मनोभ्रम, जिसे डिमेंशिया या मनोभ्रंश भी कहा जाता है, मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को प्रभावित करने वाले ऐसे विकारों का समूह है, जिसमें व्यक्ति की याददाश्त, सोचने समझने की क्षमता, निर्णय लेने की योग्यता, व्यवहार और दैनिक कार्य करने की क्षमता धीरे धीरे प्रभावित होने लगती है। यह केवल भूलने की सामान्य समस्या नहीं है, बल्कि एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, जो व्यक्ति के सामाजिक, पारिवारिक और व्यावसायिक जीवन पर गहरा प्रभाव डालती है। बढ़ती आयु के साथ इसका जोखिम भी बढ़ता जाता है, इसलिए समय रहते इसके लक्षणों की पहचान और उचित देखभाल अत्यंत आवश्यक है।
विश्व स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न अध्ययनों के अनुसार वर्तमान में विश्वभर में लगभग पाँच करोड़ से अधिक लोग डिमेंशिया से प्रभावित हैं और प्रत्येक वर्ष लगभग एक करोड़ नए मरीज इस बीमारी की चपेट में आते हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि प्रभावी रोकथाम और जागरूकता लगभग के उपाय नहीं किए गए तो आगामी तीन दशकों में डिमेंशिया के मरीजों की संख्या तीन गुना तक बढ़ सकती है। अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि लगभग दस प्रतिशत लोगों को जीवन के किसी न किसी चरण में इस समस्या का सामना करना पड़ सकता है। आयु के आधार पर देखें तो 65 से 74 वर्ष की आयु वर्ग में लगभग तीन प्रतिशत लोगों में डिमेंशिया पाया जाता है, जबकि 75 से 84 वर्ष की आयु में यह आंकड़ा लगभग उन्नीस प्रतिशत तक पहुंच जाता है। 85 वर्ष से अधिक आयु के लगभग आधे लोगों में किसी न किसी रूप में डिमेंशिया के लक्षण देखे जा सकते हैं।

वरिष्ठ परामर्शदाता
एआरटीसी, एसएस हॉस्पिटल, आईएमएस, बीएचयू, वाराणसी
डिमेंशिया का सबसे प्रमुख लक्षण याददाश्त में लगातार कमी आना है। मरीज हाल की घटनाओं को बार बार भूलने लगता है, परिचित लोगों या स्थानों को पहचानने में कठिनाई महसूस करता है तथा नई जानकारी को याद रखना उसके लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसके साथ ही समय, दिन, तारीख या स्थान को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। कई बार मरीज सही निर्णय लेने में असमर्थ दिखाई देता है और सामान्य परिस्थितियों में भी उलझन महसूस करता है।
इस बीमारी का प्रभाव केवल स्मृति तक सीमित नहीं रहता बल्कि व्यवहार और व्यक्तित्व में भी स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देते हैं। कई मरीज चिड़चिड़े, उदास या चिंताग्रस्त हो जाते हैं। कुछ लोग सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाने लगते हैं, जबकि कुछ में अनावश्यक बेचैनी, क्रोध या घबराहट देखने को मिलती है। नींद और भूख की आदतों में बदलाव, संतुलन बनाए रखने में कठिनाई, चलने फिरने में असामान्यता, भाषा और बोलने में समस्या तथा दैनिक कार्यों को पूरा करने में कठिनाई भी इसके सामान्य लक्षण हैं।
डिमेंशिया के कई प्रकार होते हैं और प्रत्येक प्रकार का कारण तथा लक्षण कुछ हद तक अलग हो सकता है। अल्जाइमर रोग डिमेंशिया का सबसे सामान्य कारण माना जाता है। इसमें मस्तिष्क में असामान्य प्रोटीन जमा होने लगते हैं, जिससे तंत्रिका कोशिकाएं धीरे धीरे क्षतिग्रस्त होती जाती हैं। इसका सबसे प्रमुख प्रभाव स्मृति पर पड़ता है और समय के साथ व्यक्ति की संज्ञानात्मक क्षमता लगातार कम होती जाती है।

वैस्कुलर डिमेंशिया दूसरा प्रमुख प्रकार है, जो मस्तिष्क में रक्त प्रवाह या ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति न होने के कारण विकसित होता है। यह अक्सर स्ट्रोक के बाद अचानक दिखाई दे सकता है या छोटे छोटे स्ट्रोक की श्रृंखला के कारण धीरे धीरे विकसित हो सकता है। इसके लक्षण कई बार अल्जाइमर रोग से मिलते जुलते होते हैं, जिससे सही पहचान के लिए विशेषज्ञ चिकित्सकीय मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है।
कुछ मरीजों में एक साथ दो या अधिक प्रकार के डिमेंशिया पाए जाते हैं। ऐसी स्थिति को मिश्रित डिमेंशिया कहा जाता है। इसके अलावा लेवी बॉडी डिमेंशिया में मस्तिष्क में असामान्य प्रोटीन संरचनाएं विकसित हो जाती हैं, जिससे मतिभ्रम, दूरी का सही अनुमान न लगा पाना तथा दिन भर मानसिक स्थिति में उतार चढ़ाव जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। यह रोग पार्किंसंस रोग से भी जुड़ा हो सकता है। फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया में मस्तिष्क के अग्र और पार्श्व भाग प्रभावित होते हैं, जिसके कारण व्यक्ति के व्यवहार, व्यक्तित्व और भाषा संबंधी क्षमताओं में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिलते हैं।
डिमेंशिया के उपचार में केवल दवाएं पर्याप्त नहीं होतीं। मरीज के लिए सुरक्षित, शांत और सहयोगपूर्ण वातावरण तैयार करना भी उतना ही आवश्यक है। घर में अत्यधिक शोर, भीड़भाड़ और तनावपूर्ण माहौल से बचना चाहिए, क्योंकि इससे मरीज का भ्रम और बेचैनी बढ़ सकती है। कमरे में पर्याप्त प्रकाश, व्यवस्थित सामान और परिचित वातावरण मरीज को मानसिक रूप से सहज बनाए रखने में मदद करता है।
सुरक्षा की दृष्टि से गैस, बिजली के उपकरण, नुकीली वस्तुएं, दवाइयां, माचिस और लाइटर जैसी वस्तुओं को मरीज की पहुंच से दूर रखना चाहिए। यदि संभव हो तो गैस चूल्हे में ऑटो शटऑफ जैसी सुरक्षा व्यवस्था लगाई जानी चाहिए। मरीज के पास हमेशा उसकी पहचान संबंधी जानकारी, घर का पता, संपर्क नंबर और बीमारी का संक्षिप्त विवरण उपलब्ध होना चाहिए, ताकि घर से भटक जाने की स्थिति में समय पर सहायता मिल सके।
डिमेंशिया से पीड़ित व्यक्ति को कभी भी अकेले वाहन नहीं चलाने देना चाहिए और न ही बिना किसी देखभालकर्ता के बाहर भेजना चाहिए। परिवार के सदस्यों को उनसे शांत, सरल और स्पष्ट भाषा में संवाद करना चाहिए। उनकी भूलों पर बार बार ध्यान दिलाने या उन्हें डांटने के बजाय धैर्यपूर्वक उनका ध्यान किसी अन्य विषय की ओर मोड़ना अधिक प्रभावी होता है। इससे उनका आत्मविश्वास बना रहता है और मानसिक तनाव भी कम होता है।
दवाइयों का सेवन हमेशा देखभालकर्ता की निगरानी में कराया जाना चाहिए। यदि मरीज में व्यवहार में अचानक परिवर्तन, गंभीर भ्रम, लगातार अनिद्रा या अन्य मानसिक समस्याएं दिखाई दें तो तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। नियमित चिकित्सकीय जांच और समय पर उपचार रोग की प्रगति को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
डिमेंशिया के उपचार और देखभाल में मानसिक संबल का विशेष महत्व है। लंदन के वरिष्ठ शोधकर्ता गिल लिविंग्स्टन के अनुसार सामाजिक रूप से सक्रिय रहने वाले लोग याददाश्त, भाषा और अन्य संज्ञानात्मक क्षमताओं को लंबे समय तक बेहतर बनाए रखने में सक्षम रहते हैं। परिवार के साथ समय बिताना, परिचित लोगों से बातचीत करना, हल्की मानसिक गतिविधियों में भाग लेना तथा भावनात्मक सहयोग प्राप्त करना मरीज के आत्मविश्वास को मजबूत करता है और उसके जीवन की गुणवत्ता में सकारात्मक सुधार ला सकता है।
डिमेंशिया भले ही एक दीर्घकालिक और चुनौतीपूर्ण बीमारी हो, लेकिन समय पर पहचान, उचित उपचार, सुरक्षित वातावरण, नियमित देखभाल तथा परिवार, चिकित्सक और मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता के सामूहिक सहयोग से मरीज सम्मानजनक, सुरक्षित और अपेक्षाकृत बेहतर जीवन जी सकता है। इस बीमारी में दवाओं के साथ साथ संवेदनशील व्यवहार, धैर्य और मानसिक संबल ही सबसे प्रभावी उपचारों में से एक माने जाते हैं।

