लेख का आरम्भ मैं संस्कृत नीति ग्रंथ ‘हितोपदेश’ के एक श्लोक से करता हूं-
नारिकेल समाकारा दृश्यन्ते खलु सज्जना:। अन्ये च बदरिकाकारा बहिरेव मनोहरा:।।
भावार्थ है, सज्जन व्यक्ति निश्चित ही नारियल के समान दिखते हैं। ऊपर से कठोर किंतु अंदर से कोमल, तरल और मधुर। जबकि अन्य व्यक्ति बेर की भांति ऊपर से आकर्षक दिखते हैं, किंतु अंदर से आम्ल-कषाय। यह श्लोक नारियल के माहात्म्य को प्रकट करता है। ऐसे ही बचपन के आनंद में खुश बच्चे परस्पर नारियल के संदर्भ में एक पहेली बूझते हैं – कटोरे के अंदर कटोरा, बेटा बाप से गोरा। तात्पर्य है कि नारियल भले ही ऊपर से अनाकर्षक भूरा जटायुक्त है किंतु अंदर मिठासयुक्त ज्योत्स्ना सम श्वेत गिरी-गोला की उपस्थिति-प्राप्ति है। चरक संहिता में नारियल के औषधीय उपयोग का विस्तृत वर्णन है। मानव जीवन में नारियल न केवल दैनंदिन उपभोग का एक घटक है अपितु व्यक्ति के उत्तम स्वास्थ्य, पोषण, अर्थोपार्जन तथा धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन का दृढ आधार भी है। इसीलिए उष्णकटिबंधीय फल नारियल के महत्व से सामान्य जन को परिचित कराने, वैश्विक जागरूकता के प्रसार एवं नारियल कृषि को बढ़ावा देने के लिए सन् 1969 में स्थापित अंतरराष्ट्रीय नारियल समुदाय द्वारा वर्ष 2009 से प्रतिवर्ष 2 सितम्बर को विश्व नारियल दिवस मनाया जाता है।
नारियल जीवन में शुभता एवं संस्कृति का प्रतीक है। सुख, समृद्धि, सिद्धि एवं स्नेह का मंगल स्वरूप नारियल जीवन को ऊर्जा, ओज और औदार्य से तृप्त करता है। नारियल मनोकामनाओं को पूर्ण कर जीवन सामंजस्यपूर्ण और श्रीयुक्त करने के कारण श्रीफल नाम से लोक स्वीकार्य एवं व्यवहार्य है। नारियल का कठोर आवरण मानव के अहंकार एवं जीवन की नकारात्मकता तथा सांसारिक नश्वरता को व्यक्त करता है तो वहीं शीतल नारियल जल एवं गिरी व्यक्ति की आंतरिक शुचिता, शुभता, शुद्धि, संस्कार, सम्मान तथा मधुरता, तरलता एवं स्निग्धता का परिचायक है। इसलिए देवस्थान में नारियल फोड़ना या किसी को श्रीफल भेंट करना वास्तव में व्यक्ति के अहंकार के त्याग एवं समर्पण का शुभ संकेत है। नारियल सम्मान है, प्रतिष्ठा है, आस्था का उच्च घोष है और विश्वास एवं आत्मीयता का प्रकटन भी। सौभाग्य, समृद्धि एवं आध्यात्मिक जागृति का हेतु नारियल संकल्प-सिद्धि की साधना की सतत प्रेरणा है, अनन्त ऊर्जा है। नारियल मानव के उत्थान के सर्वोत्कृष्ट रूप का मृदुल उपहार है। नारियल वृक्ष आकाश एवं वसुधा की प्रीति का स्नेहिल सूत्र है। वस्तुत: नारियल संस्कृति के विशाल भवन में मलय वात संवहन के गवाक्ष हैं।
हम अपने परिवेश का अवलोकन करें तो पाते हैं कि परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर विद्यार्थी मंदिर में भगवान की मूर्ति के सम्मुख नारियल चढ़ाते हैं, किसी ने नया वाहन लिया या कोई कल-कारखाना खोला तो नारियल फोड़ कर ही शुभारम्भ करते हैं, धार्मिक आयोजनों में कलश स्थापना एवं हवन की पूर्णाहुति में नारियल का ही प्रयोग किया जाता है। लोक जीवन में किसी व्यक्ति या परिवार में दैवीय संकट आने पर तीन बार नारियल उतार कर किसी सतत प्रवाही सरिता-जल में प्रवाहित कर देते हैं। कोई सिद्धि या मनौती मानने पर लाल, पीत या श्वेत वस्त्र में नारियल को बांधकर किसी देवस्थान में रख या वासुदेव स्वरूप पीपल के वृक्ष में टांग देते हैं। जन्मदिन, विवाह, किसी व्यक्ति की षष्ठिपूर्ति तथा साहित्यिक समारोहों में सम्मान हेतु श्रीफल भेंट करते हैं। कह सकते हैं, नारियल हमारे दैनंदिन जीवन में रचा-बसा एक ऐसा फल है जिसका उपयोग धनी-निर्धन समभाव से करते हैं। नारियल जीवन में जल तत्व का संरक्षक है।
नारियल श्रीलक्ष्मी का उपहार रूप माना जाता है, इसलिए इसका एक नाम श्रीफल भी प्रयुक्त होता है। निश्चित रूप से नारियल व्यक्ति एवं देश की आर्थिकी को भी प्रभावित करता है। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रेरणा से 1969 में स्थापित अंतर सरकारी संगठन एशिया और प्रशांत नारियल समुदाय ने 2009 से 2 सितम्बर को विश्व नारियल दिवस मना कर जन-जन को नारियल के लाभ और महत्व से परिचित कराने, नारियल की खेती को बढ़ावा देने और उसके आर्थिक पक्ष को समझाने हेतु वैश्विक जन जागरूकता का महनीय कार्य प्रारंभ किया है। यह संगठन किसी एक थीम पर आयोजित विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों के माध्यम से नारियल से पोषण एवं औषधीय लाभ, उसके बहुमुखी उपयोग, कृषि क्षेत्र में विस्तार एवं नारियल उद्योग को बढ़ावा देकर रोजगार के संसाधन सृजित करना और नारियल को किसी न किसी रूप में अपने दैनिक आहार में शामिल करने के लिए प्रयासरत है।
वर्ष 1969 में स्थापित एशियाई और प्रशांत नारियल समुदाय वर्ष 2018 से अंतरराष्ट्रीय नारियल समुदाय के नाम से जाना जाता है, जिसके सदस्य देशों की संख्या 21 है। इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में इसका मुख्यालय है। भारत इसका संस्थापक सदस्य है। वर्तमान में अन्तरराष्ट्रीय नारियल समुदाय के 21 सदस्यों में इंडोनेशिया, फिलीपींस, भारत, श्रीलंका, ब्राज़ील, मलेशिया, थाईलैंड, केन्या, वियतनाम, पापुआ न्यू गिनी, फिजी आदि सम्मिलित हैं। विश्व का 72% उत्पादन इंडोनेशिया, भारत और फिलीपींस द्वारा किया जाता है। नारियल के उत्पादन में प्रथम पांच देश भारत इंडोनेशिया, फिलीपींस, श्रीलंका और ब्राजील हैं। भारत में नारियल का सर्वाधिक उत्पादन केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में होता है।
ताड़ परिवार के सदस्य नारियल का वैज्ञानिक नाम कोकोस न्यूसीफेरा है। नारियल का उपयोग विविध क्षेत्रों में प्रचुरता से किया जा रहा है। भोजन, सौन्दर्य उत्पाद, सजावटी वस्तुओं, औषधियों एवं भवन निर्माण में नारियल और उसके अंगोपांग का उपयोग किया जाता है। नारियल की भांति हमारा जीवन रसमय एवं मधुमय हो। हमारे मन-मस्तिष्क में मानवीय मूल्यों तथा पारिवारिक एवं सामाजिक रिश्तों-सम्बंधों की तरलता, सरलता एवं शीतलता की भावधारा का अविचल प्रवाह बना रहे, ऐसी शुभेच्छा है।
प्रमोद दीक्षित मलय
शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
मंदिर निर्माण में दें अपना पवित्र सहयोग
🙏 श्री शिव शक्ति मंदिर, सिंहपुर (बलिया, उ.प्र.) का निर्माण वर्ष 1958 के आसपास स्व. टीमल सिंह द्वारा कराया गया था। वर्तमान में इसका संरक्षण आधुनिक वैश्विक कल्याण संस्थान कर रहा है।
अब मंदिर के पुनर्निर्माण, विस्तार एवं जीर्णोद्धार का कार्य प्रस्तावित है।
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