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राम वी. सुतार के हाथों में आकर पत्थर बोल उठते थे

राम वी. सुतार का शतायु जीवन केवल वर्षों की गणना नहीं था, वह भारतीय मूर्ति-कला की सदियों लंबी साधना का सजीव विस्तार था। सौ वर्ष की उम्र में उनका जाना ऐसा है जैसे पत्थर बोलने वाली भाषा का कोई मौन हो जाना, जैसे हथौड़े और छैनी के बीच जन्म लेने वाली संवेदनाओं का विराम। वे उन विरले कलाकारों में थे जिनके हाथों में पत्थर, धातु और कांस्य केवल पदार्थ नहीं रहते थे, वे चेतना बन जाते थे। आकृतियां नहीं गढ़ी जाती थीं, जीवन प्रकट होता था। उनके स्पर्श से निर्जीव सजीव हो उठता था और शिल्प अपने भीतर मनुष्य की धड़कनें समेट लेता था। राम वी. सुतार केवल महान मूर्तिकार नहीं थे, वे एक दर्शन थे। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण था कि कला केवल सौंदर्य की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मनुष्यता का विस्तार होती है। उन्होंने जब किसी महापुरुष की प्रतिमा गढ़ी, तो केवल चेहरे की रेखाएं नहीं उकेरीं, उस व्यक्तित्व के भीतर छिपे संघर्ष, संकल्प, करुणा और दृष्टि को आकार दिया। यही कारण है कि उनकी बनाई मूर्तियां देखने वाले को देखती हैं, मौन होकर भी संवाद करती हैं और समय की सीमाओं से परे जाकर पीढ़ियों को प्रेरित करती हैं।

राम वी. सुतार के हाथों में आकर पत्थर बोल उठते थे

स्टैचू ऑफ यूनिटी आज विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा के रूप में खड़ी है, पर उसकी ऊंचाई केवल फीट और मीटर में नहीं मापी जानी चाहिए। उसमें सरदार पटेल की लौह इच्छाशक्ति के साथ-साथ राम वी. सुतार की तपस्या, धैर्य और अंतर्दृष्टि समाहित है। यह प्रतिमा केवल एक राष्ट्रीय प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय मूर्ति-कला की सामर्थ्य का वैश्विक घोष है। संसद परिसर में स्थापित गांधी प्रतिमा हो या देश-विदेश में फैली अनगिनत मूर्तियां, हर जगह उनकी कला ने इतिहास को वर्तमान से जोड़ा है और वर्तमान को भविष्य के लिए अर्थवान बनाया है। उनके हाथों में पत्थर बोलने लगते थे, पर उनके हृदय में मनुष्य बोलता था। वे जानते थे कि किसी नेता, संत या विचारक की प्रतिमा बनाते समय केवल शारीरिक समानता पर्याप्त नहीं होती। वहां आत्मा की समानता चाहिए। इसलिए वे पहले उस व्यक्तित्व को पढ़ते थे, समझते थे, आत्मसात करते थे। उनकी साधना में अध्ययन, ध्यान और संवेदना का अद्भुत संगम था। शायद यही कारण था कि उनकी कारीगरी में बारीकी के साथ-साथ एक ऐसी जीवंतता थी जो दर्शक को भीतर तक छू लेती थी।

राम सुतार जी एक सौ एक साल के थे और उम्र से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे थे। उनका जन्म 19 फ़रवरी 1925 को महाराष्ट्र में धूलिया ज़िले के गोन्दुर गाँव में एक ग़रीब परिवार में हुआ। उनका पूरा नाम राम वनजी सुतार था। वे भारत के सुप्रसिद्ध शिल्पकार थे। उनके द्वारा बनाई गईं महात्मा गांधी की प्रतिमाएं अब तक विश्व के तीन सौ से अधिक शहरों में लग चुकी हैं। उनके कलात्मक एवं अनूठे शिल्प साधना को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1999 में पद्मश्री और 2016 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया। अक्टूबर 2018 में, सुतार को 2016 के सांस्कृतिक सद्भाव के लिए टैगोर पुरस्कार मिला।  उनके पिता वनजी हंसराज जाति व कर्म से बढ़ई थे। राम सुतार का विवाह 1952 में प्रमिला के साथ हुआ। जिनसे उन्हें 1957 में एकमात्र पुत्र अनिल राम सुतार हुआ, जो पेशे से वास्तुकार हैं परन्तु अब वह भी नोएडा स्थित अपने पिता के स्टूडियो व कार्यशाला की देखरेख का कार्य करते हैं।

राम वी. सुतार का जीवन सादगी का पर्याय था। इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद उनमें कोई दर्प नहीं था। वे शिल्प के साधक थे, शोर के नहीं। उनका कार्य बोलता था, वे स्वयं मौन में रहकर भी सब कुछ कह जाते थे। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची महानता प्रचार की मोहताज नहीं होती। वह अपने आप में पूर्ण होती है और समय उसे पहचान ही लेता है। उनकी कला में भारतीय परंपरा की गहरी जड़ें थीं, पर दृष्टि पूरी तरह आधुनिक और वैश्विक थी। वे अतीत से प्रेरणा लेते थे, वर्तमान की ज़रूरतों को समझते थे और भविष्य के लिए रूप गढ़ते थे। यही कारण है कि उनकी मूर्तियां किसी एक काल में बंद नहीं होतीं। वे हर युग में प्रासंगिक लगती हैं। उनमें इतिहास की गरिमा है, वर्तमान की चेतना है और भविष्य की उम्मीद भी।

राम सुतार अपने गुरु रामकृष्ण जोशी से प्रेरणा लेकर मुम्बई गये, जहाँ उन्होंने जे०जे०स्कूल ऑफ़ आर्ट में दाखिला लिया। 1953 में इसी स्कूल से मॉडलिंग में उन्होंने सर्वाेच्च अंक अर्जित करते हुए मेयो गोल्ड मेडल हासिल किया। मॉडलर के रूप में औरंगाबाद के आर्कियोलोजी विभाग में रहते हुए राम सुतार ने 1954 से 1958 तक अजन्ता व एलोरा की प्राचीन गुफ़ाओं में मूर्तियों के पुनर्स्थापन का कार्य किया। 1958-1959 में वह सूचना व प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के दृश्य श्रव्य विभाग में तकनीकी सहायक भी रहे। 1959 में उन्होंने अपनी मर्ज़ी से सरकारी नौकरी त्याग दी और पेशेवर मूर्तिकार बन गये। इन दिनों वह अपने परिवार के साथ नोएडा में निवास करते थे। राम सुतार ने वैसे तो बहुत-सी मूर्तियाँ बनायीं है, किन्तु उनमें से कुछ उल्लेखनीय मूर्तियों में 45 फ़ुट ऊँची चम्बल देवी की मूर्ति गंगासागर बाँध, 17 फ़ुट ऊँची मोहनदास कर्मचन्द गाँधी की मूर्ति गाँधीनगर, गुजरात, 21 फ़ुट ऊँची महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति अमृतसर, 18 फ़ुट ऊँची सरदार बल्लभ भाई पटेल की मूर्ति संसद भवन, नई दिल्ली, 9 फ़ुट ऊँची भीमराव अम्बेडकर की मूर्ति जम्मू, भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा की आवक्ष प्रतिमा, ब्रह्म सरोवर में कृष्ण अर्जुन रथ स्मारक कांस्य प्रतिमा आदि हैं। गुजरात में स्थापित सरदार वल्लभ भाई पटेल की विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ राम सुतार के अद्भुत कला-कौशल का नमूना है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि भारत ने एक ऐसे कलाकार को खो दिया है जिसने देश की सांस्कृतिक पहचान को विश्व पटल पर नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें भारतीय कला परंपरा का स्तंभ बताते हुए कहा कि उनकी बनाई मूर्तियां आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र के महापुरुषों से जोड़ती रहेंगी। अनेक राजनेताओं, कलाकारों और विचारकों ने भी अपनी संवेदनाएं व्यक्त करते हुए स्वीकार किया कि राम वी. सुतार का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक युग का अवसान है। पर शायद स्वयं राम वी. सुतार इस तरह की श्रद्धांजलियों से अधिक अपने काम में विश्वास रखते थे। उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान यही था कि कोई उनकी बनाई मूर्ति के सामने खड़ा होकर कुछ क्षण मौन में डूब जाए, कुछ सोचने लगे, कुछ महसूस करने लगे। उन्होंने जीवन को भी उतना ही जीवंत बनाया जितना अपनी कला को। उनका व्यक्तित्व सहज, सरल और आत्मीय था। वे जहां भी गए, वहां प्रेरणा का एक शांत स्रोत बन गए।

राम सुतार का जीवन शिल्प एवं कला की पाठशाला था, जिसमें उन्होंने यह भी सिखाया कि कला केवल तकनीक नहीं, साधना है। छैनी चलाने से पहले मन को तराशना पड़ता है। दृष्टि को निर्मल करना पड़ता है। शायद यही कारण था कि उनकी शतायु यात्रा के अंतिम क्षण तक उनकी सृजनात्मक ऊर्जा बनी रही। उम्र उनके लिए केवल एक संख्या थी, कला के प्रति उनकी जिजीविषा कभी वृद्ध नहीं हुई। आज जब हम उन्हें विदा कर रहे हैं, तो यह विदाई वास्तव में विदाई नहीं है। वे अपनी मूर्तियों में, अपने शिल्प में, अपनी संवेदनाओं में सदा उपस्थित रहेंगे। जब भी संसद परिसर में गांधी की प्रतिमा के सामने कोई सिर झुकाएगा, जब भी स्टैचू ऑफ यूनिटी के साये में कोई राष्ट्र की एकता को महसूस करेगा, राम वी. सुतार वहां होंगे। पत्थर के भीतर धड़कते हृदय की तरह, मौन में बोलती चेतना की तरह। उनका जीवन इस बात की साक्षी है कि एक साधारण मनुष्य भी अपनी साधना, संकल्प और संवेदना के बल पर महामानव बन सकता है। उन्होंने पत्थर को जीवन दिया, पर उससे भी बड़ा कार्य उन्होंने यह किया कि जीवन को अर्थ दिया। भारतीय मूर्ति-कला के इस शीर्ष पुरुष को विनम्र श्रद्धांजलि। उनका जाना हमें शून्य नहीं देता, बल्कि एक विराट उत्तरदायित्व सौंपता है कि हम कला, संस्कृति और मनुष्यता के इस दीप को बुझने न दें।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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