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धन और स्वास्थ्य वृद्धि के देवता भगवान धन्वंतरी 

-18 अक्टूबर धनतेरस धनवंतरी पूजा पर विशेष-

भगवान धनवंतरी की‌ पूजा का ही पर्व धनतेरस है। यह पांच दिनों तक चलने वाले महापर्व दीपावली का प्रारंभ पर्व अर्थात प्रथम पर्व होता है। इसके बाद नरक चतुर्दशी, भाई दूज, गोवर्धन पूजा का पर्व भी क्रमानुसार पड़ता है। धनतेरस के दिन रामभक्त हनुमान की जयंती भी मनाई जाती है। धनतेरस के दिन वस्तु क्रय करने की भी परंपरा है। इसीलिये आज के दिन बाजारों में बहुत भीड़भाड़ रहती है।

धन और स्वास्थ्य वृद्धि के देवता भगवान धन्वंतरी 

पौराणिक कथाओं के अनुसार कहते हैं धनवंतरी भगवान समुद्र मंथन में निकले चौदह रत्नों में से एक थे। धनवंतरी अपने हाथों में अमृत कलश लेकर निकले थे। धार्मिक मान्यता है कि धनतेरस के दिन भगवान धनवंतरी की पूजा करने से धन की वृद्धि होती है। साथ ही स्वास्थ्य में भी वृद्धि होती है। व्यापारी वर्ग धनतेरस के अवसर पर गद्दी सजाते हैं। इसके लिये वे पंडितों से शुभ मुहुर्त भी निकलवाते हैं। 

धनतेरस की संध्यावेला में यम को प्रसन्न करने के लिए दक्षिण दिशा की ओर दीपदान भी किया जाता है। रात्रि को तेरह दीप जलाने की परंपरा है। आज से ही दीप जलाने का नियम भी शुरू हो जाता है। ये दीप मिट्टी के बने होते हैं। 

धनतेरस से ही पटाखों की आवाज भी सुनाई देने लगती है। धनतेरस से तरह-तरह के पटाखों की आवाज़ें व चमकार की दीपावली में अपने पूरे शबाब पर होती है। धनतेरस के दूसरे दिन नरक चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व अपने पितरों के श्राद्ध करने एवं उन्हें नरक से मुक्ति के लिये मनाया जाता है।

इस दिन भगवान शंकर, हनुमान, विष्णु सहित अन्य देवताओं के पूजन अर्चन हेतु तालाब, चौराहा, गौशाला आदि चौदह स्थानों में दीप जलाया जाता है। प्राचीन मान्यता है कि नरक चतुर्दशी के दिन लक्ष्मी जी का वास तेल में होता है। इस दिन सूर्योदय के पूर्व तिल का तेल लगाकर स्नान करने से लक्ष्मीजी प्रसन्न होती हैं। और लक्ष्मी का वास स्थायी होता है, जिससे घर की दरिद्रता दूर होती है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार संकट मोचन हनुमान का जन्म इसी दिन हुआ था। मंदिरों में सुंदरकांड एवं हनुमान चालीसा का सामूहिक रूप से पाठ एवं पूजन किया जाता है। धनतेरस के दिन “पहले लोग आभूषण तथा बर्तनों की खरीदी पर जोर दिया करते थे। अब सिर्फ परंपरा का निर्वाह ही दिखाई पड़ता है। 

धनतेरस पर खरीदी करना शुभ और बरक्कत मानते हैं। दुकानदारों द्वारा अपने प्रतिष्ठानों को आकर्षक ढंग से सजाकर पर्व का स्वागत किया जाता है। लोग बाग भी अपने लीपे पुते चमकदार घरों में विद्युत बल्बों आदि से सजाकर उसे आकर्षक रूप प्रदान करते हैं। और महापर्व दिवाली के प्रथम दिवस से ही हर्षोल्लास और उत्सव में जुट जाते हैं।

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