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वह दिन ग‌ए जब हम डाकिये का इंतजार करते थे

-1 जुलाई, राष्ट्रीय डाक कर्मचारी दिवस पर विशेष-

आज का डाक टिकट, जो डाक विभाग द्वारा मुद्रित एवं जारी कागज का वह टुकड़ा है, जिसका उपयोग निश्चित राशि के भुगतान के पश्चात एक स्थान से दूसरे स्थान पर संदेश भेजने के लिये किया जाता है। डाक टिकट का सर्वप्रथम चलन ग्रेट ब्रिटेन द्वारा 6 मई 1840 को किया गया, जो पेनी ब्लेक के नाम से जाना जाता है। इसके पूर्व जब डाक टिकट का चलन शुरू नहीं हुआ था, चिट्ठियों का सेवा शुल्क या तो भेजने वाले को पेशगी देना पड़ता था ​या पाने वाले को बाद में चिट्ठी का शुल्क दूरी के हिसाब से देना पड़ता था। डाक टिकटों को सबसे पहले ब्रिटेन के रोलैण्ड हिल द्वारा प्रयोग में लाया गया। इसके पश्चात 1843 में ब्राजील, 1845 में बोसेल, 1847 में अमेरिका, मारिशस और त्रिनिदाद आदि देशों द्वारा डाक टिकट जारी किया गया। भारत वर्ष में सबसे पहले डाक टिकटों का चलन सन् 1852 में सिंध के कमिश्नर बार्टले फेरे द्वारा सिंध प्रांत के लिये जारी किया गया। वे टिकट “सिंधडाक” के नाम से प्रसिद्ध हैं। 

 डाक व्यवस्था का पूर्वार्ध कैसा था, आइये इसे तब से जाने

पूर्व में जब डाक जैसे शब्द का सर्वथा अभाव था, तब यह कार्य या व्यवस्था हरकारों द्वारा सम्हाला एवं संपन्न किया जाता था। हरकारा जो आज से कई दशक पूर्व एक सुपरिचित शब्द था, तब यह डाक विभाग का कार्य करता था। उस समय वाहनों की कमी होने के कारण दूरवर्ती ग्रामों एवं कस्बों में डाक पहुंचाने का काम इनके ही सुपुर्द रहता था। हरकारा का शाब्दिक अर्थ है- हरकाम को करने वाले। पहले राजे-महाराजे इससे जो भी काम रहे उसे वह बराबर करता था। इसलिये. इसका नाम हरकारा पड़ा होगा। माना जाता है कि हरकारों का प्रचलन मुगलकाल में प्रारंभ हुआ। मुगल साम्राज्य दूर दूर तक फैले होने के कारण एक  प्रांत की खबर को दूसरे प्रांत में भेजना तब – संभव न था। इसलिये ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता महसूस की जाने लगी, जो इन खबरों को पहुंचाने का काम करे, और तब पैदल तथा घुड़सवार इन दो श्रेणियों के हरकारों की नियुक्तियाँ की गई।

दूरवर्ती स्थान होने के कारण इनके लिये डाक को शीघ्रातिशीघ्र पहुंचा देना जरूरी होता था। पैदल हरकारे अपने माथे पर घटियां बांधकर एवं हाथ में चाबुक रखकर फटकारते हुए दौड़ पड़ते थे। लंबीदूरी को जल्द से जल्द तब करने का उनमें दबाव रहता था। साथ ही लगातार दौड़ते रहने की उनमें सामर्थ्य भी होता था। जब थकावट महसूस होती तो वे अपनी टेंट से अफीम का गोला निकालकर उसे झट चढ़ा लेते। प्रसिद्ध यात्री व लेखक इब्न बतूना ने हरकारों के संबंध में लिखा है। मैंने हरकारे देखे, जो मुहम्मद बिन तुगलक के राज्य में पत्र पहुंचाया करते हैं। इस समय दो तरह के हरकारे है एक पैदल और दूसरा घुडसवार पैदल हरकारा “एलवह” कहलाते हैं। जिसमें एक एक मील पर हरकारे बदले जाते हैं। हरकारे के हाथ में एक लाठी होती है, जिसके ऊपरी सिरे पर घुंघरू बंधे होते हैं।

एक मील का फासला पूरा होते देख वह लाठी को हिलाकर उसमें बंधे घुंघरूओं को जोर जोर से बजाता है। आवाज सुनकर अगला हरकारा रुक्का (पत्र) लेने के लिये आगे आता है और इस तरह रुक्का पहुंचाने का काम जारी रहता है। एक अन्य लेखक बासरेट के अनुसार इन हरकारों के दौड़ने की गति घोड़ों जितनी तेज होती थी। नियुक्ति से पहले वे अपने पैरों में सीसे के जूते पहनकर दौड़ने का अभ्यास करते, और एक स्थान पर खड़े होकर पैरों को बार बार उठाकर टांगों को इतना ऊपर उठाते कि उनकी एड़ी कूल्हे तक पहुंच आए। जूते उतारने पर वे हरकारे के पद के लिये योग्य माने जाते एक विवरण के अनुसार हरकारों के धैले में जिसमें फरमान (बादशाह के सीधे आदेश) निशान (शाहजादे द्वारा शाह को छोड़ अन्य व्यक्तियों को लिखा गया पत्र ), अर्जवस्त (शाहजादे या प्रजा द्वारा शाह को लिखा गया पत्र) अहकन और नम्ज (शाह द्वारा लिखवाये गये संक्षिप्त निर्देश) तंथ रुक्का (निजी पत्र ) होता था। आगे यह भी उल्लेखित है कि उस समय हाथों में पत्र देना अशुभ माना जाता था। इस लिये – हरकारा दूसरे हरकोरे के पैर के पास पत्र फेककर वापस लौट जाता था।

घोडों पर सवार होकर डाक पहुंचाने की व्यवस्था को “एलबोलक” कहा जाता था। इसका संचालन बादशाह की घुड़सेना करती थी। इस तरह चौदह मील पर “डाक चौकी” की व्यवस्था होती थी, जहां पहुंचकर ये घुड़सवार हरकारे अपनी डाक दूसरे घुडसवार हरकारे को देते, जो ताजे दम घोड़ो के साथ आगे बढ़ते घोड़ों को बदलने की व्यवस्था “डाक लगाना” कहलाती थी। बाद में “डाक” वितरित किये जाने वाले पत्रों के समूह के लिये लागू हो गया। और आगे चलकर उसे पहुंचान वाली रेल का नाम”डाक गाड़ी” (मेल) पड़ गया और डाक का वितरण करने वाला “डाकिया” ” कहलाने लगा। पहले वस्तुतः हरकारा जासूसी का भी काम करते थे। इनका काम नाजिम या सूबेदारों को मौलिक समाचार देने अथवा घटनाओं या हालातों के बारे में सूचित करना होता था। लिखित समाचार तो अपवाद स्वरूप ही होता था।

सूबे में नियुक्त हरकारों को सूबेदार के समक्ष चारो ओर के समाचारों व घटनाओं का विवरण देना पड़ता था। प्रांतीय डाक द्वारा शाही दरबार के लिये भेजे जाने वाले पत्रों की बंद लिफाफे में देना जरुरी होता था। ये डाक सूदान हवीस (गोपनीय संवाददाता) द्वारा तैयार की जाती थी, जिसमें विभिन्न गुप्त समाचार, रिपोर्ट, नाजिस एवं दीवानों के प्रेषण व अन्य पत्र शामिल होते थे। इन्हें थैले में बंदकरे हरकारों के सुपुर्द कर दिया जाता था। धीरे धीरे यह व्यवस्था परिस्कृत होती रही पर इसका आमूलचूल परिवर्तन ब्रिटिश सरकार द्वारा नियमित डाक व्यवस्था प्रारंभ करने के बाद से ही शुरू हुआ। वैसे अपवाद स्वरूप यह राजस्थान सहित कुछ राज्यों में जारी रही किन्तु बाद में इन्होंने भी वह व्यवस्था समाप्त कर दी। और फिर डाक व्यवस्था पर इस्ट इंडिया कंपनी का एकाधिकार हो गया। स्वतंत्रता के पश्चात उनका भी एकाधिकार जाता रहा। स्वतंत्रता के पश्चात डाक व्यवस्था एक विभाग के रूप में आस्तित्व में आया और वह आज भी पूर्णत: भारत सरकार अधीन अपना कार्य अनवरत कर रही है।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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