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शाकाहार: खुशी, करुणा एवं उत्तम स्वास्थ्य का स्रोत

सम्पूर्ण विश्व में मानव के दैनंदिन भोजन में मांसाहार या शाकाहार व्यंजन होते हैं। अगर मनुष्य के दैहिक पोषण एवं ऊर्जा आवश्यकता पर दृष्टिपात करें तो शाकाहार से समुचित एवं पर्याप्त पोषण एवं ऊर्जा प्राप्त हो जाती है। मनुष्य के दांत-आंत एवं पाचन तंत्र की कार्य प्रणाली भी शाकाहार के अनुरूप है, हालांकि कुछ लोगों में मतांतर सम्भव है। किंतु सत्य यही है कि मानव का एकमात्र भोजन वनस्पति आधारित सामग्री ही है। हमारे लोकजीवन में एक प्राचीन कहावत है, जैसा खाये अन्न, वैसा होये मन्न, अर्थात् हम जैसा भोजन ग्रहण करेंगे वैसा ही हमारा मन बनता है। मन शरीर की अभौतिक इकाई है जो व्यक्ति के विचार, चिंतन, संस्कृति, स्मृति तथा कार्य-व्यवहार एवं आचरण को प्रभावित करती है, और तदनुरूप तर्क, वाद-विवाद एवं निर्णय हेतु बुद्धि को प्रेरित करती है। गर्भस्थ जीव में मन एवं बुद्धि होती है, जिसको पोषण मां द्वारा किये गये भोजन से मिलता है और तदनुरूप उसकी प्रवृत्ति बनती है।

शाकाहार सात्विक भोजन ग्रहण करने से शिशु की मन-बुद्धि निर्मल एवं शुद्ध सात्विक बनती है। वीर बालक अभिमन्यु और भक्त प्रह्लाद के उदाहरण हमारे जीवंत मार्गदर्शक हैं, जिन्होंने गर्भकाल में ही शर-संधान शक्ति एवं भगवद्भक्ति का पाठ श्रवण कर आत्मसात कर लिया था। सनातन संस्कृति में शुद्ध सात्विक शाकाहार भोजन को आध्यात्मिक जागरण एवं साधना सिद्धि के लिए आवश्यक साधन कहा गया है। मां अन्नपूर्णा देवी की स्तुति करते हुए अन्न की भिक्षा की प्रार्थना की गई है- अन्नपूर्णे सदापूर्णे, शंकर प्राण वल्लभे, ज्ञान वैराग्य सिद्धि अर्थम्, भिक्षाम् देहि च पार्वती। श्रीमद्भगवद्गीता में यज्ञ हवन-समिधा हेतु शुद्ध अन्न का विधान वर्णित है। आयुर्वेदिक ग्रंथ शाकाहार की अनुशंसा एवं अनुसमर्थन करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास विरचित ‘रामचरित मानस’ में तो पदे-पदे कंद-मूल, फल, शाक-पात से ही ऋषियों द्वारा प्रभु श्रीराम, जानकी एवं लक्ष्मण का स्वागत वंदन करने के दृश्य उल्लेखनीय हैं। स्पष्ट है, शाकाहार ही मनुष्य मात्र के लिए उचित, उपयोगी एवं उत्तम है।‌

शाकाहार प्रत्येक व्यक्ति में करुणा, धैर्य, संयम, दृढता, मित्रता, वीरता, सत्साहस,  उत्पन्न करता है, आंतरिक चेतना का जागरण कर आनंद प्रकट करता है। शाकाहार हृदय में अहिंसा, शांति, प्रेम, जीवों के प्रति दयाभाव, विनम्रता, प्रीति, सख्य एवं संस्कार-सहकार का सर्जन करता है। जीवन में मधुर रस का सिंचन कर मन प्रफुल्लित एवं प्रमुदित कर प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करता है। विश्व में दिनानुदिन शाकाहारी व्यक्तियों की वृद्धि परिचायक है कि विश्व अब शाकाहार की महत्ता को स्वीकार कर रहा है। इसीलिए प्रत्येक वर्ष अक्टूबर महीने को शाकाहार माह के रूप में मनाते हुए 1 अक्टूबर को विश्व शाकाहार दिवस का आयोजन किया जाता है। शाकाहार दिवस के आयोजन के माध्यम से शाकाहार से प्रभावित एवं प्रेरित होकर प्रति वर्ष हजारों व्यक्ति मांसाहार त्याग कर वनस्पति आधारित भोजन पद्धति स्वीकार कर रहे हैं। 

उत्तरी अमेरिकी शाकाहारी समुदाय की स्थापना 1 अक्टूबर, 1977 को हुई थी जो स्वस्थ जीवन शैली, नैतिकता, पर्यावरण संरक्षण, मानवीय लाभों तथा खुशियों की प्राप्ति एवं दयाभाव के प्रसार के लिए शाकाहार दिवस का आयोजन करता है, जिसे अंतरराष्ट्रीय शाकाहार संघ ने 1978 में सहयोग एवं समर्थन देकर प्रभावी बना दिया। आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जोसेफ पुअर अपने अध्ययन में कहते हैं, “शाकाहारी बनने से न केवल ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम होता है, बल्कि वैश्विक अम्लीकरण, सुपोषण, भूमि उपयोग और जल उपभोग की समस्या भी हल होती है।” इतना ही नहीं, शाकाहार ओजोन परत की रक्षा कर पर्यावरण स्वस्थ रखता है।

भारत विश्व का प्रमुख शाकाहारी देश है। राजस्थान में 80 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या शाकाहारी हैं। हरिद्वार (उत्तराखंड) तथा पालीताना (गुजरात) शाकाहारी शहर के रूप में जाने जाते हैं। जैन धर्मावलंबी पूर्ण शाकाहारी होते हैं जो उनकी आध्यात्मिक जाग्रति के लिए परमावश्यक है। संयुक्त राज्य अमेरिका में 6 प्रतिशत से अधिक लोग शाकाहार अपना चुके हैं। इजरायल, ब्रिटेन, ब्राज़ील में भी शाकाहार बढ़ रहा है। अत्यन्त शाकाहारियों का वर्ग ‘वीगन’ तो पशु उत्पाद यथा दूध, दही, अंडा, चमड़ा, रेशम, ऊन, शहद तथा पशुओं के अंश से निर्मित सजावटी वस्तुएं एवं सौंदर्य उत्पादों का भी प्रयोग नहीं करते। वे केवल वनस्पति आधारित भोजन फल, फूल, कंद, सब्जी, अनाज, दालें, बीज आदि ग्रहण करते हैं। 

शाकाहार मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत उपयोगी एवं रोगमुक्ति में सहायक है। शाकाहार मोटापा नहीं बढ़ाता है तथा हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर, रक्तचाप, स्मृति भ्रंश के ख़तरों को कम करता है। शाकाहार मृदा स्वास्थ्य एवं संरक्षण को बल देता है, मीठे जल एवं वनों का रक्षण करता है। वास्तव में शाकाहार जीवन शैली पशुओं के प्रति मानव को क्रूरता एवं शोषण से मुक्त करती है। पशुओं के प्रति प्रेम एवं आत्मीयता भाव का प्रसार करती है। पशु-पक्षी भी मानव एवं पेड़-पौधों के साथ प्रकृति के विशाल परिवार के अहम सदस्य हैं, यह भाव शाकाहार ही पुष्ट करता है। विश्व शाकाहार दिवस के माध्यम से मानव के दैनंदिन भोजन में शाकाहार को बढ़ावा देने का भाव है, साथ ही पशु-पक्षियों को बचाने की इच्छा भी है ताकि प्रकृति का संतुलन बना रहे। निश्चित रूप से प्रकृति के संरक्षण, संवर्धन एवं सौंदर्य के लिए मनुष्यों के साथ पशु-पक्षियों का निर्भय जीवन आवश्यक है।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
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