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कान्हा का जन्म उत्सव

था उस दिन कान्हा का जन्म उत्सव
पूरा जग नाच रहा था
बादल गरज रहे थे
अमृत बरसा रहे थे
पौधे भी नाच रहे थे
खेत में हरियाली छा गई थी
इस बीच घर में रखे गमले
एक बात को लेकर चिंतित थे
गुलाब, गेंदा एक ही बात सोच रहे थे
क्या भगवान हमें भूल गए ?
काश हम लोग भी उत्सव का  हिस्सा होते
काश हमें भी वह अमृत मिलता
जो खेत में बरस रहा है
काश हमें भी कान्हा जी की वह कृपा मिलती
पर हम इन सबसे वंचित रह गए
हम बंद रह गए
उस चाहरदिवारी में
हमने सबको सुख दिया
पर हम दुखी रह गए
प्रभु के जन्मोत्सव के दिन तो सर्वत्र दुनिया खुश रहती है
हंसती है, गाती है,
खुशी मनाती है
पर हम हम वंचित रह गए
कभी वह दिन भी आए
कान्हा हमारे पास आए
उनके संग हम खेलें
कूदें
नाचें-
उनकी कृपा हमें भी मिले
और हम भी खुश हो जाएं
पर यह क्या
यह उत्सव तो हो गया खत्म
बादल चले गए
पौधे रुक गए
क्या यह एक सपना है ?
सामने कृष्ण दिख रहे हैं
क्या यह एक भ्रम है ?
आ रहे हैं हमारी ओर
हम फिर खुश हो जाएंगे
“मैं हूं कृष्णा, मैं हूं परमसत्य”
कहते हैं वासुदेव
सारे पौधे हो गए नए
खुली आंख
सब सपना
या कुछ और
चल रहा फागुन
है हर जगह खुशियां
नहीं रहे हम वंचित
है हम पर भगवान की कृपा

“हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे, राम हरे राम राम राम हरे हरे”

अतुल्य प्रकाश
कक्षा: 10th

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