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प्रौद्योगिकी संप्रभुता भू-राजनीतिक संप्रभुता का निर्धारण करेगी: सीएसआईआर के 84वें स्थापना दिवस पर डॉ. जितेंद्र सिंह

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री और सीएसआईआर के उपाध्यक्ष डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत के एक प्रौद्योगिकी-संचालित राष्ट्र के रूप में परिवर्तन पर जोर देते हुए कहा, “आने वाले समय में प्रौद्योगिकी संप्रभुता भू-राजनीतिक संप्रभुता का निर्धारण करेगी।” आज यहां वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के 84वें स्थापना दिवस पर डॉ. जितेंद्र सिंह ने संगठन की विरासत, इसकी वैज्ञानिक उपलब्धियों और विकसित भारत 2047 की दिशा में राष्ट्र के भविष्य के पथ को आकार देने में इसकी जिम्मेदारी पर जोर दिया।

1942 में सीएसआईआर की शुरुआत के बारे में चर्चा करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने उपस्थित लोगों को याद दिलाया कि यह आजादी से पहले स्थापित कुछ राष्ट्रीय संस्थानों में से एक है। उन्होंने इसके पहले उपाध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के योगदान को याद किया, जिनकी शैक्षणिक प्रतिभा अक्सर उनके राजनीतिक जीवन के कारण फीकी पड़ गई। उन्होंने भारत में औषध विज्ञान के जनक माने जाने वाले सर रामनाथ चोपड़ा को भी याद किया, जिन्होंने औषधि अनुसंधान की नींव रखी। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, “सीएसआईआर का इतिहास हमें याद दिलाता है कि विज्ञान और नवाचार आजादी से पहले भी भारत की यात्रा का अभिन्न अंग थे।”

वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करते हुए, डॉ. सिंह ने कहा कि यदि भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहना है, तो उसे उभरती प्रौद्योगिकियों में अपनी ताकत को पूरी जागरूकता से बढ़ाना होगा। देश भर में फैली 37 प्रयोगशालाओं के साथ, सीएसआईआर स्वास्थ्य सेवा और फार्मास्यूटिकल से लेकर कृषि, सामग्री और रक्षा तक विविध क्षेत्रों में काम कर रहा है। इन योगदानों को और व्यापक रूप से प्रदर्शित करने के लिए “एक सप्ताह एक प्रयोगशाला” और “एक सप्ताह एक थीम” जैसी पहल शुरू की गईं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने वैज्ञानिक संस्थानों के बीच और भी अधिक एकीकरण का भी आह्वान किया। प्रतिरोधी श्वसन संक्रमणों के खिलाफ प्रभावी एंटीबायोटिक, नैफिथ्रोमाइसिन, जो पहली बार स्वदेशी रूप से विकसित किया गया है, जैसी हालिया सफलताओं का हवाला देते हुए, उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय परिणामों को अधिकतम करने के लिए सीएसआईआर और जैव प्रौद्योगिकी जैसे संबद्ध विभागों के बीच सहयोग आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि प्रयोगशाला से बाजार तक की यात्रा में उद्योग संबंध केंद्रीय हैं। उन्होंने कहा, “टीकों से लेकर फूलों की खेती तक, हमारी सभी सफलता की कहानियां उद्योग भागीदारों के साथ शुरुआती और मजबूत जुड़ाव के कारण ही संभव हुई हैं।” उन्होंने कंपनियों से भारतीय प्रयोगशालाओं से उभर रहे नवाचारों की अधिक जिम्मेदारी लेने का आग्रह किया।

सीएसआईआर के कार्य के सामाजिक आयाम को जम्मू-कश्मीर में लैवेंडर की खेती से लेकर पालमपुर में ट्यूलिप नवाचार तक के उदाहरणों के माध्यम से उजागर किया गया, जिनका राष्ट्रीय कार्यक्रमों में उल्लेख किया गया। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि फूलों की खेती से जुड़ी पहलों ने किसानों की आजीविका में बदलाव लाया है, जबकि सीएसआईआर द्वारा विकसित तकनीकों ने राष्ट्रीय सुरक्षा में योगदान दिया है, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल किए गए सेंसर भी शामिल हैं। उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि विज्ञान जीवन को आसान बनाए और इसका सीधा सामाजिक-आर्थिक प्रभाव हो।”

आगे की राह बताते हुए, उन्होंने त्रि-आयामी दृष्टिकोण यानी जागरूकता, सामर्थ्य और सुलभता की बात की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विज्ञान का लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचे। उन्होंने वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे नागरिकों से सीधे जुड़ने और अपने काम को अधिक प्रभावी ढंग से दर्शाने के लिए संचार के आधुनिक साधनों और सोशल मीडिया का उपयोग करें।

इस कार्यक्रम में देश-विदेश की प्रमुख हस्तियों ने भाग लिया, जिनमें नीति आयोग के सदस्य डॉ. वी. के. सारस्वत, भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय कुमार सूद और एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी में प्रौद्योगिकी एवं नवाचार के यूनिवर्सिटी प्रोफेसर और अमेरिकी राष्ट्रीय विज्ञान फाउंडेशन के पूर्व निदेशक डॉ. सेतुरामन पंचनाथन शामिल थे।

जैसा कि सीएसआईआर 2042 में अपनी शताब्दी की ओर अग्रसर है, इस अवसर पर डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि संस्थान को भारत के तकनीकी उत्थान का पथप्रदर्शक बनने की आकांक्षा रखनी चाहिए। उन्होंने कहा, “हमारे संस्थापकों के लिए सच्चा सम्मान यही होगा कि हम विज्ञान को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाएं और 2047 में राष्ट्र को आत्मविश्वास और क्षमता के साथ आगे बढ़ाएं।”

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