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संघ का सनातन एवं प्रकृति-दर्शन: वैश्विक चेतना का आह्वान

भारत की सांस्कृतिक चेतना की जड़ में पंचमहाभूतों की जीवन-व्यवस्था है-भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश का संतुलन ही भारतीय ज्ञान-तंत्र की आत्मा है। ‘‘भगवान’’ शब्द के अक्षरों में निहित पंचतत्त्वों का सार यही दर्शाता है कि भारतीय जीवन-दर्शन में भगवान कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि प्रकृति और संस्कृति का सुसंगठित योग है। यही दृष्टि सनातन कहलाती है, नित्य प्रवाहमान, पुनर्जननशील, अविनाशी। जब भारत का जीवन इसी तत्त्वदृष्टि से संचालित था, तब वह न केवल आर्थिक रूप से बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी विश्व-गुरु था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में यह विचार और भी प्रासंगिक हो उठता है कि संघ का अस्तित्व ही सनातन जीवन-शैली की पुनर्स्मृति, पुनर्रचना और पुनर्स्थापना का प्रयत्न है। संघ नेतृत्व विशेषकर सरसंघचालक श्री मोहन भागवत की दृष्टि इस मूल दर्शन की आधुनिक व्याख्या है- “भारत की पहचान धर्म से है और धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि वह जीवन-शैली है, जिसमें प्रकृति, समाज, संस्कृति और आत्मा का संतुलन हो।’’ उनकी यह बात भारत की वैदिक चेतना को वर्तमान विश्व-यथार्थ में स्थापित करती है।

संघ का सनातन एवं प्रकृति-दर्शन: वैश्विक चेतना का आह्वान

संघ के शताब्दी वर्ष का समय केवल एक संगठनात्मक उत्सव नहीं बल्कि भारत की सनातन जीवन पद्धति के पुनरुत्थान का क्षण है। संघ सरचालक श्री मोहन भागवत बार-बार यह कहते रहे हैं कि भारत का अस्तित्व किसी राजनीतिक ढांचे से नहीं बल्कि उसकी प्रकृति और संस्कृति के अखंड योग से बना है। भारतीय जीवन का यह सत्य पंचमहाभूतों के योग में निहित है, जिनसे सृष्टि बनी और जिनकी गति को भगवान कहा गया। मोहन भागवत का दृष्टिकोण इस सत्य को आधुनिक भाषा में समझाता है कि सनातन केवल कोई धर्म नहीं बल्कि वह जीवन-तंत्र है जो मानव और प्रकृति के संतुलन से चलता है। भारतीयता प्रकृति-पूजक है और संस्कृति को उसी प्रकृति की लय पर निर्मित करती है।

आज की दुनिया युद्ध, आतंक, प्रतिस्पर्धा और पकर्यावरणीय संकट से त्रस्त है। मानव की भूख केवल संसाधन और उपभोग तक सीमित होने से जीवन तनाव, प्रदूषण और अव्यवस्था का पर्याय बनता जा रहा है। यही पश्चिमी दुनिया की शोषणकारी दृष्टि रही जिसने प्रकृति पर नियंत्रण को प्रगति माना, जबकि भारत की दृष्टि पोषण और सहअस्तित्व की थी। मोहन भागवत कहते हैं कि भारत का मार्ग “सबका हित और सबके साथ” पर आधारित है, क्योंकि भारतीय समाज ने प्रकृति को माता माना और संस्कृति को उसका स्वरूप। यह वही दृष्टि है जिसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जीवन के चार आयाम हैं; जहां मोक्ष की चाह लालच रहित आनंद में है और जीवन को आरोग्य बनाना ही संस्कृति का प्रमुख लक्ष्य है। संघ का जीवन यही संदेश देता है कि व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व तभी स्वस्थ होंगे जब मानव प्रकृति के साथ समरस जीवन जिएगा।

आज जब राष्ट्रवाद को भौतिक शक्ति से मापा जा रहा है, तब मोहन भागवत इसके आध्यात्मिक स्वरूप को स्पष्ट करते हैं। राष्ट्र उनके लिए भू-भाग ही नहीं, बल्कि स्मृति, संस्कृति, प्रण और परंपरा का जीवंत व्यक्तित्व है। वे कहते हैं कि भारत की शक्ति उसकी विविधता और सामंजस्य में है, और सनातन इसलिए सनातन है क्योंकि वह पुनर्जननशील है; वह कभी समाप्त नहीं होता क्योंकि उसका आधार प्रकृति है। यही कारण है कि संघ की जीवन शैली में ग्राम विकास, पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य आधारित आहार-विहार, चरित्र निर्माण और संतुलित व्यवहार को स्थान दिया गया। गांव, गौ-संवर्धन, हस्तशिल्प, लोक-जीवन, जैविक खेती, नदी-पुनरुद्धार, जल संरक्षण, स्वच्छता एवं आत्मनिर्भर भारत-ये नीतियां आधुनिक रूप में ‘‘भू-सांस्कृतिक मानचित्र’’ की पुनर्स्थापना हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय जीवन दृष्टि को आधुनिक शासन में उतारा है। योग का विश्वदिवस घोषित होना, आयुर्वेद का पुनर्धर्म, “माई लाइफ़ माई योगा”, “पंचामृत”, “लोकल टू ग्लोबल”, “वोकल फॉर लोकल”, जी-20 की भारतीय दर्शन आधारित थीम “वसुधैव कुटुम्बकम्”, मिशन लाइफ, प्राकृतिक खेती, पारंपरिक चिकित्सा मंत्रालय, मंदिरों का पुनर्जीवन, सांस्कृतिक आत्मविश्वास का उदय-ये सब उस सनातन दृष्टि के शासन रूप हैं जिसे संघ वर्षों से साधता आया है। मोदी के नेतृत्व में भारत की राजनयिक भूमिका आध्यात्मिक भाषा में उभर रही है, जहां युद्ध की भाषा की जगह सहजीवन की भाषा है, प्रतिस्पर्धा की जगह सहयोग की भूमिका है। मोहन भागवत कहते हैं कि “भारत को दुनिया में नेतृत्व अपने धर्म से मिलेगा, किसी वर्चस्व से नहीं।” यही धर्म प्रकृति और संस्कृति के संतुलन का वह सिद्धांत है जिसने भारत को दार्शनिक राष्ट्र बनाया।

आज दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, महामारी, अकेलापन, मानसिक तनाव और युद्ध के बीच टूट रही है। पश्चिमी विज्ञान समाधान के लिए रोबोट, जीन इंजीनियरिंग या डिजिटल कृतक जीवन की ओर जा रहा है, जबकि भारतीय अध्यात्म कहता है कि समाधान भीतर है, प्रकृति के साथ है, समरस संस्कृति के साथ है। यही संघ का कथन है कि “मानव को मनुष्य बनाना ही राष्ट्र निर्माण है।” संघ का जीवन तंत्र व्यक्ति में यह भरोसा जगाता है कि वह सृष्टि से जुड़ा है, पंचमहाभूतों का अंश है, और उसका धर्म है कि वह प्रकृति और समाज दोनों का पोषण करे। संघ की शाखाओं में हर प्रार्थना “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” यह स्मरण दिलाती है कि भारत माता केवल प्रतीक नहीं बल्कि प्रकृति और संस्कृति का योग है, जिसे जीना ही सनातनता है। संघ के लिए सनातन केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य के लिए नैतिक और सामाजित अनुशासन की ऊर्जा है। संघ स्वयंसेवक जब शाखा में प्राणायाम, सूर्यनमस्कार, योगासन और सामूहिक भाव-विन्यास करते हैं, तो वे भारतीय संस्कृति के मूल सूत्र ‘‘प्रकृति-संस्कृति योग’’ को साधते हैं।

मोहन भागवत यह भी कहते हैं कि भारत का मार्ग किसी पर थोपने का नहीं है बल्कि जगत को दिखाने का है कि शांति, समृद्धि और संतोष कैसे प्राप्त हो सकते हैं। उनके वक्तव्यों में स्पष्ट है कि सनातन जीवन-पद्धति ‘‘ग्रहण और उपभोग’’ नहीं बल्कि सहजीवन और पोषण सिखाती है। एक ओर पश्चिमी मॉडल शोषण, नियंत्रण का जीवन देता है, विज्ञान भी वहां सत्ता का औजार है; दूसरी ओर सनातन दर्शन अध्यात्म और विज्ञान को पूरक बनाता है, भौतिकी को आध्यात्मिक चेतना से संचालित करता है। यही अंतर भारत और विश्व को दिशा देता है। उनकी दृष्टि में भारत की समस्याओं का समाधान शिक्षा प्रणाली के पुनर्संयोजन में है, जिसमें ज्ञान केवल तकनीक न हो बल्कि जीवन विद्या हो। वे कहते हैं कि यदि भारत प्रकृति आधारित संस्कृति को पुनर्जीवित करेगा तो आरोग्य, आनंद और मोक्ष की दिशा में एक नई मनुष्यता जन्म लेगी। यह केवल भारत के लिए नहीं बल्कि विश्व के लिए समाधान है क्योंकि विश्व के संकट का मूल मानव और प्रकृति के बीच का विभाजन है।

आज संघ का शताब्दी वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह भारत के सनातन पुनरुत्थान का ऐतिहासिक मोड़ हो सकता है। संघ की जीवन शैली-साधारणता, संयम, समर्पण, समाज-धर्म, अनुशासन, सेवा और आत्मपरिष्कार, यह प्रकृति आधारित संस्कृति की आधुनिक अभिव्यक्ति है। और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शासन, संघ के जीवन तंत्र को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने का राजनीतिक-राजनयिक रूप है। इसलिए आज के हिंसा और युद्धग्रस्त विश्व के लिए भारत का संदेश स्पष्ट है कि समाधान हथियार से नहीं, जीवन दर्शन से होगा; विकास भौतिक उपभोग से नहीं, समरस संस्कृति से होगा; और भविष्य उस सभ्यता का है जो प्रकृति को माता और संस्कृति को सृष्टि का धर्म मानकर चलती है।

सनातन जीवन दृष्टि केवल विश्वास नहीं, बल्कि मानवता के लिए जीवंत प्रस्ताव है। संघ सरचालक मोहन भागवत का आग्रह इसी पर है कि भारत को अपने अक्षय ज्ञान पर पुनर्विश्वास करना होगा, क्योंकि वही वह शक्ति है जो संकटग्रस्त विश्व को दिशा दे सकती है। जब प्रकृति और संस्कृति का योग जीवन का आधार बनता है, तब व्यक्ति आरोग्यवान, समाज समृद्ध और राष्ट्र मोक्षपथगामी होता है। यही सनातन समृद्धि है और यही भारत का वैश्विक योगदान है, जिसकी उद्घोषणा संघ के शताब्दी वर्ष में अधिक स्पष्ट होती है कि “विश्व बंधुत्व, प्रकृति सम्मान और मोक्ष-केंद्रित जीवन, यही भविष्य की सभ्यता है।”

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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