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अधिकारियों की मिलीभगत से कायस्थ बना अनुसूचित जाति का, ले रहा है सरकारी नौकरी का लाभ

गोंडा (अयोध्या): उत्तर प्रदेश सरकार कितनी भी कोशिश करे, लेकिन भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगा पा रही है। प्रदेश में एक ऐसा मामला सामने आया है जो न सिर्फ सभी को चौंका देगा बल्कि स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत की पोल भी खोल देगा। अधिकारियों ने एक कायस्थ परिवार के अनुसूचित जाति में बदले जाने के मामले की जांच ठीक तरीके से नहीं की और साथ में गलत जांच रिपोर्ट लगाई जिसका फायदा उठाकर परिवार सरकारी नौकरी का लाभ ले रहा है। मामले की जानकारी प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश सरकार को भी दी गई है ताकि ठीक तरीके से जांच नहीं करने पर इन अधिकारियों के खिलाफ जल्द से जल्द कार्रवाई हो सके।

दरअसल, यह मामला जनपद गोंडा के ग्राम बालापुर, थाना नवाबगंज और तहसील तरबगंज का है जहां स्थानीय अधिकारियों द्वारा एक सामान्य जाति (कायस्थ) परिवार ने एक अनुसूचित जाति की महिला से शादी की और फिर बाद में सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए अपने को भी अनुसूचित जाति का घोषित करवा लिया। मामले के प्रकाश में आने पर जब लेखपाल व अन्य अधिकारियों से इस संबंध में जांच करवाई गई तो उन्होंने ठीक से जांच करने की बजाए उसे अनुसूचित जाति का ही बताया। बताया जा रहा है कि इन अधिकारियों की मिलीभगत और भ्रष्टाचार के कारण ही गलत रिपोर्ट लगाई गई है। क्योंकि जांच में उपस्थित स्थानीय निवासियों ने बताया है कि रामधीरज, रामशंकर और राममिलन पुत्र राम कुमार लाल इस गांव के निवासी हैं और इनके पूर्वज कायस्थ जाति के थे। बावजूद इसके अब सभी के विवाह अनुसूचित जाति में हुए हैं। इसको आधार मानते हुए जांच समाप्त कर दी गई है और सही जांच नहीं की गई।

बताया जा रहा है कि सही जांच की जाती और कुटुम्ब रजिस्टर, बस्ता खतौनी व सरकारी नौकरी पाने वाले आरोपी के पिता की शैक्षणिक प्रमाण पत्र में और अन्य दस्तावेजों की जांच करते हुए रिपोर्ट लगानी चाहिए थी किन्तु प्रशासन को गुमराह करते हुए निष्पक्ष तरीके से जांच नहीं की गई औक आर्थिक लाभ के चक्कर में गलत रिपोर्ट लगा दी गई है। यह एक संगीन अपराध की श्रेणी में आता है और जांच करने वाले अधिकारियों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगना लाजिमी है क्योंकि कोई भी अपना धर्म तो बदल सकता है, लेकिन जाति नहीं बदली जाती। संविधान के विशेषज्ञ इसे कानूनी तौर पर फर्जी मानते हैं और माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना भी करार देते हैं।

वहीं तहसील प्रशासन अपने और अपने अधिकारियों को इस मामले में फंसता देख फाइल ही गायब करवा दिया है। जबिक इसी तहसील का पेशकार घूस लेते रंगे हाथों पकड़ा गया है और जेल में बंद है। रजिस्ट्रार पर भ्रष्टाचार की नकेल कसी जा चुकी है और सीबीआई व ईडी कई फाइले जब्त कर ले जा चुकी है। इसके अलावा पिछले 4 वर्षों से यह तहसील बंद पड़ी है। ऐसे में इस तहसील के अफसरों द्वारा निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से जांच की अपेक्षा करना बेमानी ही होगी। अब देखना यह होगा कि इन अफसरों के खिलाफ कायस्थ को अनुसूचित जाति की रिपोर्ट देने की कार्रवाई कब होती है।

रविन्द्र कुमार मिश्रा
रविन्द्र कुमार मिश्रा
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