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अमीरी में अभिवृद्धि विद्रोह एवं संकट का बड़ा कारण

विश्व अर्थव्यवस्था पर किए गए हालिया अध्ययन विशेषकर जी-20 पैनल की रिपोर्ट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि धन और संपत्ति के वितरण में असमानता अब चरम पर पहुंच चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार आज दुनिया की नई बनी संपत्तियों का लगभग तिरेसठ प्रतिशत हिस्सा मात्र एक प्रतिशत अमीर लोगों के पास है जबकि निचले पचास प्रतिशत गरीब लोगों के हिस्से में केवल एक प्रतिशत संपत्ति आई है। यह असमानता केवल आर्थिक नहीं बल्कि नैतिक, सामाजिक और मानवीय संकट का भी संकेत है। यह स्थिति एक आदर्श विश्व संरचना के लिये भी बड़ी बाधा है। यह ऐसी त्रासद, विद्रोहपूर्ण एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति है जिसमें एक तरफ लोग मूलभूत सुविधाओं के अभाव में सड़कों पर उतर रहे हैं तो दूसरी ओर अमीर से और अमीर होते लोगों की विलासिता के किस्से तमाम हैं। उदारीकरण व वैश्वीकरण के दौर के बाद पूरी दुनिया में आर्थिक असमानता रूकने का नाम नहीं ले रही है, इससे एक बड़ी आबादी में विद्रोह एवं क्रांति के स्वर उभर रहे हैं।

अमीरी में अभिवृद्धि विद्रोह एवं संकट का बड़ा कारण

सन् 2000 से 2024 के बीच विश्व अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व वृद्धि हुई, तकनीकी विकास हुआ, उत्पादन बढ़ा और वैश्वीकरण के नाम पर बाजारों का विस्तार हुआ, लेकिन इस विकास का लाभ समान रूप से नहीं बंटा। अमीर और अमीर होते गए, गरीब और गरीब। सन 2000 में जहां विश्व की कुल संपत्ति का पैंतालीस प्रतिशत हिस्सा शीर्ष एक प्रतिशत लोगों के पास था, वहीं 2024 तक यह बढ़कर तिरेसठ प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गया। इसी अवधि में आधी से अधिक आबादी के हिस्से की संपत्ति घटकर केवल एक प्रतिशत रह गई। यह आंकड़े केवल संख्या नहीं, मानवता की दिशा के संकेत हैं कि हम प्रगति के नाम पर असंतुलन का साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं। जो विद्रोह का कारण बन रहा है, हिंसा एवं अलगाव का भी कारण बन रहा है।

जी-20 पैनल के अध्ययन के अनुसार, वर्तमान में वैश्विक स्तर पर असमानता भयावह स्तर तक जा पहुंची है। निस्संदेह, भारत भी इस स्थिति में अपवाद नहीं है। देश के सबसे अमीर एक फीसदी लोगों ने केवल दो दशक में अपनी संपत्ति में 62 फीसदी की वृद्धि की है। दुनिया की इस चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में अमीर लगातार अमीर होते जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर गरीब अभाव, तंगी एवं जहालत के दलदल से बाहर आने के लिए छटपटा रहे हैं। इस आर्थिक असमानता का ही नतीजा है कि अमीर व गरीब के बीच संसाधनों का असमान वितरण और बदतर स्थिति में पहुंच गया है। ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि देश के शीर्ष दस प्रतिशत लोगों के पास कुल संपत्ति का लगभग सतहत्तर प्रतिशत हिस्सा है जबकि निचले साठ प्रतिशत लोगों के हिस्से में मात्र 4.7 प्रतिशत संपत्ति आती है। बीते दशक में अरबपतियों की संख्या दोगुनी हो गई लेकिन मजदूर, किसान और मध्यम वर्ग की आमदनी स्थिर रही या घटी। एक ओर महानगरों में गगनचुंबी इमारतें, विलासिता और अति उपभोग की चकाचौंध है, तो दूसरी ओर गाँवों और झुग्गियों में रोटी और दवा के लिए संघर्षरत लोग हैं। यही विरोधाभास हमारी विकास यात्रा का सबसे बड़ा प्रश्न बन गया है।

निस्संदेह, पैनल की हालिया रिपोर्ट नीति-निर्माताओं को असमानता के इस बढ़ते अंतर को पाटने के तरीके तलाशने और नये साधन खोजने के लिये प्रेरित करेगी। पिछले ही हफ्ते, केरल सरकार ने दावा किया था कि राज्य ने अत्यधिक गरीब तबके की गरीबी का उन्मूलन कर दिया है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने इन दावों को लेकर संदेह जताया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गरीबी मुक्त भारत के निर्माण का संकल्प भी आश्चर्यकारी सफलता के साथ आगे बढ़ रहा है। करीब 25 करोड़ लोगों को गरीब से बाहर लाया गया है। इस साल की शुरुआत में, विश्व बैंक ने भी बताया था कि भारत 2011-12 और 2022-23 के बीच 17 करोड़ लोगों को गरीबी की दलदल से बाहर निकालने में सफल रहा है। मोदी सरकार के जन-केंद्रित विकास और सामुदायिक भागीदारी के लाभों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

निस्संदेह, इस पहल ने करोडों अत्यंत गरीब परिवारों को भोजन, स्वास्थ्य सेवा और आजीविका के बेहतर साधनों तक पहुंचने में मदद की है। फिर भी देश में धन-संपत्ति की असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि असंतोष और हिंसा की जड़ है। जब परिश्रमी व्यक्ति को उसका उचित मूल्य नहीं मिलता, जब समाज में अवसर और सम्मान का समान वितरण नहीं होता, तब भीतर आक्रोश और विद्रोह जन्म लेता है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने कहा है कि जब पूंजी की आय दर आर्थिक वृद्धि दर से अधिक हो जाती है, तब समाज में असमानता बढ़ती है और लोकतंत्र की जड़ें हिल जाती हैं। आज यही हो रहा है। आर्थिक असंतुलन से सामाजिक असंतुलन उपज रहा है, अविश्वास और द्वेष का वातावरण बन रहा है।

कोरोना महामारी ने इस असमानता को और गहरा किया। जब करोड़ों लोग बेरोजगार और निर्धन हो गए, तब कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों और कंपनियों की संपत्ति कई गुना बढ़ गई। इसका अर्थ यह है कि संकट भी अब वर्ग विशेष के लिए अवसर बन गया है। युद्धों, ऊर्जा संकट और बढ़ती महंगाई ने गरीब देशों की स्थिति को और भी कठिन बना दिया। अमीर देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इन संकटों से भी मुनाफा कमाया जबकि विकासशील देशों में भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य की उपलब्धता घटती गई। विकास का अर्थ हमने केवल सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि तक सीमित कर दिया है। समाज में नैतिकता, समानता, सहानुभूति और पर्यावरणीय न्याय जैसे तत्व विकास की परिभाषा से गायब हो गए हैं। अमीर देशों की कंपनियां गरीब देशों के संसाधनों का दोहन करती हैं, और गरीब देशों के श्रमिक उनके उत्पादन का आधार बन जाते हैं। यह एक नया आर्थिक उपनिवेशवाद है, जहां अब सत्ता नहीं, पूंजी शासन करती है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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