैदल परिक्रमा की थी। ठीक उसी प्रकार कालिदास ने भी देश की पूरी लम्बाई चौड़ाई को अपनी पदयात्रा में आत्मीयता से नापा है। विभिन्न भौगोलिक वृत्त तथा भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों से वे परिचित थे। उनके ज्ञानकोष में समाज शास्त्र, प्रकृति विज्ञान, दर्शन और कवित्व एक साथ घुल मिल गये हैं। भूतल और आकाश के विभिन्न चित्रों ने उन्हें लुभाया और उनकी प्रतिभा को निखार ही दिया। हिमालय के अलावा विभिन्न नदियों का वर्णन और दक्षिण के चित्रण से यह प्रमाणित होता है कि वे बहुत घूमे फिरे थे। उदाहरण के लिये रघुवंश में अयोध्या से लंका तक का पूरा मार्ग चित्रित किया गया है। समुद्र, समुद्री जीव, तटीय तालवन, मोती, शंख, तमिलनाडु का परिचय देते हैं तो गोदावरी नदी और चित्रकुट बिना देखे वर्णित नहीं किये जा सकते। कालिदास ग्रंथावली  की भूमिका में कहा गया है कि ये दूर दूर तक की महत्ता उनकी सार्वकालिक विश्व दृष्टि में हैं।

हर कवि और लेखक की अपनी एक अलग ही दुनिया होती है, पर महाकवि कालिदास की दुनिया की बात कुछ निराली ही है। आखिर कोई तो बात है कि सैकड़ों साल बाद सात समुन्दर पार हजारों मील दूर यूरोप की धरती पर गेटे जैसा कवि शकुंतला को पढ़कर नाच उठता है। इनकी रचना का संसार ऐसा था कि मनुष्यों की सारी दुरियाँ खत्म हो जाती हैं, यह वह जमीन हैं जहाँ से उठकर सच्चा कालाकार न किसी जाति का रह जाता हैं न किसी देश का। कालिदास के साहित्य में ऐसा त्याग है, तपस्या हैं, ऊंचे ऊंचे आदर्श हैं, देशभक्ति की भावनाएँ हैं।

देवोत्थान एकादशी का दिन पूरे भारत में बड़ा ही पवित्र और मंगलमय माना जाता हैं। महाकवि कालिदास ने अपनी रचना मेघदूतम् में इसी दिवस को विरही यक्ष की शाप मुक्ति का वर्णन किया है। इसीलिये महाकवि कालिदास के सम्मान में उज्जैन में प्रतिवर्ष कालिदास समारोह का आयोजन इसी दिन से प्रारंभ किया जाता है। महाकवि कालिदास इस सभ्यता के मूल मंत्र के धारक, वाहक एवं उद्घोषक थे।         

कुमारसंभवम्, अभिज्ञानम शकुंतलम् नाटकों में उन्होंने दिखाया कि भारतीय आदर्श में भोग ही अंतिम नहीं है, बल्कि त्याग की ओर बढ़ने के लिये एक सोपान मात्र है। रघुवंशम् में उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की गाथा गाई। कालिदास जिनके नाम की किसी से भी तुलना नहीं हो सकती, जिनके लिये कोई पुरातन कवि कह गया है कि –

 “अद्यापित्ततुल्य कवेरभावाद् अनामिका सार्यवतीबभूव”।।

कालिदास की प्रिय नगरी रही है। यह नगरी उनके तारुण्य के वैभव विलास की लीला स्थली रही है। कालिदास उज्जयिनी को प्रेम से विशाला या श्री विशाला  कहते थे। कालिदास जो विस्तृत संसार की खोज में अल्हड़ कैशोरावस्था में ही घर से निकल पड़े थे, और उज्जैन के महाकाल के महा श्मशान पर बने कालिका देवी के मंदिर में आ पहुंचे थे। वहाँ पर उन्होंने पाया अपना परम प्रिय मित्र अर्थात उज्जयिनी का राजा विक्रमादित्य। 

शकों का विध्वंस करने वाला शिकारि विक्रमादित्य, जिसकी कथा को भारत का बच्चा बच्चा आज तक भूल नहीं सका है। एक जगह बनते हैं प्रचंड सूर्य: स्पृहणीय चंद्रमाः सदा वगाह समवारि संचयः ।। अर्थात ऋतु संहार का कवि रास्ते में प्रचंड सूर्य वाला गर्मी झेलता हुआ, रात्रि में चंद्रमा की स्पृहा करता हुआ मनचाहे स्थानों पर जब चाहे स्नान करता हुआ उज्जयिनी आया था। कुमार संभव में कालिदास की रचना की एक बानगी देखिये- 

हरस्तु किंचित् परिलुप्त धैयः ।
चंद्रोदया रम्भ इबाम्बु राशिः ।। 
उमामुखे विम्ब फला धयेष्ठे ।
व्यापार वामास विलोचनानि ।।

अर्थात शिवजी कैलाश पर्वत पर. समाधिस्थ है, ऋतुराज अपनी क्रीड़ा की तैयारी में हैं, पास ही खड़ा नंदी हाथ में बेंत लिये पहरा दे रहा है। परंतु मन को उन्मत्त कर देने वाले मन्मथ को कौन रोक सकता है? वह तो मन से मन में सूक्ष्म प्रवेश करता हुआ ब्र‌ह्मचारी नंदी बैल को आसानी से चकमा दे सकता है। उसने ‘पार्वती को धनुष बनाया और उनकी झुकी देहयष्टि से प्रार्थना का बाण मारा। शिवजी प्रलुप्त धैर्य हो गये। फिर शिवजी का ध्यान करते हुये किंचित लगा कर चंद्रोदय के समय जैसे अंबु राशि किंचित चलायमान हो जाती है, उसी प्रकार शिवजी ने अपने तीनों नेत्रों से उस बिंवफलाधराष्ठी को देखा। इस प्रस्तुत श्लोक में कालिदास की कल्पना शब्दों का संयोज़न बड़ा ही सटीक एवं अतुलनीय बन पड़ा है। अंततः तो कालिदास के विषय में वहीं कहा जा सकता है कि कवियों का उदय होता है, वे अस्त भी हो जाते हैं ठीक जैसे सूर्य उदय और अस्त होता है। परंतु सबसे अलग कालिदास का यश. तो समान रूप से आज भी स्थित और साज स्वमान है। जब तक पृथ्वी पर ज्ञान की पिपासा रहेगी, कालिदास हमेशा साहित्य गगन में दैदिप्यमान रहेंगे।

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