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प्रेम, भक्ति एवं शक्ति की अनंत ज्योति हैं राधाजी

-राधाष्टमी- 31 अगस्त, 2025-

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी का दिन भारतीय संस्कृति में प्रेम, भक्ति, शक्ति और समर्पण का अनोखा पर्व लेकर आता है-यह है राधाष्टमी। इसे राधा रानी का जन्मोत्सव माना जाता है। यह केवल किसी भक्ति की शिखर नारी चरित्र के जन्मोत्सव का पर्व नहीं, बल्कि उस दिव्य शक्ति की अभ्यर्थना है जिसने स्वयं श्रीकृष्ण के जीवन को एक अनूठी ऊंचाई दी। इस दिन भक्त राधा और श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और उनकी कृपा से सुख-समृद्धि व सौभाग्य की प्राप्ति की कामना करते हैं। ब्रजभूमि, खासकर बरसाना में इसे बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। राधाजी प्रेम, भक्ति और श्रीकृष्ण के भीतर छिपी शक्ति का प्रतीक हैं; वह प्रेम की पराकाष्ठा, भक्ति की देवी और श्रीकृष्ण की आंतरिक शक्ति के रूप में पूजी जाती हैं। उनका दिव्य प्रेम आध्यात्मिक प्रेम की एक मिसाल है। यदि श्रीकृष्ण लीला, माधुर्य और करुणा के अवतार हैं, तो राधा उस लीला का रस, उस माधुर्य की गहराई और उस करुणा की आत्मा हैं। इसीलिए भारतीय भक्ति परंपरा में कहा गया-“राधे बिनु नहीं कृष्ण, कृष्ण बिनु नहीं राधे”।

राधा भारतीय संस्कृति में केवल एक स्त्री का नाम नहीं हैं, वे प्रेम की पराकाष्ठा और भक्ति की सर्वाेच्च अभिव्यक्ति हैं। उनका प्रेम सांसारिक या देहाधारित नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा का मिलन है। यह प्रेम स्वार्थ और अधिकार से परे है, यह प्रेम केवल समर्पण और तादात्म्य का है। राधा का जीवन त्याग और अनुराग का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं चाहा, उनका हर भाव, हर श्वास केवल श्रीकृष्ण में रमा रहा। यही कारण है कि भक्त कवियों ने राधा को ‘भक्ति-रस की मूर्ति’ और ‘प्रेम की अधिष्ठात्री देवी’ कहा। सूरदास ने लिखा-‘प्रेम भया मनु भाव समाना, राधा तन मन कृष्ण बखाना।’ अर्थात्, प्रेम ऐसा हो कि हृदय और आत्मा में केवल श्रीकृष्ण का ही वास हो जाए। निश्चित ही राधा और श्रीकृष्ण का संबंध, आत्मा और परमात्मा का अद्भुत एवं विलक्षण संवाद है। सामान्य दृष्टि से देखने पर राधा और श्रीकृष्ण का संबंध केवल प्रेमिका-प्रेमी का प्रतीत हो सकता है, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ बहुत गहन है। यह संबंध सांसारिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक है। यह आत्मा और परमात्मा का शाश्वत संवाद इसलिये है कि इसमें किसी प्रकार का मोह, स्वार्थ या वासना नहीं है।

राधा श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करती हैं। श्रीकृष्ण लीला के केंद्र हैं, परंतु वह लीला राधा के बिना अधूरी है। इसीलिए भक्त परंपरा में श्रीकृष्ण का नाम लेने से पहले राधा का नाम लिया जाता है, “राधे-कृष्ण”, “श्यामा-श्याम”। यह क्रम अपने आप में गहरा दार्शनिक संदेश देता है कि परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग राधा जैसे प्रेम और भक्ति से होकर जाता है। राधा केवल श्रीकृष्ण की प्रेयसी नहीं, बल्कि उनकी शक्ति और प्रेरणा हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने प्रकृति के दो रूप बताए हैं-अपरा और परा। राधा को ‘परा प्रकृति’ का स्वरूप माना जाता है, जो जीवन को आध्यात्मिकता की ओर ले जाती है। वे श्रीकृष्ण की लीलाओं की आत्मा हैं, उनकी आराधना का आधार हैं। राधा के प्रेम में कोई अधिकार नहीं, केवल समर्पण है। उनका संदेश है कि सच्चा प्रेम पाने में नहीं, बल्कि देने में है। यही देने की भावना जीवन को ऊँचाई देती है। यह प्रेम केवल मनुष्य और मनुष्य के बीच संबंधों में ही नहीं, बल्कि मनुष्य और ईश्वर के संबंध में भी उतना ही प्रासंगिक है।

राधा की भक्ति को सर्वाेच्च माना गया है। उनका प्रेम निष्काम है, केवल श्रीकृष्णमय है। उन्होंने अपने अस्तित्व को ही श्रीकृष्ण में विलीन कर दिया। यही कारण है कि चैतन्य महाप्रभु ने राधा की भक्ति को अपनाया और उसी रस में डूबकर कहा-‘मैं राधा की भक्ति में श्रीकृष्ण को देखता हूँ और श्रीकृष्ण की भक्ति में राधा को।’ सूरदास, रसखान, विद्यापति, मीराबाई-सभी भक्त कवियों ने राधा के माध्यम से ही प्रेम और भक्ति के गहनतम स्वरूप का चित्रण किया। मीराबाई ने जब कहा-“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई”-तो उसमें राधा का ही भाव प्रतिध्वनित होता है। आज के समय में जब संबंधों में स्वार्थ, गणना और तात्कालिकता का समावेश बढ़ता जा रहा है, तब राधा का चरित्र हमारे लिए नई रोशनी देता है। सच्चा प्रेम वही है जिसमें समर्पण, विश्वास और त्याग हो। समकालीन जीवन में जहां परिवार और समाज टूटते जा रहे हैं, वहां राधा का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो उठता है। उनका जीवन बताता है कि जब तक हम संबंधों को केवल लाभ-हानि की दृष्टि से देखते रहेंगे, तब तक उनमें स्थायित्व नहीं आएगा। स्थायित्व तभी आएगा जब उनमें राधा जैसा समर्पण होगा।

भक्ति के स्तर पर भी राधा हमें प्रेरणा देती हैं। आज धर्म अक्सर कर्मकांड और बाहरी आडंबर तक सीमित होता जा रहा है। राधा हमें सिखाती हैं कि भक्ति हृदय की गहराई में होती है, जहां भक्त और भगवान का भेद मिट जाता है। जब हम राधा की तरह निष्काम होकर ईश्वर में समर्पित हो जाते हैं, तब जीवन की हर कठिनाई तुच्छ लगने लगती है और एक अद्भुत शांति प्राप्त होती है। राधा का जीवन हमें यह स्मरण कराता है कि मनुष्य का परम उद्देश्य केवल भौतिक सुख या उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा का मिलन है। वे हमें बताती हैं कि भक्ति केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि हृदय की गहराई से ईश्वर के साथ तादात्म्य स्थापित करना है। आज जब मानवता संघर्ष, तनाव और अकेलेपन से गुजर रही है, राधा हमें सिखाती हैं कि सच्चा समाधान प्रेम और समर्पण में है। यदि हम राधा के जीवन से प्रेरणा लें, तो हमारे व्यक्तिगत संबंध, सामाजिक ताना-बाना और आध्यात्मिक जीवन सब में नई ऊर्जा और शांति का संचार हो सकता है।

शास्त्रों में श्री राधा श्रीकृष्ण की शाश्वत शक्तिस्वरूपा एवम् प्राणों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में वर्णित हैं अतः राधाजी की पूजा के बिना श्रीकृष्ण की पूजा अधूरी मानी गयी है। श्रीमद देवी भागवत में श्री नारायण ने नारदजी के प्रति ‘श्री राधायै स्वाहा’ षडाक्षर मंत्र की अति प्राचीन परंपरा तथा विलक्षण महिमा के वर्णन प्रसंग में श्री राधा पूजा की अनिवार्यता का निरूपण करते हुए कहा है कि श्री राधा की पूजा न की जाए तो मनुष्य श्रीकृष्ण की पूजा का अधिकार नहीं रखता। स्वयं भोलेनाथ ऋषि नारदजी के पूछने पर कहते हैं कि मैं तो श्रीराधा के रूप, लावण्य और गुण आदि का वर्णन करने मे अपने को असमर्थ पाता हूं। उनके रूप आदि की महिमा कहने में भी लज्जित हो रहा हूं। तीनों लोकों में कोई भी ऐसा समर्थ नहीं है जो उनके रूपादि का वर्णन करके पार पा सके। उनकी रूपमाधुरी जगत को मोहने वाले श्रीकृष्ण को भी मोहित करने वाली है। यदि अनंत मुख से चाहूं तो भी उनका वर्णन करने की मुझमें क्षमता नहीं है।’’

शास्त्रों के अनुसार, राधा के बिना कृष्ण की पूजा भी अधूरी मानी जाती है, इसलिए राधा अष्टमी का महत्व बहुत अधिक है। इस दिन व्रत और पूजा करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और भक्तों को धन, ऐश्वर्य और सुख मिलता है। विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य और संतान सुख के लिए राधा अष्टमी का व्रत रखती हैं। राधाअष्टमी का पर्व केवल एक जन्मोत्सव नहीं, बल्कि यह हमें यह याद दिलाता है कि सच्चा प्रेम और भक्ति किसे कहते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, राधा रानी का जन्म बरसाना में वृषभानु और कीर्तिदा के घर हुआ था। उन्हें भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य शक्ति माना जाता है। मान्यता है कि जो भक्त राधा रानी को प्रसन्न कर लेते हैं, भगवान श्री कृष्ण स्वयं उनसे प्रसन्न हो जाते हैं। राधा हमें सिखाती हैं कि प्रेम आत्मा की अनुभूति है, जो परमात्मा से जोड़ता है। वे प्रेम की उस ज्योति की प्रतीक हैं, जो न केवल श्रीकृष्ण को आलोकित करती है, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए पथप्रदर्शक बनती है। इसलिए आज के समय में राधा की प्रासंगिकता और भी गहरी हो जाती है। वे हमें जीवन का वह मार्ग दिखाती हैं, जिसमें स्वार्थ नहीं, केवल समर्पण है; जिसमें वासना नहीं, केवल आत्मा और परमात्मा का मिलन है। यही राधा का सच्चा संदेश है और यही राधाष्टमी का वास्तविक महत्व है।

ललित गर्ग
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