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इफ्फी के अंतिम दिन जापानी फिल्म ‘ए पेल व्यू ऑफ हिल्स’ ने बांधा समकालीन सिनेमा का अनूठा समागम

गोवा में आयोजित 56वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) के अंतिम दिन दर्शकों ने जापानी फिल्म निर्देशक कएई इशिकावा की फिल्म ‘ए पेल व्यू ऑफ हिल्स’ का आनंद लिया। ‘कंट्री फोकस: जापान’ अनुभाग के अंतर्गत इस फिल्म का प्रदर्शन समकालीन जापानी सिनेमा की समृद्ध कथा परंपरा और अद्वितीय दृष्टिपरक शैली से दर्शकों को परिचित कराने का उद्देश्य रखता था। सिनेप्रेमियों की भारी उपस्थिति और फिल्म के बाद हुई चर्चा यह स्पष्ट करती है कि विषय-वस्तु और भावनात्मक परतों से भरपूर यह फिल्म दर्शकों के साथ गहराई से जुड़ने में सफल रही।

इफ्फी के अंतिम दिन जापानी फिल्म ‘ए पेल व्यू ऑफ हिल्स’ ने बांधा समकालीन सिनेमा का अनूठा समागम

प्रेस कॉन्फ्रेंस में उपस्थित होकर निर्देशक कएई इशिकावा ने भारतीय दर्शकों और इफ्फी के वातावरण की सराहना करते हुए कहा कि यह उनकी भारत यात्रा का पहला अनुभव है और वह यहां की सिनेमाई परंपरा एवं उत्साह से प्रभावित हैं। उन्होंने बताया कि ‘ए पेल व्यू ऑफ हिल्स’ नोबेल पुरस्कार विजेता काज़ुओ इशिगुरो के 1982 में प्रकाशित उपन्यास पर आधारित है। निर्देशक के अनुसार वर्ष 2025 में जापान में द्वितीय विश्व युद्ध समाप्ति के 80 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में कई रचनात्मक कार्य इस ऐतिहासिक दौर की स्मृतियों एवं प्रभावों पर केंद्रित रहे हैं। इशिकावा ने स्पष्ट किया कि भले ही उन्होंने उस दौर का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं किया, किंतु इशिगुरो की साहित्यिक भाषा और कथा विन्यास ने उन्हें उस समय के भावात्मक आयाम को समझने में सहायता दी।

फिल्म की कथा एक युवा जापानी-ब्रिटिश लेखिका पर केंद्रित है, जो अपनी माँ एत्सुको के नागासाकी में युद्धोत्तर अनुभवों को शब्दों में पिरोकर एक पुस्तक लिखने का निर्णय करती है। एत्सुको अपनी बड़ी बेटी की आत्महत्या से उपजी मानसिक पीड़ा के साथ-साथ 1952 में बिताए जीवन की स्मृतियों में लौटती हैं, उस समय वे एक युवा गर्भवती महिला थीं। उनकी यादों में शामिल है सचिको नाम की महिला से मुलाकात, जो अपनी बेटी मारिको के साथ विदेश में बेहतर जीवन की तलाश में थी। कहानी स्मृतियों और वास्तविकताओं के बीच ऐसी रेखा खींचती है, जहां तथ्य और अनुभूति एक-दूसरे में घुलते हुए मानवीय भावनाओं की जटिलता को उजागर करते हैं। यह फिल्म न केवल परमाणु बम की त्रासदी की ओर संकेत करती है, बल्कि युद्धोत्तर मानसिकता, मातृत्व, महिला अस्तित्व और पीढ़ियों के बीच स्मृति के हस्तांतरण की गहरी परतों को भी छूती है।

निर्देशक इशिकावा ने बताया कि उन्होंने स्वयं पटकथा लेखन और संपादन का कार्य संभाला क्योंकि वे संपादन को लेखन की अंतिम रचनात्मक प्रक्रिया मानते हैं। फिल्म के समापन दृश्य के चयन पर उन्होंने एक रोचक अनुभव साझा किया। चूंकि फिल्म के निर्माण में तीन देशों जापान, ब्रिटेन और पोलैंड की रचनात्मक भागीदारी रही, इसलिए हर पक्ष की संवेदनशीलता अंत और उसके अर्थ पर अपने अलग दृष्टिकोण रखती थी। ब्रिटिश निर्माताओं की प्राथमिकता थी कि निष्कर्ष ठोस और स्पष्ट हो, जबकि पोलिश दृष्टिकोण फिल्म के कुछ पहलुओं को खुला छोड़कर दर्शकों की व्याख्या के लिए स्थान देने की ओर झुकता था। जापानी संवेदना इन दोनों के बीच संतुलन बनाती हुई दिखती है। अंततः संवाद और परस्पर समझ ने फिल्म को सभ्य और संतुलित अंत तक पहुंचाया।

इफ्फी: विश्व सिनेमा की जीवंत प्रयोगशाला
भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव की प्रतिष्ठा और उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए यह उल्लेखनीय है कि 1952 में स्थापित आईएफएफआई दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा और सबसे पुराना फिल्म महोत्सव है। इसे राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और गोवा की एंटरटेनमेंट सोसाइटी द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया जाता है। यह प्लेटफ़ॉर्म उन वैश्विक सिनेमाई परंपराओं को एकत्रित करता है, जहां पुनर्स्थापित क्लासिक के साथ नवीन प्रयोगधर्मी सिनेमा एक ही मंच पर संवाद करते दिखाई देते हैं।

इस वर्ष 20 से 28 नवंबर तक आयोजित 56वें संस्करण में भाषाई विविधता, सांस्कृतिक अनुभवों और कलाकारों की पीढ़ियों के बीच संवाद की एक शानदार श्रृंखला देखने को मिली। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, मास्टरक्लास और वेव्स फिल्म मार्केट जैसे आयोजनों ने इसे विचारों और रचनात्मक ऊर्जा का जीवंत केंद्र बना दिया।

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