हे तप्त सूर्य की स्वामिनी !
तुम हो ऊर्जा का अनन्य उद्गम।
अपनी प्रखर ज्योति से बनती
जीवन के तीव्र राग की सरगम।
तुम केवल तीखी धूप नहीं,
हो पके आम की मीठी सौगात।
अमराइयों में कोयल की कूक
रातों में ठंडी पुरवाई की बात।
तरबूज,खरबूजे, लीची की बहार
इनसे सज गया प्रकृति का श्रृंगार।
कुल्फी की घंटी का परिचित स्वर
याद दिलाता बीता सुन्दर सफर।
तुम हो लंबी छुट्टियों का उल्लास
नानी संग बिताए दिनों का एहसास।
दिनभर की तपन के बाद की शाम
देती है व्याकुल से मन को आराम।
यूं तो तुम्हारी लू झुलसाती तन को
फिर भी तुम नवजीवन देती गगन को।
नदियों के पानी को भाप बनाती
फिर सावन के जलधर को लाती।
चांदनी रात में छत पर सोने का
वो प्यारा अपना सा पल।
आने वाली वर्षा की आशा में
प्रतीक्षा में प्रफुल्लित है कल।
स्वेद की हर इक बूंद सिखाती
है अनथक मेहनत का मोल।
हे ग्रीष्म! तुम्हारे कर्म मार्ग से
उपजा वैभव है अनमोल।
तपकर ही सोना बनता है
चमकते कुंदन जैसा महान।
हे तपन की ऋतु! तुमको
ऊर्जित धरा का कोटि नमन !!!


