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नेपाल सरकार की जनता के प्रति बेरुखी से भारत भी बेअसर नहीं 

सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही में लापरवाही, न केवल नेपाल के आंतरिक संकट को जन्म देती है, बल्कि भारत पर भी कई प्रकार से नकारात्मक असर डाल सकती है। ऐसे प्रभाव केवल सीमित भौगोलिक सीमा तक नहीं रहता, बल्कि सामरिक, आर्थिक, सामाजिक और कूटनीतिक स्तरों पर भी भारत को प्रभावित कर सकता है। सीमावर्ती अस्थिरता और सुरक्षा खतरे में आ सकती है।

चूंकि नेपाल-भारत की खुली सीमाएं हैं। नेपाल और भारत के बीच लगभग 1,751 किमी की खुली सीमा है (बिना वीजा और पासपोर्ट आवाजाही संभव)। जब नेपाल में अशांति फैलती है, तो अवैध हथियारों, तस्करी और मानव तस्करी जैसे अपराध भारत तक फैल सकते हैं। भारत की सीमावर्ती राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल जैसे राज्य पर भी असर पड़ता है। विशेष रूप से प्रभावित होते हैं। कानून-व्यवस्था बनाए रखना चुनौती बन सकता है। वहीं चरमपंथ और आतंकवाद की संभावनाएं बन जाती हैं। अशांत और अस्थिर नेपाल सीमावर्ती इलाकों को चरमपंथी गतिविधियों का अड्डा बना सकता है।  खासकर चीन और पाकिस्तान द्वारा नेपाल का उपयोग भारत-विरोधी गतिविधियों में किया जा सकता है।प्रवास और शरणार्थी संकट की स्थिति में नेपाल से भारत की ओर लोगों का पलायन हो सकता है। जब नेपाल में बेरोजगारी,अस्थिरता और दमन होता है, तो बड़ी संख्या में नेपाली नागरिक भारत की ओर पलायन करते हैं। इससे भारत के संसाधनों पर दबाव, स्थानीय नौकरियों पर असर और सांस्कृतिक टकराव की स्थिति बन सकती है।

भारत पर शरणार्थी शिविर और प्रशासनिक बोझ आ सकता है। अगर नेपाल की स्थिति बहुत बिगड़ती है, तो भारत को शरणार्थी शिविर स्थापित करने और मानवाधिकार सहायता देने की मजबूरी बन सकती है- जिसका राजकोषीय बोझ भी भारत पर पड़ेगा।व्यापार और आर्थिक नुकसान भारत का व्यापार घाटा की स्थिति बन जाती है।

नेपाल भारत का बड़ा निर्यात बाज़ार है। भारत नेपाल को पेट्रोलियम, मशीनरी, दवाइयाँ, कृषि उपकरण आदि सप्लाई करता है। नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता से इन सप्लाई चेन में बाधा आती है। सीमा बंद/आंदोलन से सप्लाई प्रभावित हो जाते हैं। नेपाली बंद और बॉर्डर ब्लॉकेज की स्थिति में, भारत के ट्रांसपोर्टरों और व्यापारियों को लॉजिस्टिक नुकसान उठाना पड़ता है।

विदेशी निवेश एफडीआई पर नाकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अगर नेपाल में भारत के निवेश असुरक्षित माने जाने लगें, तो भारत की कॉर्पोरेट उपस्थिति कमजोर होगी, जिससे भारत की “नर्म शक्ति” भी प्रभावित हो सकती है। कूटनीतिक दबाव और चीन का प्रभाव बढ़ सकता है।         

भारत-नेपाल संबंधों में खटास न आए इसके लिए भारत सरकार को उचित और सहयोगात्मक सुरक्षित कदम उठाने की तत्काल आवश्यकता है। नेपाल में जब अस्थिरता हो रही है, तो वहां की सरकारें राष्ट्रीयता के नाम पर भारत-विरोधी भावनाएं भड़काने  लगती हैं (जैसे 2020 में नक्शा विवाद)। यह सब चीन की घुसपैठ का रास्ता खोलते वाली परिस्थिति है।भारत की अनदेखी का फायदा उठाकर चीन नेपाल में भारी निवेश, सैन्य सहयोग और राजनीतिक समर्थन देने लगता है।इससे भारत की स्ट्रैटेजिक गहराई कमजोर होती है, खासकर सिक्किम और बिहार के इलाके में।

सांस्कृतिक और सामाजिक टकराव व धार्मिक और सांस्कृतिक तनाव उत्पन्न हो सकता है।नेपाल में राजशाही की वापसी की मांग, हिंदू राष्ट्र की मांग आदि अगर सांप्रदायिक मोड़ लेती हैं, तो भारत में सांप्रदायिक तनाव उभर सकते हैं-खासकर सीमावर्ती क्षेत्रों में युवा असंतोष उभरने का डर  बन सकता है।

नेपाल का Gen-Z आंदोलन भारत के युवाओं में भी एक प्रेरणा या असंतोष का प्रतिबिंब बन सकता है-विशेषकर डिजिटल सेंसरशिप या भ्रष्टाचार के मुद्दों पर भारत को चाहिए कि वह नेपाल को स्थिरता और विकास में रणनीतिक सहयोग दे। वहां के लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए नैतिक समर्थन दे। चीन के मुकाबले नेपाल के साथ सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव को प्राथमिकता दे।

जनता की पीड़ा, शासन की चुप्पी,
भारत की भी मुश्किलें हों खड़ी
नेता सोए, पड़ोसी जागे चालों में, 
नेपाल की लापरवाही, 
असर दे भारत की हालों में ।।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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