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जलसेना की गर्जना: आजाद हिंद फौज से नौसैनिक विद्रोह तक

-4 दिसंबर भारतीय नौसेना दिवस पर विशेष-

भारतीय सेना का नाम लेते ही हमारे सामने अनुशासित, पराक्रमी और सुसज्जित सैनिकों की जीवंत छवि साकार होती है, जो कभी बख्तरबंद टैंकों में सवार होते हैं, कभी वायुयानों में आकाश को चीरते हैं और कभी विशाल समुद्री युद्धपोतों पर गर्व से खड़े दिखाई देते हैं। यह दृश्य युवाओं में उत्साह, साहस और देशभक्ति की भावना जगाता है। सेना केवल एक पेशेवर करियर नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवन का अवसर है जहां रोमांच, अनुशासन, जोश और राष्ट्र की रक्षा का भाव बखूबी व्यक्त होता है। उत्साह से भरे युवा मन के लिए सेना एक ऐसा क्षेत्र है, जहां संघर्ष, समर्पण और त्याग की वास्तविक अनुभूति होती है, और जहां जीवन के अनुभव असाधारण और प्रेरणादायक बन जाते हैं।

जलसेना की गर्जना: आजाद हिंद फौज से नौसैनिक विद्रोह तक

भारत की सैन्य संरचना तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित है, जिन्हें थलसेना, वायुसेना और जलसेना कहा जाता है। इन तीनों का महत्व समान है और किसी भी अंग को दूसरे से नीचे नहीं आंका जा सकता। आधुनिक सैन्य कौशल, अद्यतन शस्त्र-प्रणालियों और अद्वितीय वीरता के साथ भारतीय सेना विश्व में सम्मानित स्थान रखती है। भारतीय नौसेना के इतिहास में विराट और विक्रांत जैसे प्रसिद्ध युद्धपोत स्वर्णिम उपलब्धियों के साक्षी रहे हैं, जिन्होंने समुद्री सुरक्षा और राष्ट्रीय सामरिक शक्ति को निरंतर मजबूत किया।

भारतीय नौसेना का इतिहास केवल स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नहीं शुरू होता, बल्कि वह उससे पहले की कई घटनाओं से गहराई से जुड़ा है। विशेष रूप से वर्ष 1946 का नौसैनिक विद्रोह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक अनदेखी परंतु अत्यंत निर्णायक घटना है। यह वह समय था जब अंग्रेज सरकार ने आजाद हिंद फौज के सैनिकों और अधिकारियों को बंदी बनाया और उन पर ब्रिटिश भारतीय सेना के शपथ-भंग का आरोप लगाया। यह मुकदमा दिल्ली के लाल किले में चलाया गया, जिसने देश की भावना को झकझोर दिया। तीन वरिष्ठ अफसर, ढिल्लन, सहगल और शाहनवाज को मृत्युदंड दिया गया। यह समाचार देशभर में रोष, आक्रोश और अपमान की अनुभूति का कारण बना।

रॉयल इंडियन नेवी के भारतीय नाविकों ने इस निर्णय को मूक पीड़ा की तरह स्वीकार तो किया, परंतु वे इसे भीतर पचा नहीं सके। ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा अपमानजनक भाषा, नस्लीय भेदभाव और अनुचित व्यवहार लंबे समय से भारतीय सैनिकों को पीड़ा पहुंचाता रहा था। इन दबे हुए घावों और राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा की भावना ने उनके भीतर प्रतिरोध का ज्वालामुखी जगाया, जो फरवरी 1946 में मुंबई में फूट पड़ा।

सबसे पहले बंबई डाक पर तैनात भारतीय नाविकों ने ब्रिटिश अधिकारियों के असभ्य व्यवहार के विरोध में राशन लेने और परेड में शामिल होने से इंकार कर दिया। देखते ही देखते लगभग तीन हजार सैनिक विद्रोह में शामिल हो गए, जिन्होंने अपने यूरोपीय कमांडरों का विरोध किया और नौसैनिक वाहनों को आग के हवाले कर दिया। 19 फरवरी को उन्होंने मुंबई के प्रमुख फाउंटेन क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। इस विद्रोह की प्रतिध्वनि दूर तक सुनाई पड़ी और मद्रास तथा कलकत्ता के नौसैनिक केंद्र भी इससे अछूते नहीं रहे। विद्रोह का परचम पूरे देश में फैल गया।

विद्रोही नाविकों ने बंबई डाक के लगभग बीस जहाजों पर अपना अधिकार कर लिया, जिनमें नौसेना के फ्लैगशिप नर्मदा साहन सहित कई महत्वपूर्ण पोत शामिल थे। कंसल बैरक में स्थित तोपखाने और गोला-बारूद पर भी उनका नियंत्रण स्थापित हो गया। यह विद्रोह आगे कराची, कलकत्ता, मद्रास, कोचीन, विशाखापत्तनम, और अंडमान तक फैल गया। ब्रिटिश सरकार के लिए यह स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई और उसने विद्रोह को शांत करने के लिए दमनकारी कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी।

प्रारंभ में ब्रिटिश अधिकारियों ने इसकी गंभीरता को कम आंकते हुए विश्वास किया कि बल और आतंक के माध्यम से इसे सहज ही दबा दिया जाएगा। एडमिरल गॉडफ्रे ने विद्रोहियों को संबोधित करते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि वे ब्रिटिश सरकार की शक्ति को जानते हैं और वह इसे प्रयोग करने में संकोच नहीं करेगी, भले ही उसकी नौसेना क्षतिग्रस्त हो जाए। परंतु दूसरी ओर भारतीय सैनिकों ने दृढ़ता का परिचय दिया और वे दबने को तैयार नहीं थे।

स्थिति गंभीर होने लगी तो कांग्रेस के वामपंथी धड़े ने मुंबई में आम हड़ताल का आह्वान किया, जिससे शहर पूरी तरह ठहर गया। कुछ स्थानों पर दंगे भी हुए। इस आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिलने लगा। नौसैनिकों की शिकायतों को राष्ट्रीय मंच पर उठाए जाने लगा। केंद्रीय असेंबली में आसफ अली ने ब्रिटिश अधिकारियों की भाषा और व्यवहार की आलोचना करते हुए कहा कि यदि इसी व्यवहार का सामना कोई दूसरा वर्ग करता, तो संभवतः वह नौसैनिकों से भी अधिक तीखी प्रतिक्रिया देता। उन्होंने कहा कि सैनिकों को राजनीति से दूर रहना चाहिए, परंतु उनकी मूल शिकायतों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

कांग्रेस के समाजवादी नेता मीनू मसानी ने भी ब्रिटिश सत्ता के नैतिक अधिकार को अस्वीकार करते हुए घोषणा की कि हम उन कानूनों का पालन करने हेतु बाध्य नहीं हैं, जिन्हें हमने कभी स्वीकार ही नहीं किया। जब भी कोई सैनिक या नागरिक ऐसे अन्यायपूर्ण आदेशों का उल्लंघन करता है, तो हमारी सहानुभूति स्वाभाविक रूप से उनकी ओर होती है।

महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मोहम्मद अली जिन्ना, मौलाना आजाद सहित अन्य प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं ने इस स्थिति पर निरंतर ध्यान बनाए रखा। वे ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहते थे जिससे हिंसा बढ़े या स्थिति नियंत्रण से बाहर चली जाए। वे ब्रिटिश सरकार के साथ संवाद भी बनाए हुए थे, ताकि शांतिपूर्ण समाधान निकल सके।

दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार ने भी धमकी देते हुए विध्वंसक युद्धपोतों को मुंबई की ओर रवाना किया, ताकि विद्रोह पूरी तरह कुचल दिया जाए। परंतु भारतीय नौसैनिकों ने अपने विद्रोह को कुचले जाने नहीं दिया। अंततः ब्रिटिश सरकार को समझौता करना पड़ा और विद्रोहियों की कई प्रमुख मांगों को स्वीकार करना पड़ा। यह घटना औपनिवेशिक सत्ता के लिए एक स्पष्ट संदेश थी कि अब भारतीय सैनिक मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक रूप से ब्रिटिश नियंत्रण में नहीं हैं।

यह विद्रोह केवल एक सैन्य घटना नहीं बल्कि भारतीय स्वाभिमान और आत्मबोध का सशक्त उद्घोष था। इस विद्रोह ने ब्रिटिश कुशासन की नींव हिलाकर रख दी और ब्रिटेन को यह महसूस कराया कि भारतीय सेना पर आधारित उनका सत्ता-तंत्र अब टिकाऊ नहीं रहा। भारतीय नौसैनिकों की यह गर्जना स्वतंत्रता की ओर बड़ा कदम साबित हुई।

इतिहास इस घटना को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक निर्णायक मोड़ मानता है, भले ही इसे मुख्यधारा की इतिहास पुस्तकों में अपेक्षित स्थान नहीं मिला। परंतु यह सच है कि भारतीय नौसैनिकों के साहसिक प्रतिरोध ने स्वतंत्रता के द्वार खोलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत आज जिन सशक्त सैन्य परंपराओं का गौरव करता है, उनमें 1946 के इस नौसैनिक विद्रोह का स्थान अत्यंत ऊंचा है। यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल नेताओं की राजनीतिक लड़ाई से नहीं, बल्कि सैनिकों, श्रमिकों और सामान्य नागरिकों के सामूहिक साहस से प्राप्त हुई। इन वीर सपूतों के प्रति राष्ट्र सदैव सम्मानित रहेगा और उनकी यह अदम्य भावना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।

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